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7 अक्टूबर 2023 को इज़राइल पर हमास के हमले ने आतंकवाद के ख़तरों को एक बार फिर सामने ला खड़ा किया है और इसके साथ ही इस बात की मांग भी ज़ोर पकड़ रही है कि अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई जारी रखनी होगी. इस हमले से हमास ने तो सुर्ख़ियां बटोरीं और इज़राइल बनाम ग़ज़ा के नैरेटिव पर दुनिया की विभाजित राय से उसको निश्चित रूप से फ़ायदा भी हुआ. लेकिन, मध्य पूर्व में मची मौजूदा उथल-पुछल का कुछ और आतंकवादी संगठन भी लाभ उठाने की फ़िराक़ में हैं.
2021 में अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की ‘जीत’ को अक्सर इस बात की मिसाल के तौर पर पेश किया जाता है कि किस तरह नॉन स्टेट आतंकवादी संगठन ख़ुद को गहरे वैचारिक संघर्षों में इस तरह डुबो देते हैं, जो कई दशकों तक चलता रह सकता है.
इस्लामिक स्टेट (जिसे ISIS या फिर अरबी भाषा में दाएश भी कहा जाता है) के दोबारा ताक़तवर होने की आशंका न केवल मध्य पूर्व में चिंता का मुख्य विषय बन गई है, बल्कि इस क्षेत्र को लेकर अलग अलग वैचारिक ख़ेमों में बंटे वर्गों के लिए भी ये बड़ी फ़िक्र की बात है. 2021 में अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की ‘जीत’ को अक्सर इस बात की मिसाल के तौर पर पेश किया जाता है कि किस तरह नॉन स्टेट आतंकवादी संगठन ख़ुद को गहरे वैचारिक संघर्षों में इस तरह डुबो देते हैं, जो कई दशकों तक चलता रह सकता है.
इस्लामिक स्टेट विरोधी संघर्ष की वापसी?
इस्लामिक स्टेट के विजय जुलूस ने 2013 से 2019 के दौरान इराक़ और सीरिया में भारी तबाही मचाई थी, और पाकिस्तान में 2011 में अल-क़ायदा के प्रमुख ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद इस्लामिक स्टेट की वजह से आतंकवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष एक बार फिर से दुनिया के सुरक्षा संबंधी नैरेटिव का मुख्य बिंदु बन गया था. इस्लामिक स्टेट के दबदबे वाले दौर में क्षेत्रीय हों या फिर अंतरराष्ट्रीय प्रतिद्वंदी देश, जैसे कि अमेरिका और रूस या फिर सऊदी अरब और ईरान इन सबके लिए इस्लामिक स्टेट एक साझा दुश्मन बन गया था. सीरिया में रूस की दख़लंदाज़ी के पीछे इस्लामिक स्टेट से मुक़ाबले को वजह बताया गया था. इस दौरान रूस ने तेल की तस्करी के ख़िलाफ़ सबसे पहला वार किया था. क्योंकि तेल की ये तस्करी ही दाएश के विस्तार की सबसे बड़ी वजह थी. इसी बीच, अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर अमेरिका ने भी इस्लामिक स्टेट को ‘शिकस्त’ देने के मक़सद से 2017 में ऑपरेशन इन्हेरेंट रिजॉल्व शुरू किया था.
वैसे तो पिछले कुछ वर्षों के दौरान इस्लामिक स्टेट काफ़ी कमज़ोर हो गया है. क्योंकि 2019 में सीरिया के गृहयुद्ध के दौरान अमेरिका की स्पेशल फोर्सेज के एक ऑपरेशन में ISIS के मुखिया अबु बक्र अल-बग़दादी के मारे जाने के बाद इस संगठन के जो सरगना या अमीर बने, उनको भी बारी बारी से मार गिराया गया था. लेकिन, अब ग़ज़ा में चल रहे युद्ध के बीच इस्लामिक स्टेट के फिर से ताक़तवर होने का ख़तरा मंडरा रहा है. इसके साथ ही साथ अफ्रीका और अफ़ग़ानिस्तान पाकिस्तान में इस्लामिक स्टेट के सहयोगी संगठन न केवल अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं, बल्कि उन्होंने अपना दबदबा इतना बढ़ा लिया है कि उनके अपने भौगोलिक इलाक़े से आगे बढ़कर हमले करने की आशंका भी बढ़ती जा रही है. इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत (ISKP) ऐसा ही एक संगठन है, जो अफ़ग़ान तालिबान और पाकिस्तानी सरकार के बीच संघर्ष की आशंका के बीच शोहरत बटोर रहा है और जिसका असर मध्य एशिया तक फैल सकता है. अफ़ग़ानिस्तान तालिबान का कहना है कि ISKP के मुख्य आतंकवादी पाकिस्तान में ही हैं और इस संगठन के पास अफ़ग़ानिस्तान के भीतर ‘कोई ताक़त नहीं’ है. वहीं, पाकिस्तान का आरोप है कि अफ़ग़ान तालिबान तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) को पाकिस्तान के भीतर हमले करने में मदद कर रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आतंकवादियों से वैश्विक सुरक्षा को ख़तरे को लेकर हालिया मीटिंग में अमेरिका और रूस दोनों ने कहा था कि आतंकवाद, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए लगातार एक बड़ा ख़तरा बना हुआ है.
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आतंकवादियों से वैश्विक सुरक्षा को ख़तरे को लेकर हालिया मीटिंग में अमेरिका और रूस दोनों ने कहा था कि आतंकवाद, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए लगातार एक बड़ा ख़तरा बना हुआ है. संयुक्त राष्ट्र ने तो चेतावनी दी थी कि दुनिया के प्रयासों के बावजूद इस्लामिक स्टेट एक ख़तरा बना हुआ है. पर क्षेत्रीय भू-राजनीतिक टकरावों, बड़ी ताक़तों के बीच प्रतिद्वंद्विता और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के राज में अमेरिका के बाक़ी दुनिया से दूरी बनाने की आशंकाओं ने आगे चलकर आतंकवाद से लड़ाई में जटिलताओं की नई परतें जोड़ दी हैं. हालांकि, इन जानी समझी चुनौतियों के अलावा, ग़ज़ा के मौजूदा हालात, अमेरिका की भूमिका और सीरिया के बदले हुए हालात, इन परिचर्चाओं को नई दिशा में ले जा सकते हैं.
मध्य पूर्व में आतंकवाद से लड़ाई
सीरिया में तीन दशक तक सत्ता में रहे बशर अल-असद हुकूमत के पतन का पश्चिमी ताक़तों ने बहुत सतर्कता से स्वागत किया है. जब हयात तहरीर अल शाम (HTS) के आक़ा अहमद अल शरा (जिसे उसके उपनाम अबु मुहम्मद अल-जिलानी के नाम से भी जाना जाता है) ने दमिश्क में सत्ता की कमान संभाली, तो अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट से उनके पुराने ताल्लुक़ात ने सुरक्षा को लेकर परिचर्चाओं में चिंता की एक और वजह जोड़ दी थी. संघर्ष के शिकार मध्य पूर्व इलाक़े में जब 7 अक्टूबर के हमले के जवाब में इज़राइल ने जब हमास और हिज़्बुल्लाह के ख़िलाफ़ हमला बोला, तो अहमद अल शरा पर वैधता की मुहर लगाने का असल मक़सद सीरिया में रूस और ईरान के प्रभाव को ख़त्म करना ज़्यादा था. यही नहीं, अल शरा ने इज़राइल के अस्तित्व को भी स्वीकार कर लिया है, जो यहूदी देश के ख़िलाफ़ जिहादी नैरेटिव के इतिहास से बिल्कुल अलग है.
इस्लामिक स्टेट के दोबारा सिर उठाने की आशंकाएं आधारहीन नहीं हैं. ग़ज़ा में युद्ध और उसकी वजह से मरने वालों की भारी तादाद आने वाले समय में तमाम देशों में आतंकवादी संगठनों में भर्ती को बढ़ावा दे सकती है. इस्लामिक स्टेट की बर्बरता ने इराक़ और सीरिया में और आतंकवादियों को आकर्षित किया है. ख़ास तौर से जब हम उसके वैचारिक और बहुत चतुराई से तैयार किए गए ऑनलाइन दुष्प्रचार के अभियानों से तुलना करें, तो बर्बरता से ISIS को ज़्यादा शोहरत मिली है. इस्लाम के नाम पर इतने बड़े पैमाने पर लोगों को जोड़ने के अभियान की कामयाबी इससे पहले 1979 और 1989 के बीच देखी गई थी, जब सोवियत संघ ने अफ़ग़ानिस्तान पर धावा बोला था और अमेरिका और पाकिस्तान के समर्थन से मुजाहिदीन ने आक्रामक सोवियत फौजों के साथ एक दशक तक संघर्ष करके उसे पीछे धकेल दिया था. मुजाहिदीन को समर्थन देने की दूरगामी क़ीमत उस वक़्त चुकानी पड़ी जब 2021 में तालिबान ने अमेरिका द्वारा प्रायोजित गणराज्य के पतन और उसकी तैयार की हुई फ़ौज को शिकस्त देकर अमेरिका को राजनीतिक और फौजी रूप से काबुल से निकाल बाहर किया था.
वैसे तो अमेरिका ने सीरिया और इराक़ में इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ मुहिम की अगुवाई की थी और इराक़ को इस्लामिक स्टेट के क़ब्ज़े में चली गई ज़मीन छीनने के लिए प्रशिक्षण भी दिया था. फिर भी इस इलाक़े की ज़्यादातर सरकारों के लिए इस्लामिक स्टेट एक ख़तरा बना हुआ है. पिछले कुछ वर्षों के दौरान इस्लामिक स्टेट और अल क़ायदा दोनों ने, आपसी मतभेदों और अपने भीतर की प्रतिद्वंदिताओं के बावजूद मध्य पूर्व की सरकारों और शाही परिवारों को ‘ग़ैर इस्लामिक’ और पश्चिमी देशों का पिट्ठू कहकर उनको अपना निशाना बनाया है. मिसाल के तौर पर ‘अरब स्प्रिंग’ नाम से जनता के विरोध प्रदर्शनों को उग्रवादी संगठनों ने समर्थन दिया था, ताकि लंबे समय से सत्ता पर क़ाबिज़ तंत्र को ढहाया जा सके और इन देशों में ‘इस्लामिक स्टेट’ की स्थापना की जा सके (हालांकि, इस मक़सद में उग्रवादी ज़्यादातर नाकाम ही रहे थे).
मिसाल के तौर पर ‘अरब स्प्रिंग’ नाम से जनता के विरोध प्रदर्शनों को उग्रवादी संगठनों ने समर्थन दिया था, ताकि लंबे समय से सत्ता पर क़ाबिज़ तंत्र को ढहाया जा सके और इन देशों में ‘इस्लामिक स्टेट’ की स्थापना की जा सके
सीरिया में असद सरकार के पतन के बाद, इस्लामिक स्टेट से मुक़ाबला करने को लेकर मतभेद साफ़ दिख रहे हैं. अमेरिका की अगुवाई वाले सैन्य अभियान ज़्यादातर हवाई ताक़त के इस्तेमाल पर केंद्रित हैं. वहीं, ज़मीनी स्तर पर अमेरिका के समर्थन वाले कुर्द समूह ही इस्लामिक स्टेट से मोर्चा ले रहे हैं. कुर्दों के हथियारबंद संगठनों ने ही अमेरिका को वो ठोस ख़ुफ़िया जानकारी मुहैया कराई थी, जिसकी मदद से अमेरिका ने इस्लामिक स्टेट के बड़े आतंकवादियों और अमीरों का सफ़ाया किया था. सीरिया में HTS और कुर्दों की अगुवाई वाले समूहों जैसे कि सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्सेज (SDF) के बीच ताक़त और क्षेत्र के बंटवारे की वजह से इनको समर्थन भी बंटा हुआ है. जहां हयात तहरीर अल शाम को तुर्की का समर्थन हासिल है. वहीं, SDF को अमेरिका समर्थन देता है. सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्सेज के पास अल होल जैसे शिविरों के रख-रखाव की भी ज़िम्मेदारी है, जहां पर इस्लामिक स्टेट के मारे जा चुके लड़ाकों के हज़ारों परिजनों को रखा गया है. इन विभाजनों को ख़त्म करने और इस्लामिक स्टेट के फिर से ताक़तवर होने को लेकर आशंकाएं दूर करने के लिए तुर्की ने जॉर्डन, इराक़ और सीरिया की नई हुकूमत के साथ मिलकर सहयोग का एक नया ढांचा तैयार करने की योजना बनाई है, ताकि इस्लामिक स्टेट के इकोसिस्टम के ख़िलाफ़ नई मुहिम शुरू की जा सके. इसमें इस्लामिक स्टेट से मुक़ाबला करने की विचारधारा तो सामरिकी है, लेकिन इसकी जड़ें भू-राजनीतिक हैं. क्योंकि, तुर्की का इरादा ज़मीनी स्तर पर इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ मुहिम चलाने की कमान कुर्दों के हाथ से छीनने का है.
तुर्की द्वारा प्रस्तावित सहयोग के इस गठबंधन का मक़सद आतंकवाद के ख़िलाफ़ मुहिम में इस क्षेत्र की भूमिका को ऐसे वक़्त में बढ़ाना है, जब ट्रंप अमेरिका द्वारा मुहैया कराई जाने वाली सुरक्षा के एवज में क़ीमत वसूलने के मौक़े तलाश रहे हैं. इन मतभेदों के बावजूद इस्लामिक स्टेट द्वारा जो वैचारिक ख़तरा पेश किया जा रहा है, उसको हल्के में नहीं लिया जा सकता है, ख़ास तौर से ऐसे समय में जब यथार्थवादी राजनीति और विचारधारा के बीच संतुलन बनाने की ज़रूरत है. हो सकता है कि आम लोगों को ये अस्थायी रवैया न समझ में आए. लेकिन, इनसे निश्चित रूप से वैचारिक नैरेटिव के इर्द गिर्द समर्थन खड़ा किया जा सकता है. मिसाल के तौर पर हमास के संस्थापक दिवंगत शेख़ अहमद यासीन को लेकर जिहादी इकोसिस्टम के भीतर राय बंटी हुई है. 2018 में इस्लामिक स्टेट के एक मुखपत्र ने यासीन को ‘तकफीर’ यानी इस्लाम को न मानने वाला घोषित कर दिया था, क्योंकि हमास ने लोकतांत्रिक चुनावों में हिस्सा लिया था और इस्लाम के ऊपर सियासत को प्राथमिकता दी थी. जबकि, ओसामा बिन लादेन यासीन को एक भला इंसान मानता था. इससे न केवल उग्रवादी इस्लामिक विचारधाराओं के बीच मतभेद साफ़ तौर पर दिखते हैं, बल्कि इससे ग़ज़ा में युद्ध और फिलिस्तीन के व्यापक मसले से जुड़ी जटिलताओं का भी पता चलता है. सभी मुस्लिम बहुसंख्यक देशों को इन चुनौतियों से भी निपटना होगा.
निष्कर्ष
इस्लामिक स्टेट जैसे संगठन का पूरी तरह से सफ़ाया शायद मुमकिन नहीं होगा. ऐसे में इस समस्या से निपटने की नीति को लेकर बदलाव करने की ज़रूरत है. इसके लिए दूरगामी प्रतिबद्धता की आवश्यकता है, जो शायद अमेरिका लंबे समय तक न दे सकेगा. क्षेत्र के देशों द्वारा अपनी क्षमता के आधार पर प्रतिरोध का एक ढांचा खड़ा करना एक विकल्प हो सकता है, जो कम से कम अब तक तो नहीं दिखा है. आगे चलकर शायद इलाक़ाई और क्षेत्रीय ज़रूरतों की समानता देशों को ऐसा करने को मजबूर करे. दुनिया भर में आतंकवाद से निपटने की क्षमताएं अभी भी अमेरिका के शक्ति प्रदर्शन पर बहुत अधिक निर्भर हैं. उसकी जगह ले पाने की क्षमता फिलहाल तो किसी और में नहीं दिखती है.
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