पूरी दुनिया में तेज़ी के साथ जनसंख्या बढ़ रही है और इसकी वजह से तमाम संसाधनों पर भी ज़बरदस्त दबाव पड़ रहा है. मौज़ूदा हालातों के मद्देनज़र आज सबसे बड़ी ज़रूरत विभिन्न संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करने की है और इसके लिए गवर्नेंस के नए-नए तरीक़ों को अमल में लाने की है. ज़ाहिर है कि पूरी दुनिया में लगातार बढ़ती जनसंख्या के कारण पैदा होने वाली दिक़्क़तों का समाधान निकालने और नीतियां बनाने के लिए देशों की सरकारें ही प्रमुख रूप से ज़िम्मेदार हैं. इसमें कोई संदेह नहीं है कि आबादी में बेतहाशा बढ़ोतरी की वजह से पैदा होने वाली तरह-तरह की चुनौतियों एवं इसके दुष्प्रभावों की वजह से विभिन्न देशों में प्रशासन से जुड़े उन संस्थानों और विभागों पर भी ज़बरदस्त दबाव पड़ता है, जिन पर विकास को जारी रखने और लोगों की सुख-समृद्धि का उत्तरदायित्व है. गवर्नेंस से जुड़े तंत्र को जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, उनमें संसाधानों के समुचित वितरण से जुड़े विवाद, सुनियोजित शहरीकरण का अभाव, जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव जैसी चुनौतियां शामिल हैं. इसके अलावा शासन के सामने पैदा होने वाली अन्य चुनौतियों में स्वास्थ्य एवं शिक्षा से संबंधित मांगों की पूर्ति करना, सामाजिक-सांस्कृतिक और पहचान से जुड़े मतभेदों को संभालना, व्यापक स्तर पर आंकड़ों को जुटना और विश्लेषण करना, लोगों के विस्थापन की समस्या से निपटना, कामगारों की ज़रूरतों को पूरा करना, वैश्विक स्तर पर उपजे विवादों से निपटना, राजनीतिक नुमाइंदगी की मांग को पूरा करना और आर्थिक प्रगति को बनाए रखने जैसे मुद्दे भी शामिल हैं.
गवर्नेंस और विकास से संबंधित ये सारे मुद्दे ऐसे हैं, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र के सभी 17 सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) में किसी न किसी रूप में समाहित किया गया है. इस साल विश्व जनसंख्या दिवस पर सबसे अधिक फोकस विस्तृत और सटीक आंकड़ों को जुटाने पर है.
गवर्नेंस और विकास से संबंधित ये सारे मुद्दे ऐसे हैं, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र के सभी 17 सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) में किसी न किसी रूप में समाहित किया गया है. इस साल विश्व जनसंख्या दिवस पर सबसे अधिक फोकस विस्तृत और सटीक आंकड़ों को जुटाने पर है. इसके अलावा, सार्वजनिक सेवा वितरण से जुड़े शासन तंत्र के विकेंद्रीकरण पर भी ख़ास ध्यान दिया जा रहा है और इसके लिए आंकड़ों के मुताबिक़ लोगों तक सेवाएं और लाभ पहुंचाने पर ज़ोर दिया जा रहा है. देखा जाए तो आम लोगों को समस्याओं से निजात दिलाने के लिए यह नज़रिया बेहद महत्वपूर्ण है.
सतत विकास लक्ष्यों का ‘स्थानीयकरण’
जनसंख्या विस्फोट की वजह से पैदा होने वाली ज़्यादातर समस्याएं ऐसी हैं, जो लगभग पूरी दुनिया में एक जैसी हैं, जबकि कुछ परेशानियां कुछ अलग तरह की हैं. ज़ाहिर है कि इन समस्याओं का समाधान निकालना गवर्नेंस की सबसे बड़ी चुनौती है. इस चुनौती का हल निकालने के लिए ज़मीनी स्तर पर कार्य करने वाली संस्थाओं और कर्मचारियों को ज़िम्मेदारी सौंपना या कहा जाए कि अधिकारों का विकेंद्रीकरण करना बहुत ज़रूरी है. SDG 16 में भी ज़मीनी स्तर पर सशक्त संस्थाओं के निर्माण की बात कही गई है. इसी पर चलते हुए मौज़ूदा वैश्विक व्यवस्था भी जनसंख्या की बढ़ोतरी और उसकी वजह से संसाधनों पर पड़ने वाले दवाब के मद्देनज़र शासन के विकेंद्रीकरण की वक़ालत करती है, साथ ही स्थानीय स्तर पर मज़बूत संस्थाओं के निर्माण पर बल देती है. देखा जाए तो गवर्नेंस का मसला अत्यधिक पेचीदा होता जा रहा है. सच्चाई यह है कि एक ही तरह के शासन मॉडल को हर जगह पर लागू नहीं किया जा सकता है, क्योंकि हर क्षेत्र की ज़रूरतें और समस्याएं अलग होती हैं. ऐसे में क्षेत्र विशेष के हिसाब से गवर्नेंस का तरीक़ा अपनाना होता है. ऐसे में स्थानीय समुदाय द्वारा संचालित स्वशासन संस्थाओं को अधिक ताक़त प्रदान करना कहीं न कहीं ज़्यादा प्रभावशाली एवं समावेशी गवर्नेंस फ्रेमवर्क के लिए बेहद आवश्यक है. निसंदेह रूप से स्थानीय समुदायों को यह अच्छी तरह से पता होता है कि उनकी समस्याएं क्या हैं, उनकी ज़रूरतें क्या हैं और उनके लिए किस प्रकार का विकास आवश्यक है, यानी टिकाऊ विकास का मॉडल कैसा होना चाहिए. इसीलिए, अगर गवर्नेंस की स्थानीय संस्थाओं का सशक्तिकरण किया जाता है, तो यह न केवल लोगों तक बेहतर तरीक़े से सेवाओं और योजनाओं को पहुंचाने में मददगार होता है, बल्कि लंबे समय में अधिक लचीले और आत्मनिर्भर स्थानीय प्रशासनिक ढांचे को विकसित की राह भी तैयार करता है.
शासन तंत्र का विकेंद्रीकरण किस प्रकार होता है इसके बारे में चर्चा करने के बजाए, सबसे बड़ी ज़रूरत स्थानीय समुदाय को सशक्त बनाने की है और इस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए. स्थानीय समुदायों को सशक्त करने से ही वे लोकल गवर्नेंस और आम लोगों के कल्याण से जुड़ी चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हो पाएंगे.
सामाजिक विविधता एवं जनसंख्या में बढ़ोतरी जैसी दिक़्क़तों से जूझ रहे एशिया और अफ्रीका के कई ऐसे क्षेत्र हैं, जो शासन के तौर-तरीक़ों को बदलने के लिए कोशिशें कर रहे हैं और इसकी सराहना की जानी चाहिए. उनकी इन कोशिशों के अंतर्गत सिर्फ़ दिखावे के लिए अधिकारों का विकेंद्रीकरण नहीं किया जा रहा है, बल्कि सही मायने में ज़मीनी स्तर पर सत्ता का विकेंद्रीकरण किया जा रहा है. इसका मकसद वास्तविकता में अंतिम छोर पर लचीले शासन का इकोसिस्टम विकसित करना है.
विकेंद्रीकरण की परिभाषा
व्यापक रूप से देखा जाए तो तमाम दस्तावेज़ों और पुस्तकों में विकेंद्रीकरण के बारे में काफ़ी कुछ बताया गया है और विभिन्न तरीक़ों से इसे परिभाषित किया गया है. विकेंद्रीकरण को 'स्टेट रिफॉर्म' यानी सरकारी स्तर पर किए जाने वाले एक सुधार के तौर पर भी समझा जा सकता है, जिसमें सरकार की राजनीतिक और प्रशासनिक संस्थाओं के प्रभाव या अधिकार वाले केंद्रीकृत मॉडल में बदलाव किया जाता है. यानी केंद्रीय स्तर पर मौज़ूद अधिकारों और शक्तियों को स्थानीय स्तर पर सरकारी निकायों को सौंपा जाता है और इस प्रकार से विकेंद्रीकृत व्यवस्था स्थापित की जाती है. कहने का मतलब है कि विकेंद्रीकरण में साफ तौर सरकारी तंत्र और व्यवस्था में उच्च स्तर पर दी गईं शक्तियों और अधिकारों को निचले स्तर पर मौज़ूद विभागीय अधिकारियों, प्रतिनिधियों या संस्थाओं को स्थानांतरित किया जाता है.
शासन तंत्र का विकेंद्रीकरण किस प्रकार होता है इसके बारे में चर्चा करने के बजाए, सबसे बड़ी ज़रूरत स्थानीय समुदाय को सशक्त बनाने की है और इस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए. स्थानीय समुदायों को सशक्त करने से ही वे लोकल गवर्नेंस और आम लोगों के कल्याण से जुड़ी चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हो पाएंगे. इस लिहाज़ से देखा जाए तो ऐसे दो महत्वपूर्ण पहलू हैं, जो विकेंद्रीकृत शासन के लिए ज़िम्मेदार संस्थाओं की कार्यक्षमता और योग्यता को सुनिश्चित करते हैं. पहला पहलू है कि विकेंद्रीकृत शासन व्यवस्था के लिए उत्तरदायी स्थानीय संस्थाएं या निकाय किस प्रकार से बने हैं और उन्हें किस तरह की शक्तियां व अधिकार हासिल हैं. यानी लोकल सेल्फ-गवर्नमेंट या कहें स्थानीय स्वशासन निकाय का गठन चुनाव के माध्यम से हुआ है या नहीं यह अहम है. अगर इनका निर्माण चुनाव के ज़रिए हुआ है, तो स्थानीय स्वशासन संस्थाओं को ज़मीनी स्तर पर अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता के साथ काम करने का अवसर मिलता है और उन्हें लोगों का भी भरपूर सहयोग मिलता है. इतना ही नहीं, स्थानीय स्तर की इन प्रशासनिक इकाइयों को जो भी शक्तियां दी गई हैं, उससे कहीं न कहीं उनकी क्षमता बढ़ी है और वे समझबूझ के साथ स्वतंत्र रूप से न केवल नीतियों के बारे सोचती हैं, बल्कि उन्हें प्रभावी तरीक़े से ज़मीन पर लागू भी कर पाती हैं. इसके अलावा, जैसे-जैसे स्थानीय स्तर पर आंकड़ों को इकट्ठा करने और उन्हें अलग-अलग संस्थानों के साथ साझा करने की अवाश्यकता बढ़ती जा रही है, वैसे-वैसे उप-राष्ट्रीय संस्थानों यानी स्थानीय स्तर पर काम करने वाली शासन इकाइयों की ज़रूरत भी बढ़ी है. ज़ाहिर है कि आज के दौर में जनसांख्यिकीय मापदंडों और विकास से जुड़े विभिन्न पहलुओं के बारे में विस्तृत आंकड़े बेहद अहम हैं और संबंधित हितधारकों को इन्हें उपलब्ध कराना ज़रूरी है. ख़ास तौर पर ज़मीनी स्तर पर किस प्रकार की समस्याएं हैं और क्या ज़रूरतें हैं, उनके मुताबिक़ मुकम्मल नीतियों को तैयार करने और उन्हें लागू करने के लिहाज़ से व्यापक रूप से जुटाए गए छोटी-छोटी चीज़ों से जुड़े यह आंकड़े बेहद महत्वपूर्ण होते हैं.
सत्ता के विकेंद्रीकरण का प्रभाव
निचले स्तर पर विकेंद्रीकरण के प्रभाव के बारे में किए गए कई अध्ययनों के मुताबिक़ पूरे एशिया में अधिकारों का विकेंद्रीकरण करने से शासन एवं विकास से संबंधित मानकों में सकारात्मक बदलाव आया है. इतना ही नहीं, शासन की शक्तियों को निचले स्तर पर सौंपने के फायदों को देखते हुए व्यापक रूप से स्थानीय स्तर पर उप-राष्ट्रीय सरकारों (SNGs) यानी स्थानीय निकायों या ग्राम पंचायतों का सशक्तिकरण करके सतत विकास लक्ष्यों का भी स्थानीयकरण करने की मांग की जा रही है. वर्तमान में सरकारी नीतियों को ज़मीनी स्तर पर प्रभावशाली तरीक़े से कार्यान्वित करने के लिए स्थानीय निकायों या ग्राम पंचायतों की भूमिका तेज़ी से बढ़ती जा रही है. इसके अलावा विभिन्न हितधारकों के बीच सामंजस्य और साझेदारी स्थापित करने के प्रमुख केंद्र के रूप में और स्थानीय निवासियों एवं सरकार के बीच एक माध्यम के तौर पर भी शासन की इन स्थानीय इकाइयों की भूमिका बेहद अहम होती जा रही है. इतना ही नहीं, जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और 2030 एजेंडा जैसे वैश्विक मुद्दों को लेकर योजना तैयार करने और उन्हें आगे बढ़ाने में भी इन स्थानीय प्रशासनिक इकाइयों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है. उदाहरण के तौर पर अगर भारत की बात की जाए, तो यहां ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में स्थानीय निकाय या ग्राम पंचायत जैसी संस्थाएं मौज़ूद हैं और इन्हें संवैधानिक तौर पर तमाम अधिकार भी मिले हुए हैं. इन संस्थाओं ने जिस प्रकार से स्थानीय स्तर पर गवर्नेंस से जुड़ी अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाया है, उसने शासन के विकेंद्रीकरण के महत्व को साबित किया है.
भारत की ग्राम पंचायतों और नगर निकायों में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की अच्छी-ख़ासी संख्या है. एक लिहाज़ से ग्राम पंचायतें और नगर निकाय कहीं न कहीं लैंगिक रूप से समावेशी संस्थाओं में बदल गए हैं.
भारत में ग्रामीण इलाक़ों में पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) और शहरी क्षेत्रों में नगर निकायों जैसी चुने हुए प्रतिनिधियों वाली स्वशासन संस्थाएं स्थानीय स्तर पर दिन-प्रतिदिन के गवर्नेंस से जुड़े मसलों का प्रभावशाली तरीक़े से समाधान निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं. इतना ही नहीं भारत की ग्राम पंचायतों और नगर निकायों में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की अच्छी-ख़ासी संख्या है. एक लिहाज़ से ग्राम पंचायतें और नगर निकाय कहीं न कहीं लैंगिक रूप से समावेशी संस्थाओं में बदल गए हैं. इसके अलावा, इन संस्थानों में बड़ी संख्या में मौज़ूद महिला प्रतिनिधि ज़मीनी स्तर पर स्थानीय शासन में भी अहम भूमिका निभा रही हैं. भारत के साथ ही अफ्रीका के कई देशों द्वारा भी अपनी स्थानीय शासन संस्थाओं को सशक्त बनाने के लिए गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं. इन अफ्रीकी देशों द्वारा न केवल ग्रामीण और शहरी संस्थाओं में नागरिकों की अधिक से अधिक भागीदारी को बढ़ाया जा रहा है, बल्कि क्षमता निर्माण और सामाजिक उत्तरदायित से संबंधित मानकों को मज़बूती देकर ज़मीनी गवर्नेंस में सिविल सोसाइटी संगठनों को शामिल करने के लिए भी कोशिशें की जा रही हैं. लैटिन अमेरिकी देशों की बात करें तो कोस्टा रिका, पनामा, पैराग्वे, डोमिनिकन गणराज्य और उरुग्वे जैसे तमाम देशों में ऐतिहासिक रूप से केंद्रीकृत शासन व्यवस्था की परंपरा रही है. लेकिन इन देशों द्वारा भी पिछले कुछ दशकों में अधिकारों और गवर्नेंस के विकेंद्रीकरण यानी स्थानीय निकायों को सशक्त करने के लिए ठोस प्रयास किए गए हैं. विविधिताओं से भरे और अलग-अलग संस्कृतियों को संजोने वाले तमाम विकासशील देशों ने भी स्थानीय शासन से संबंधित संस्थानों को सशक्त बनाने के लिए स्थानीय समुदायों को शामिल करने हेतु प्रभावी क़दम उठाए हैं, ताकि ज़मीनी स्तर पर प्रशासन से जुड़ी गतिविधियों को संचालित करने के दौरान सामने आने वाली समस्याओं का त्वरित समाधान किया जा सके.
विकेंद्रीकृत शासन व्यवस्था की ज़रूरत
हमेशा से यही देखने में आया है कि अगर ज़मीनी हक़ीक़त को नज़रंदाज़ कर केंद्रीय स्तर पर फैसले लिए जाते हैं, तो वे कारगर साबित नहीं होते हैं और उनका विभिन्न वर्गों पर अलग-अलग असर पड़ता है. कहने का मतलब है कि केंद्रीयकृत नीतियों और निर्णयों से अमूमन जो शासन व्यवस्था तैयार होती है, वो एकतरफा होती है, यानी उसमें समाज के सभी समूहों के हितों का ध्यान नहीं रखा जाता है. केंद्रीकृत शासन संरचना के ज़रिए जो नीतियां तैयार की जाती हैं, अक्सर वे नाक़ाम साबित होती हैं, उनसे सामाजिक रोष फैलता है और असमान विकास होता है. इसके अलावा केंद्रीय शासन व्यवस्था को तवज्जो देने से स्थानीय स्तर पर मौज़ूद सामुदायिक शासन इकाइयों के पास न कोई अधिकार रह जाते हैं और न ही उनका कोई महत्व ही बचता है. जिस प्रकार से वर्तमान में पूरी दुनिया में जनसंख्या विस्फोट हो रहा है और ज़्यादातर देश संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं, साथ ही दुनिया भर के लोग सामाजिक-सांस्कृतिक असुरक्षा एवं आर्थिक असुरक्षा का सामना कर रहे हैं, इन हालातों में गवर्नेंस से जुड़ी व्यवस्थाओं का विकेंद्रीकरण करना आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है. इसके अलावा, ज़मीनी स्तर पर विकास कार्यों से संबंधित नीतियों को बनाने के दौरान व्यापक स्तर पर जुटाए गए अलग-अलग आंकड़ों को तरजीह देने की भी आवश्यकता है, ताकि स्थानीय समुदायों का सशक्तिकरण किया जा सके और समाज के अंतिम व्यक्ति तक सरकारी योजनाओं एवं नीतियों के लाभ पहुंचाए जा सकें.
ज़मीनी स्तर पर विकास कार्यों से संबंधित नीतियों को बनाने के दौरान व्यापक स्तर पर जुटाए गए अलग-अलग आंकड़ों को तरजीह देने की भी आवश्यकता है, ताकि स्थानीय समुदायों का सशक्तिकरण किया जा सके और समाज के अंतिम व्यक्ति तक सरकारी योजनाओं एवं नीतियों के लाभ पहुंचाए जा सकें.
अंबर कुमार घोष ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं.
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