पेरिस में जलवायु परिवर्तन के मसले पर वार्ताओं के अनगिनत दौर से एक अच्छी खबर के साथ-साथ एक बुरी खबर भी उभर कर सामने आई है। बुरी खबर का वास्ता तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस तक ही सीमित रखने के बहुचर्चित लक्ष्य से है। यही नहीं, इस बुरी खबर में तापमान वृद्धि को इससे भी कम महज 1.5 डिग्री सेल्सियस तक ही सीमित रखने की आकांक्षा भी निहित है। समस्या खुद यह लक्ष्य नहीं, बल्कि वे आइडिया अथवा पूर्वानुमान हैं जिनके बल पर इस लक्ष्य को पा लेने की बातें कही जा रही हैं। जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल की ओर से प्रतिनिधि एकाग्रता मार्ग (आरसीपी) से संबंधित जितने भी परिदृश्य पेश किए गए हैं उनमें से केवल एक ही परिदृश्य हमें 2 डिग्री सेल्सियस की उम्मीद बंधा रहा है। यह है ‘आरपीसी 2.6’ , जिसमें इस बात की परिकल्पना की गई है कि हम सभी ने वैश्विक स्तर पर कार्बन कैप्चर और स्टोरेज (बीईसीसीएस) के साथ बायोमास ऊर्जा की एक बड़ी मात्रा सुनिश्चित अथवा स्थापित कर दी है। बीईसीसीएस एक नकारात्मक (निगेटिव) उत्सर्जन प्रौद्योगिकी (नेट) है जिसमें बायोमास से जुड़े कच्चे माल (फीडस्टॉक) को तैयार किया जाता है और फिर उन्हें जलाकर बिजली पैदा की जाती है, जबकि अपशिष्ट अथवा कचरे के प्रवाह से कार्बन को अवशोषित या हासिल करने के बाद उसे इकट्ठा किया जाता है। तरल जैव ईंधन के उत्पादन से जैव विविधता और भूमि के उपयोग, विशेष कर उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में पड़ने वाले प्रभावों के अनुभवों से यह पता चलता है कि बड़े पैमाने पर बीईसीसीएस का उपयोग करने से खाद्य सुरक्षा, जल संसाधन और जैव विविधता पर व्यापक असर पड़ेगा, जो कि वास्तव में चौंका देने वाला होगा। नेट के अन्य विकल्प भी हैं। इनमें व्यापक अपक्षय भी शामिल है जिसमें एक खनिज को भूमि पर फैलाया जाता है, ताकि वायुमंडल से कार्बन को अवशोषित करने संबंधी मिट्टी की क्षमता बढ़ सके। एक अन्य विकल्प के तहत कैल्शियम या लोहे को सागर में मिलाया जाता है, जिससे कि हवा से कार्बन को हासिल किया जा सके। बड़े पैमाने पर वनीकरण भी इसके विकल्पों में शामिल है। कुछ वैज्ञानिक वर्तमान में यांत्रिक उपकरणों को विकसित कर रहे हैं जो आसपास की वायु से कार्बन को हासिल करेंगे, ताकि इसे या तो एक संकुचित स्वरूप में जमीन के अंदर अलग रखा जा सके अथवा कार्बोनेट चट्टान में परिवर्तित किया जा सके। लेकिन हमें इस बारे में पक्की जानकारी नहीं है कि क्या ये प्रौद्योगिकियां वास्तव में काम करेंगी, वे व्यावहारिक दृष्टि से कितनी विश्वसनीय होंगी, अथवा कार्बन को अलग रखने का तरीका आखिरकार कितना सुरक्षित होगा। हमें इस बारे में भी बहुत कम पता है कि बड़े पैमाने पर संसाधनों के इस्तेमाल से इसका क्या असर पड़ेगा। क्या हम उस समय सीमा में इस तकनीकी प्रणाली का निर्माण कर सकते हैं जिससे कि वास्तव में सदी के मध्य तक जलवायु पर किसी तरह का व्यापक प्रभाव पड़ सकता है? कार्बन के मूल्य में स्थिरता के अभाव में इन सभी की कीमत आखिरकार किसे चुकानी पड़ेगी? इसका वित्तपोषण कैसे होगा? अन्य जलवायु और विकास अनिवार्यताओं से संसाधनों को दूर कर देने की स्थिति में अवसरों के रूप में क्या कीमत चुकानी पड़ेगी? क्या इस तरह की तकनीकों से एक ऐसा नैतिक जोखिम पैदा होगा जो लोगों को इसमें कमी करने के पारंपरिक तरीकों को अपनाने के प्रयासों को लेकर बेपरवाह कर देगा? क्या हमारे पास एक पर्याप्त नियामक व्यवस्था है? नतीजतन, ऐसे कई कारण हैं जिनसे यह प्रतीत होता है कि इससे आगे चलकर समस्या पैदा होगी। इसके बावजूद वर्तमान में कोई भी सरकार, कोई बड़ी अनुसंधान परिषद या वित्त मुहैया कराने वाला निकाय इन प्रौद्योगिकियों के समुचित आकलन का समर्थन नहीं कर रहा है। ‘आरपीसी 2.6’ में इनका सिर्फ अनुमान भर लगाया गया है। अत: बुरी खबर यह है कि किसी भी तरह की नकारात्मक उत्सर्जन प्रौद्योगिकी के बिना ही 2 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को अपनाना कोई जादुई सोच जैसा प्रतीत होता है। 1.5 डिग्री सेल्सियस की आकांक्षा की बात तो और भी जुदा है। किसी को या तो इन प्रौद्योगिकियों पर गंभीर अनुसंधान कार्यों का वित्तपोषण करना चाहिए अथवा मॉडल या प्रतिरूप तैयार करने वालों को उत्सर्जन संबंधी परिदृश्यों से इन काल्पनिक प्रौद्योगिकियों को एकदम से बाहर कर देना चाहिए और यह बात भलीभांति मान लेनी चाहिए कि पेरिस वार्ताओं में परिकल्पित 1.5 डिग्री सेल्सियस का लक्ष्य बेहद कठिन है। यही बुरी खबर है।
एक अच्छी खबर भी है। दो टूक शब्दों में, अच्छी खबर यह है कि पेरिस वार्ता में आखिरकार क्योटो प्रोटोकॉल के मोह से बाहर आकर एक नया दांव चलने का सटीक निर्णय ले लिया गया। दुनिया ने 20 साल गंवा दिए क्योंकि क्योटो मसविदे का स्वरूप तीन भ्रामक उपमाओं पर आधारित था। प्रथम उपमा का वास्ता ओजोन रिक्तीकरण से था, जो वायुमंडल में गैसों के मानवजनित उत्सर्जन से निपटने का एक मॉडल प्रतीत होता है। अपने फ्रेमवर्क कन्वेंशन और कार्यान्वयन प्रोटोकॉल के साथ ओजोन व्यवस्था स्पष्ट रूप से सीएफसी से निपटने की ‘टॉप-डाउन’ पद्धति थी। इसने ओजोन की दिशा में काम तो किया, लेकिन जलवायु परिवर्तन से संबंधित इस उपमा में बड़ी खामी थी। सीएफसी औद्योगिक रूप से उत्पादित कृत्रिम गैसें थीं जिनके उत्पादकों की संख्या बेहद कम थी और एक आसानी से उपलब्ध तकनीकी विकल्प भी था। ये स्थितियां ग्रीनहाउस गैसों के मामले में नहीं हैं। द्वितीय उपमा का वास्ता यूएसईपीए सल्फर ट्रेडिंग कार्यक्रम से था। यह कार्यक्रम सल्फर डाइऑक्साइड (एसओ2) प्रदूषण को कम करने के लिहाज से बहुत सफल था, क्योंकि इसमें प्रदूषणकारी विद्युत उपक्रमों को कहीं ज्यादा स्वच्छ तरीके से बिजली पैदा करने वाले उद्यमों से अतिरिक्त उत्सर्जन परमिट खरीद कर अप्रिय कोयला जलाने की अनुमति दी गई थी। हालांकि, इस उपमा में भी खामी थी। एसओ2 एक एकल गैस थी, जो एक छोटे से बाजार में एकल कानूनी व्यवस्था का विनियमन करती थी और इससे महज कुछ व्यापारीगण ही जुड़े हुए थे। कई ग्रीनहाउस गैसों के वैश्विक व्यापार के कारण इसे भी एक बेहतर उपमा नहीं माना जा सकता है। तृतीय उपमा का वास्ता सामरिक शस्त्र कटौती संधि (स्टार्ट) से था जिससे क्योटो प्रोटोकॉल ने पारस्परिक रूप से सत्यापन योग्य एवं विभिन्न चरणों में कटौती वाला आइडिया लिया। लेकिन ‘स्टार्ट’ सिर्फ दो सरकारों के बीच हुई एक संधि थी और जिसका उद्देश्य उन परमाणु हथियारों पर नियंत्रण करना था, जो सीधे उनके नियंत्रण में थे। जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटने के लिहाज से इसे भी एक बेहतर उपमा नहीं माना जा सकता था। इसके बाद जलवायु परिवर्तन पर जो भी वार्ताएं हुईं उनमें इसे महज बुनियादी स्तर की समस्या समझा गया, जिसके तहत जलवायु परिवर्तन के जटिल मुद्दे को पुराने ज़माने यानी साठ के दशक की ‘अस्थायी समाधान वाली प्रदूषण समस्या’ की तरह माना गया, लेकिन इस पर राष्ट्रीय जरूरतों के हिसाब से अमल किया गया। चुनौती बस इतनी थी कि इन काल्पनिक पाइपों से बाहर आने वाले प्रदूषण को किस तरह से सीमित रखा जाए। यह खासकर ऐसे समय में अवश्य ही बेहद सरल है जब हम यह समझते हैं कि दुनिया को वर्तमान में उपलब्ध ऊर्जा की तुलना में बहुत ज्यादा ऊर्जा की आवश्यकता है। इस धरती पर अभी भी ऐसे 1.6 अरब लोग हैं, जिनकी पहुंच बुनियादी ऊर्जा तक संभव नहीं हो पाई है। इसमें कोई ताज्जुब की बात नहीं है कि क्योटो दृष्टिकोण को शुरू से ही बेकार मान लिया गया था और अंतत: पेरिस में इससे पूरी तरह पल्ला झाड़ दिया गया। हालांकि, पेरिस से बदलाव की जो रूपरेखा उभर कर सामने आई है उससे वे लोग अस्वाभाविक रूप से परिचित हैं जो अस्सी के दशक में जलवायु नीति पर काम कर रहे थे। ऐसे समय में जब यूएनएफसीसी पर वर्ष 1992 में विचार-विमर्श जारी था, तो उस समय विचाराधीन कार्यान्वयन वाली व्यवस्थाएं ‘नीतियों एवं उपायों’ और ‘संकल्प एवं समीक्षा’ के रूप में थीं। उस समय विचार यही था कि विभिन्न देशों को अपनी विशिष्ट क्षमताओं, संसाधन क्षमता और विकासात्मक चरणों के आधार पर अपनी नीतियां विकसित करने की अनुमति दी जाए। इसके बाद वे समय-समय पर एकत्रित होकर इस बात पर सामूहिक रूप से गौर करेंगे कि प्रत्येक देश ने क्या हासिल किया है और कैसे। उस समय विचार यह था कि सभी देश एक-दूसरे से यह सीखेंगे कि कौन-कौन से आइडिया काम आ रहे हैं और कौन-कौन से आइडिया काम नहीं आए। इसके तहत विभिन्न निकायों को तरह-तरह के प्रयोग करने के साथ-साथ नीतिगत व्यवस्थाएं करने की भी अनुमति दी जाएगी। क्योटो में इस दृष्टिकोण का स्थान कार्बन के वैश्विक मूल्य निर्धारण की नव उत्कृष्ट-आर्थिक कल्पना ने ले लिया था जिसमें जलवायु परिवर्तन से जुड़ी सभी समस्याओं का निराकरण निहित था। पेरिस में हुई वार्ताओं ने जलवायु नीति को क्योटो से पहले वाली स्थिति में वापस ला दिया है। ‘नीतियों और उपायों’ के मूल विचार को अब ‘राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान’ में शामिल कर लिया गया है; ‘संकल्प और समीक्षा’ को प्रस्तावित पंचवर्षीय समीक्षा चक्र के रूप में पुनः शुरू किया गया है। इसने जलवायु परिवर्तन की दिशा में कार्रवाई के लिए एक ‘बहु-केंद्रित’ दृष्टिकोण अपनाने का दरवाजा खोल दिया है, जिसके तहत विभिन्न देशों में अक्षय निधि, क्षमताओं और विकास प्राथमिकताओं में विविधता होने की बात को भलीभांति स्वीकार किया जाता है। इसमें ज्यादा कार्बन उत्पादन पर टैक्स लगाने के बदले में सकारात्मक स्थानीय और अल्पकालिक आकांक्षाओं को विकल्प माना गया है। यह इस मानक तर्क को पलटने का एक अच्छा अवसर है कि जलवायु संबंधी कार्रवाई से सहायक लाभ होंगे। इसके साथ ही यह इस तर्क को पेश करने का एक अच्छा मौका है कि सतत स्थानीय विकास, हवा की गुणवत्ता बेहतर करना और ऊर्जा का आधुनिकीकरण ही ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को नियंत्रित करने का सबसे अच्छा तरीका है। ये ऐसे लक्ष्य हैं जो अपने-आप में अच्छे हैं और जिनसे उन लोगों को फायदा होगा जहां वे आज अवस्थित हैं, न कि लंबे अर्से बाद दूर-दराज में रहने वाले लोगों को लाभ होगा। यदि इन पर सही ढंग से अमल किया गया तो उससे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी कम होगा। यह दृष्टिकोण अवरोध पर संवाद के बजाय अवसर पर संवाद का माहौल बना सकता है। इस बहु-केंद्रित दृष्टिकोण से निष्पक्षता (इक्विटी) से जुड़े मसलों को कहीं और अधिक प्रभावी ढंग से सुलझाने का अवसर मिल सकता है, जो कि पिछली व्यवस्था में संभव नहीं था। ब्रिटेन के सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख द्वारा हाल ही में दी गई राय के मुताबिक, एक और पेचीदा संभावित लाभ यह है कि वैसे तो पेरिस व्यवस्था के तहत उत्सर्जन में कटौती अंतरराष्ट्रीय कानून के अंतर्गत कानूनी तौर पर बाध्यकारी नहीं है, लेकिन देश के विधान, प्रांतीय कानूनों और शहरों के उपनियमों के जरिए इसे राष्ट्रीय और स्थानीय स्तरों पर कानूनन बाध्यकारी बनाया जा सकता है। क्योटो प्रोटोकॉल की तर्ज पर एक कानूनन बाध्यकारी समझौते का लक्ष्य वास्तव में हमेशा ही व्यर्थ था, क्योंकि एक समुचित एवं कारगर क्रियान्वयनकारी व्यवस्था स्थापित करना कभी भी संभव नहीं था। बहु-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाने से उत्सर्जन न्यूनीकरण की पुनर्संरचना को एक अस्थायी पर्यावरणीय समस्या के बजाय एक प्रौद्योगिकी चुनौती के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। वैसे तो पिछले दशक में नवीकरणीय ऊर्जा की लागत में अच्छी–खासी कमी देखने को मिली है, लेकिन इसके बावजूद पवन एवं सौर अब भी अस्थायी ऊर्जा स्रोत ही हैं और बिजली ग्रिडों में ऊर्जा के व्यापक भंडारण का कोई बहुत संतोषजनक तरीका हमारे पास नहीं है। अत: इस बाधा से पार पाने की जरूरत है। वैसे तो घरेलू बैटरी भंडारण से युक्त वितरित उत्पादन उपनगरीय दक्षिणी कैलिफोर्निया में बहुत अच्छी तरह से काम कर सकता है, लेकिन यह दिल्ली जैसे उपनगरीय विस्तार वाले प्रमुख शहरों के लिए कोई समाधान नहीं हो सकता है। ऊर्जा भंडारण जैसी प्रौद्योगिकी चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार द्वारा वित्तपोषित अनुसंधान विकास, प्रदर्शन और तैनाती (आरडीडीएंडडी) आवश्यक है, ताकि अन्वेषकों के लिए जोखिम कम हो सके। अपरंपरागत गैस निष्कर्षण प्रौद्योगिकी की सफलता इसकी अहमियत को दर्शाती है, क्योंकि इसे काफी हद तक अमेरिकी ऊर्जा विभाग से प्राप्त धन से विकसित किया गया था। हालांकि, सरकार द्वारा सतत ऊर्जा से संबंधित आरडीडीएंडडी का वित्तपोषण कमोबेश पर्याप्त नहीं है। देश उसी अनुसंधान पर बड़ी राशि खर्च करते हैं जिसमें उन्हें अपने लिए रणनीतिक लाभ या अनिवार्यता नजर आती है। उदाहरण के लिए, यह अनुमान लगाया गया है कि अमेरिका और चीन सैन्य अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) पर प्रति वर्ष लगभग 80 अरब अमेरिकी डॉलर खर्च करते हैं। प्रति टन 5 अमेरिकी डॉलर के सामान्य कार्बन टैक्स से हर साल अमेरिका और चीन में लगभग 30 अरब डॉलर और विश्व स्तर पर प्रति वर्ष 80-150 अरब डॉलर की बड़ी राशि जुटाई जा सकती है, जो कमोबेश उतनी ही रकम है जिसे अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की दलील के मुताबिक ऊर्जा अनुसंधान पर खर्च किया जाना चाहिए। भारत में पहले से ही एक ‘कोयला टैक्स’ है जिसे इसी स्तर के आसपास तय किया गया है। विशेषकर तकनीकी नवाचार में निवेश के उद्देश्य से इसी तरह के मामूली कराधान का प्रावधान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जलवायु समझौते में किया जा सकता है अथवा इसे राष्ट्रीय स्तर पर या बहुपक्षीय क्लबों द्वारा लागू किया जा सकता है, जिसके लिए वैश्विक स्तर पर आम सहमति हेतु इंतजार करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। ऊर्जा आधुनिकीकरण दृष्टिकोण में भारत और चीन के लिए वास्तविक अवसर हैं, जिसकी गुंजाइश क्योटो प्रोटोकॉल में कतई नहीं थी। जैसा कि हम पहले से ही जानते हैं कि चीन पवन और सौर ऊर्जा उत्पादन प्रौद्योगिकियों की लागत कम करने में पूरी दुनिया में अग्रणी है। इसी तरह भारत के पास वास्तव में उन स्मार्ट प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में वैश्विक अगुवाई हासिल करने का अनूठा अवसर है, जो स्मार्ट ग्रिड, स्मार्ट शहरों और स्मार्ट घरों के लिए जरूरी हैं। पेरिस में अपनाए गए बहु-केंद्रित दृष्टिकोण ने भी अनुकूलन पर अब और ज्यादा विशेष जोर देने के लिए दरवाजा खोल दिया है। अनुकूलन हमेशा ही उत्सर्जन के न्यूनीकरण का एक मामूली विकल्प रहा है। चूंकि इसे विफल उत्सर्जन न्यूनीकरण की कीमत चुकाए जाने के रूप में पेश किया जाता रहा है, इसलिए अनुकूलन को अंतरराष्ट्रीय वित्तपोषण का एक छोटा सा अंश निरंतर प्राप्त हो रहा है। हमें अनुकूलन के बारे में कुछ अलग ढंग से सोचना चाहिए। जिस तरह से हमें ऊर्जा प्रौद्योगिकी चुनौती को नया स्वरूप प्रदान करते हुए इसे उत्सर्जन को सीमित करने की चुनौती के बजाय एक ऊर्जा आधुनिकीकरण कार्यक्रम में तब्दील कर देना चाहिए, ठीक उसी तरह से हमें ‘जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन’ को नए सिरे से तय करके इसे ‘जलवायु परिवर्तनशीलता के अनुकूलन’ के रूप में तब्दील कर देना चाहिए। जलवायु पहले से ही खतरनाक है। यह बेहद खराब मौसम का रौद्र रूप धारण करके हमेशा ही लोगों को मौत के मुंह में धकेलता रहा है। हम जलवायु परिवर्तन की मार से लोगों को बचाने के लिए भारी-भरकम निवेश सुनिश्चित करते हुए आज जान-माल की रक्षा कर सकते हैं और इसके साथ ही मानवीय गरिमा को भी बढ़ा सकते हैं। ‘जलवायु परिवर्तनशीलता के अनुकूलन’ की दिशा में यदि सही ढंग से काम किया गया तो यह आगे चलकर ‘जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन’ की नींव भी रख देगा, जिसे हम न्यूनीकरण के जरिए टालने में असमर्थ हैं। एक बार फिर, पेरिस से उभर कर सामने आया बहु-केंद्रित ढांचा उन प्रभावी अनुकूलन नीतियों को अपनाने के लिए कहीं ज्यादा आशाजनक आधार प्रदान कर रहा है जो स्थानीय और निकट भविष्य की जरूरतों के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटने के लिहाज से भी प्रासंगिक हैं।
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