Author : Harsh V. Pant

Expert Speak Raisina Debates
Published on Oct 31, 2024 Updated 0 Hours ago

हमने अपना मॉडल बदल दिया है. पहले हम पार्टनरशिप से दूर भागते थे, लेकिन अब हम इसकी अहमियत समझने लगे हैं.

यूरोपीय साझेदारी से विदेश नीति को नई दिशा

काफ़ी अहम साबित हुआ है स्पेन के राष्ट्र प्रमुख पेड्रो सांचेज का भारत दौरा. इसमें दोनों देशों के बीच बुनियादी ढांचे, रेल परिवहन, पर्यटन आदि कई क्षेत्रों में अहम समझौते हुए हैं. देखा जाए, तो इस समय भारत की विदेश नीति नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ रही है, जिसमें हम अलग-अलग देशों के साथ अपने संबंध बेहतर बनाने में सक्षम हुए हैं. इसका एक उदाहरण चीन के साथ अभी-अभी हुआ समझौता भी है, जिसमें नई दिल्ली का पक्ष आखिरकार बीजिंग को मानना पड़ा. इसके पूर्व हमने यह भी देखा है कि किस तरह से भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रूस और यूक्रेन के बीच मध्यस्थता की कोशिशों में जुटे हैं, जो भारत की वैश्विक भूमिका को प्रभावी ढंग से स्वीकार करने का एक अहम संकेत है. पश्चिमी देशों, विशेषकर यूरोप के साथ हमारे रिश्तों में नई गर्मी आ गई है.

 

पश्चिमी देशों के साथ हमारे संबंध पहले काफी अंतर्मुखी हुआ करते थे, क्योंकि हमारी चिंता यह होती कि यदि हम उनके साथ ज्यादा जुड़ेंगे, तो गुटनिरपेक्षता की नीति प्रभावित होगी और हमें पश्चिमी देशों का पिछलग्गू मान लिया जाएगा. मगर आज भारत सर्वसम्मति से 'ग्लोबल साउथ' (वैश्विक दक्षिण) की आवाज बनने जा रहा है. जाहिर है, हमने अपना मॉडल बदल दिया है. पहले हम पार्टनरशिप से दूर भागते थे, लेकिन अब हम इसकी अहमियत समझने लगे हैं.

भारत का कद कितना बढ़ गया है, इसका अंदाजा इससे भी लगता है कि यूक्रेन युद्ध के दौरान तमाम मतभेदों के बावजूद पश्चिमी देशों के साथ आपसी रिश्तों में प्रगाढ़ता आई है. इस तनाव ने द्विपक्षीय रिश्तों को किसी भी रूप में प्रभावित नहीं किया.

आज के वैश्विक दौर में सभी देशों से अलग-अलग संबंधों की दरकार होती है, ताकि अपनी सामरिक और विकास संबंधी जरूरतें पूरी की जा सकें. भारत तकनीक, आर्थिक, प्रवासन, सामरिक सुरक्षा जैसे तमाम मसलों में उन सभी देशों के साथ संबंध सुधारने का इच्छुक है, जिनसे ऐसा करने की हमें जरूरत जान पड़ती है. अपनी विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए पश्चिम से हमें जुड़ना ही होगा, इसलिए भारत नए आत्मविश्वास के साथ द्विपक्षीय रिश्तों को आगे बढ़ा रहा है. भारत का कद कितना बढ़ गया है, इसका अंदाजा इससे भी लगता है कि यूक्रेन युद्ध के दौरान तमाम मतभेदों के बावजूद पश्चिमी देशों के साथ आपसी रिश्तों में प्रगाढ़ता आई है. इस तनाव ने द्विपक्षीय रिश्तों को किसी भी रूप में प्रभावित नहीं किया.

पारंपरिक तौर पर हम ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका जैसे देशों पर ज्यादा ध्यान देते रहे हैं, लेकिन अब हम दूसरे देशों के साथ भी अपने संबंध आगे बढ़ा रहे हैं. इसमें हमारा एक नया आत्मविश्वास झलक रहा है. जरूरतें उनकी भी हैं, क्योंकि हम हिंद-प्रशांत क्षेत्र की एक अहम धुरी बन चुके हैं.


सामरिक साझेदारी और सहयोग

भारत और यूरोपीय देशों में बढ़ती नजदीकी की एक वजह उनकी बदलती रणनीति भी है. पहले यूरोपीय देश आर्थिक मुद्दों पर अधिक ध्यान देते थे. हिंद प्रशांत में भी उनका ध्यान मुख्यतः चीन पर होता था, क्योंकि वह एक बड़ी अर्थव्यवस्था रहा है. यूरोपीय देशों में चीन को लेकर इतना उत्साह रहा है कि यह उसकी विदेश नीति में भी झलकता रहा और भारत को वे अलग-थलग करके देखा करते थे. भारतीय लोकतंत्र की कथित कमजोरियों को उजागर करके कूटनीतिक रिश्तों की परिकल्पना की जाती रही. मगर आज तस्वीर बदल गई है. यूरोप के लिए हिंद प्रशांत काफी अहम बन गया है. देश-दुनिया की भू-राजनीति के लिए भी यह काफी महत्वपूर्ण क्षेत्र है. यूरोप यहां अपनी बड़ी भूमिका की खोज में है. नतीजतन, वह आर्थिक ही नहीं, सामरिक तौर पर भी एक मजबूत खिलाड़ी के रूप में यहां दिखना चाहता है. वह अमेरिका की छाया से भी बाहर निकलने को लालायित है. ऐसे में, भारत जैसे देशों के साथ रिश्ते सुधारने के लिए वह तत्परता दिखा रहा है. अच्छी बात है कि भारत और यूरोप एक-दूसरे के सामरिक मुद्दों के साथ भी आगे बढ़ रहे हैं.

अच्छी बात है कि भारत और यूरोप एक-दूसरे के सामरिक मुद्दों के साथ भी आगे बढ़ रहे हैं.

देखा जाए, तो राजनीतिक रूप से यूरोप करीब 50 स्वतंत्र देशों में बंटा हुआ है, जिसमें रूस सबसे बड़ा और सबसे बड़ी आबादी वाला मुल्क है, क्योंकि यह यहां के 39 फीसदी क्षेत्रफल और 15 फीसदी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन इन दिनों भारत के साथ जर्मनी सबसे मजबूत कड़ी के रूप में नजर आता है. पिछले दिनों जर्मनी के चांसलर ओलाफ शोल्ज भारत का तीसरा दौरा भी किया है. यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी पांचवीं मुलाकात थी. इसमें रूस- यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी एशिया की स्थिति पर चर्चा हुई ही, जर्मनी के साथ सबमरीन, यानी पनडुब्बी तकनीक पर बात करने को लेकर भी हम आगे बढ़े. यह एक अप्रत्याशित कदम है, क्योंकि दूसरे विश्व युद्ध के बाद से जर्मनी ने रक्षा निर्यात काफी हद तक रोक रखा है अब अगर वह भारत के साथ व्यापार को इच्छुक है, तो उसे इस बाबत अपने यहां कानून में बदलाव करन पड़ेगा. वैसे, अंदरखाने वह इसके लिए राजी दिख रहा है. हमारा उसके साथ 'पीपुल टु पीपुल कॉन्टैक्ट' भी रहा है. फिर चाहे वह वीजा नीति हो या भारतीय प्रतिभा का सम्मान, जर्मन हमसे लगातार मजबूती से जुड़ रहा है. वह 'मेक इन इंडिया' में भी अपनी सहभागिता दिखाना चाहता है.

 

जर्मनी हो या फ्रांस या फिर स्पेन, ये तमाम देश भारत के विनिर्माण क्षेत्र में, जिस रूप में भारत आगे बढ़न चाहता है, अपना योगदान देने का प्रयास कर रहे हैं वहां की कंपनियां न सिर्फ यहां निवेश कर रही हैं, बल्वि अपनी हिस्सेदारी मजबूत करने की कोशिशों में भी हैं भारत के क्षमता निर्माण को बढ़ाने में स्पेन उत्साहित है जो बताता है कि यूरोप में भारत को लेकर माहौल अब कितना बदल गया है.

 

यूरोप-भारत के उभरते संबंधों का विश्लेषण

सामरिक स्वायत्तता को लेकर भी भारत और यूरो मिलकर काम कर रहे हैं. यूरोपीय देश नहीं चाहते कि उनके यहां की नीतियों का निर्धारण दूसरे देश करें इसलिए यह मुद्दा वहां फिलहाल प्रासंगिक बना हुआ है. इसमें भारत उनका बतौर सहयोगी साथ दे रहा है इसी तरह, चीन को लेकर बदलता माहौल भी भारत और यूरोप को करीब ला रहा है. वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और 'चीन प्लस वन' में भी भारत की एक अहम भूमिका वे देख रहे हैं. हिंद प्रशांत में भी भारत के साथ काम करने की कोशिशें जारी हैं. नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था और नई भू-राजनीति को तय करने में भारत और यूरोप एकमत रखते हैं. इन्हीं सब कारणों से सैन्य अभ्यास, सामरिक व समुद्री सुरक्षा संबंधी प्रयास बुनियादी ढांचागत निर्माण, कनेक्टिविटी आदि में भारत और यूरोपीय देश कदमताल मिलाने लगे हैं. वास्तव में यह हिंद प्रशांत क्षेत्र में भारत को चीन के बतौर विकल्प मानने का नतीजा भी है.

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