Published on Jul 21, 2023 Updated 0 Hours ago

मालदीव के साथ चीन के कारोबारी लेन-देन की मौजूदा रफ़्तार को देखते हुए ये कहा जा सकता है कि चीन को अपनी महत्वाकांक्षाएं पूरी करने के लिए मालदीव में सरकार बदलने का इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी.

मालदीव में चीन के बढ़ते प्रभाव ने बढ़ाई चिंता

2008 की शुरुआत से जब चीन ने हिंद महासागर में अपना संवाद बढ़ाना शुरू किया था, उसी समय से उसने मालदीव की सामरिक अहमियत को पहचान लिया था. इसकी वजह ये है कि मालदीव, भौगोलिक रूप से उन अहम समुद्री मार्गों के क़रीब पड़ता है, जो चीन की ऊर्जा संबंधी आपूर्तियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं. इसीलिए, मालदीव पर अपना प्रभाव और मज़बूत करने के लिए चीन, वहां की सरकारों को अपनी आर्थिक दरियादिली के ज़रिए लुभाने की कोशिश करता रहा है.

उल्लेखनीय है कि पूर्व राष्ट्रपति यामीन अब्दुल गयूम (नवंबर 2013 से नवंबर 2018 तक) का कार्यकाल, चीन की इन कोशिशों में काफ़ी दिलचस्पी ले रहा था. इस दौरान ऐतिहासिक रूप से भारत पर अधिर निर्भर रहे मालदीव ने भारत से दूरी बनाते हुए चीन के और नज़दीक जाने की कोशिश की थी. भारत ने मालदीव के इस रुख़ को पसंद नहीं किया था. क्योंकि, भारत चाहता था कि इस क्षेत्र पर उसका असर बरक़रार रहे. और, उसको इस बात की भी आशंका थी कि चीन जानबूझकर  अपनी आर्थिक ताक़त का इस्तेमाल करके भारत के पड़ोसी देशों के साथ नज़दीकी बढ़ा रहा था, जिससे वो भारत की घेराबंदी  कर सके.

पिछले एक दशक के दौरान चीन ने मालदीव के साथ आर्थिक संबंध काफ़ी मज़बूत कर लिए हैं. इब्राहिम सोलिह के राज में भी वो संबंध न सिर्फ़ वैसे ही मज़बूत बने रहे, बल्कि चीन आज भी बड़े धैर्य के साथ मालदीव में अपने सामरिक मक़सदों को आगे बढ़ा रहा है.

इस परिस्थितियों में जब इब्राहिम सोलिह 2018 में राष्ट्रपति बने तो माना यही गया था कि ये चीन की हार और भारत की जीत है. क्योंकि इब्राहिम सोलिह खुलकर ‘इंडिया फ़र्स्ट’ की विदेश नीति की वकालत करते रहे हैं. हालांकि, अब ये साफ़ होता जा रहा है कि ये दावा कुछ ज़्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर किया गया था. पिछले एक दशक के दौरान चीन ने मालदीव के साथ आर्थिक संबंध काफ़ी मज़बूत कर लिए हैं. इब्राहिम सोलिह के राज में भी वो संबंध न सिर्फ़ वैसे ही मज़बूत बने रहे, बल्कि चीन आज भी बड़े धैर्य के साथ मालदीव में अपने सामरिक मक़सदों को आगे बढ़ा रहा है.

चीन के प्रभाव का बढ़ता दायरा

इस समय चीन, हिंद महासागर बड़े जोश-ख़रोश के साथ हिंद महासागर में अपनी पहुंच बढ़ा रहा है. चीन के मौजूदा राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने हिंद महासागर को अपनी समुद्री सिल्क रूट (MSR) परियोजना का केंद्र बिंदु बनाया है. ये समुद्री सिल्क रूट चीन के मशहूर बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव का हिस्सा है, जिसके तहत चीन यूरेशिया और अफ्रीका में मूलभूत ढांचे की परियोजनाओं में एक ट्रिलियन डॉलर से भी ज़्यादा की रक़म का निवेश कर रहा है. जिनपिंग के राज में ही चीन ने 2017 में जिबूती में अपना पहला विदेशी सैनिक अड्डा स्थापित किया था. इसके अलावा जिनपिंग ने हिंद महासागर के छोटे द्वीपीय देशों जैसे कि सेशेल्स, मॉरीशस , श्रीलंका और मालदीव के साथ सामरिक संबंध मज़बूत बनाने को लेकर प्रतिबद्धता जताई है.

मालदीव में चीन ने अपना दूतावास 2011 में उस वक़्त खोला था, जब वहां ज़बरदस्त सियासी उथल-पुथल चल रही थी, जिसकी वजह से उस वक़्त के राष्ट्रपति मोहम्मद  नशीद को 2012 में इस्तीफ़ा देना पड़ा था. ये वही दौर था जब भारत और मालदीव के पारंपरिक रूप से मज़बूत रिश्तों में गिरावट आ रही थी, तभी चीन ने वहां अपनी कारोबारी मौजूदगी बढ़ानी शुरू की थी.

जब 2013 में अब्दुल्ला यामीन अब्दुल गयूम की सरकार बनी तो इस मामले में चीन के प्रयासों को काफ़ी तेज़ी मिली. क्योंकि अब्दुल्ला यामीन चीन के कारोबारी प्रस्तावों में काफ़ी दिलचस्पी ले रहे थे. चीन के साथ यामीन की कारोबारी साझेदारी को दो कारणों से बढ़ावा मिला. पहला तो ये कि चीन, अब्दुल्ला यामीन सरकार की तानाशाही प्रवृत्तियों की अनदेखी करने को तैयार था. मिसाल के तौर पर जब 2018 में मालदीव के सुप्रीम कोर्ट ने सियासी क़ैदियों को रिहा करने का आदेश दिया, तो इस आदेश की अनदेखी करते हुए अब्दुल्ला यामीन  सरकार ने आपातकाल लगाने का ऐलान  कर दिया. जब भारत ने उनके इस फ़ैसले पर चिंता जताई, तो चीन ने भारत को चेतावनी दी कि वो मालदीव के अंदरूनी मामलों में दख़लंदाज़ी न करे.

इसकी दूसरी वजह, अब्दुल्ला यामीन के राष्ट्रपति बनने के पहले से मौजूद थी. असल में 2011 में मालदीव का सबसे कम विकसित देश (LDC) का दर्जा ख़त्म हो गया था. इसके बाद, मालदीव को अपने यहां मूलभूत ढांचे के विकास के लिए द्विपक्षीय कारोबारी निवेश की ज़रूरत थी. क्योंकि, ये दर्जा छिनने की वजह से अब उसे अंतरराष्ट्रीय मदद मिल नहीं सकती थी. इसीलिए, 2014 में अब्दुल्ला यामीन ने मालदीव के BRI में शामिल होने का वादा किया. इससे चीन की कंपनियों द्वारा मालदीव की मूलभूत ढांचे के विकास की परियोजनाओं में निवेश का रास्ता खुला, जैसे कि चीन-मालदीव दोस्ती का पुल.

इसके अलावा, अब्दुल्ला यामीन ने 2017 में चीन के साथ मुक्त व्यापार समझौता (FTA) करने की भी कोशिश की, जिससे व्यापार बढ़े और मालदीव के मछली के निर्यात के लिए नया बाज़ार मिल सके. मालदीव में चीन के बढ़ने कारोबारी प्रभाव को लेकर भारत की नाख़ुशी के बावजूद, आनन-फानन में इस समझौते का प्रस्ताव मालदीव की संसद से पारित कराया गया, वो भी उस वक़्त जब संसद में मुट्ठी भर सांसद ही मौजूद थे और इस क़ानून की विधायी समीक्षा भी नहीं की गई थी. हड़बड़ी में किए गए इन प्रयासों के बावजूद अब्दुल्ला यामीन इस समझौते को अपने कार्यकाल में लागू नहीं करा सके और 2018 के चुनाव के बाद इब्राहिम सोलिह सत्ता में आ गए.

इब्राहिम सोलिह ने अब तक चीन के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर मुहर नहीं लगाई है. इसी वजह से चीन के मौजूदा राजदूत शिकायतें कर रहे हैं. पहली नज़र में देखें तो चीन का मालदीव के साथ मुक्त व्यापार का समझौता करना समझ से परे लगता है. 

इब्राहिम सोलिह ने अब तक चीन के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर मुहर नहीं लगाई है. इसी वजह से चीन के मौजूदा राजदूत शिकायतें कर रहे हैं. पहली नज़र में देखें तो चीन का मालदीव के साथ मुक्त व्यापार का समझौता करना समझ से परे लगता है. क्योंकि दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं में ज़मीन आसमान का अंतर है: मालदीव की GDP 5 अरब डॉलर है. वहीं इसकी तुलना में चीन की अर्थव्यवस्था 17 ट्रिलियन डॉलर की है. इसके अलावा मालदीव की कुल आबादी पांच लाख से भी कम है, जो चीन के लिए बमुश्किल ही निर्यात का एक बड़ा बाज़ार है. हालांकि, ऐसे समझौते से चीन को सामरिक रूप से अहम ठिकाने पर स्थित मालदीव जैसे द्वीपीय देश पर प्रभाव जमाने का अच्छा ज़रिया ज़रूर मिल जाता.

कारोबार करने की क़ीमत

चीन पर अक्सर ये आरोप लगते रहे हैं कि वो अपने बड़े मक़सद हासिल करने के लिए अपनी आर्थिक ताक़त का दुरुपयोग करता है. मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति और संसद के मौजूदा स्पीकर मोहम्मद  नशीद अक्सर इस बारे में बयान देते रहे हैं. इससे पता चलता है कि चीन जिन देशों के साथ कारोबार करता है, उन पर कारोबारी नज़रिए से दबदबा क़ायम करने की कोशिश करता है और अक्सर ऐसे देशों को ज़बरदस्ती क़र्ज़ के ऐसे जाल में फंसाता है, जिसके  एवज़ में वो बाद में उन देशों की संपत्तियों पर क़ब्ज़ा करता है. इसकी सबसे बड़ी मिसाल श्रीलंका के हंबनतोता बंदरगाह के तौर पर दी जाती है, जिसे चीन ने क़र्ज़ के बदले में 99 साल के पट्टे पर ले लिया है.

वैसे तो आलोचक ये तर्क देते हैं कि ऐसे दावों में हमेशा क़र्ज़ के जाल में फंसे देशों की अपनी आर्थिक ग़लतियों की अनदेखी की जाती है और फिर इसका ज़िम्मेदार चीन को ठहराया जाता है. हालांकि, ऐसा बार बार होते देखा गया है, जब चीन अपने कारोबारी प्रभाव का इस्तेमाल अपने भू-राजनीतिक हित साधने के लिए करता रहा है.

इसका एक प्रमुख इस्तेमाल चीन और ऑस्ट्रेलिया के रिश्ते हैं. मैल्कम टर्नबुल के शासन काल में ऑस्ट्रेलिया इस बात को लेकर बहुत चिंतित हो गया था कि चीन, साउथ चाइना सी जैसे अहम मुद्दों पर उसके राजनेताओं को प्रभावित करने की दुस्साहसिक कोशिशें कर रहा है. मिसाल के तौर पर 2017 में ऑस्ट्रेलिया की लेबर पार्टी के नेता सैम दस्तियारी को उस वक़्त अपमानजनक तरीक़े से संसद छोड़कर जाना पड़ा था, जब ये पता चला था कि चीन के समुद्री विवादों में वो, चीन से पैसे लेकर उसका समर्थन कर रहे थे.

इसके बाद ऑस्ट्रेलिया ने विदेशी प्रभाव कम करने के लिए क़ानून पारित किया. फिर स्कॉट मॉरिसन की सरकार ने चीन की हुआवेई कंपनी को ऑस्ट्रेलिया में 5G नेटवर्क लगाने से प्रतिबंधित कर दिया, जिससे दोनों देशों के संबंध और भी ख़राब हो गए. चीन ने भी पलटवार करते हुए ऑस्ट्रेलिया के निर्यातों पर पाबंदी लगा दी, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था के लिए ख़तरा पैदा हो गया, क्योंकि ऑस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था चीन के साथ कारोबार पर बहुत अधिक निर्भर है. ऐसे कारोबारी दांवों से से एक अहम पश्चिमी मध्यम दर्जे की ताक़त और हिंद प्रशांत में अमेरिका के महत्वपूर्ण साझीदार जैसे देश को प्रभावित करने की चीन की क्षमता और इच्छा को, मालदीव के लिए एक ख़तरे की घंटी का काम करना चाहिए था. क्योंकि ऑस्ट्रेलिया की तुलना में वो एक बहुत छोटा सा देश है, जिसे बड़ी आसानी से दबाव बनाकर तोड़ा मरोड़ा जा सकता है.

फिर भी, पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन के नेतृत्व में मालदीव पर चीन का क़र्ज़ उसकी GDP के पांचवें हिस्से के बराबर पहुंच गया, और चीन उसके लिए पर्यटन का एक प्रमुख स्रोत बन गया, जो मालदीव की अर्थव्यवस्था का एक अहम सेक्टर है. यहां ये बात ध्यान देने लायक़ है कि चीन अपने नागरिकों को उन्हीं देशों की सैर पर जाने की इजाज़त देता है, जो उसके एप्रूव्ड डेस्टिनेशन स्टेटस (ADS) की सूची में शामिल हैं. इस तरह चीन अपने यहां से दूसरे देश जाने वाले पर्यटकों को भी एक आर्थिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करता है. मिसाल के तौर पर 2014 में जब फिलीपींस के साथ चीन का सीमा विवाद हुआ था, तो चीन ने फिलीपींस के ऊपर दंड लगाने वाली पर्यटन की एडवाइज़री जारी की थी.

सच तो ये है कि मालदीव के साथ चीन के मौजूदा कारोबारी संबंधों को देखते हुए, शायद चीन को अपनी महत्वाकांक्षाएं पूरी करने के लिए मालदीव में सरकार बदलने तक इंतज़ार करना ही न पड़े.

इससे भी बड़ी बात, शुरुआती पूर्वानुमानों के बावजूद, मौजूदा राष्ट्रपति के शासनकाल में भी मालदीव के साथ चीन के कारोबारी रिश्ते मज़बूत बने रहे हैं. जबकि शुरुआत में इब्राहिम सोलिह ने ऐलान  किया था कि वो यामीन सरकार के दौरान चीन के साथ हुए व्यापारिक समझौतों का फिर से मूल्यांकन करेंगे. और, भारत ने भी चीन पर मालदीव की आर्थिक निर्भरता कम करने की कोशिश की है, जिसमें मालदीव पर लदे चीन के क़र्ज़ को कम करने के प्रयास भी शामिल हैं. फिर भी मालदीव और चीन के कारोबारी रिश्तों पर इन विपरीत परिस्थितियों का असर नहीं के बराबर पड़ा है.

स्थायी दबदबा

मालदीव में चीन की दिलचस्पी बने  रहने का सबूत  जनवरी 2022 में चीन के तत्कालीन  विदेश मंत्री वांग  यी के दौरे के रूप में दिखा था. अपनी परंपरा के मुताबिक़, तब चीन ने कूटनीतिक नए साल की शुरुआत अफ्रीका के मंत्रि-स्तरीय दौरे के साथ की थी. ये अफ्रीका के साथ रिश्ते बेहतर बनाने को लेकर चीन की प्रतिबद्धता का नमूना था. अफ्रीका के दौरे के फ़ौरन बाद वांग  यी ने अपने दौरे में कोमोरोस, श्रीलंका और मालदीव को शामिल करके ये संकेत दिया था कि चीन, हिंद महासागर के द्वीपीय देशों के साथ अपने रिश्तों को मज़बूत बनाने के लिए अडिग है.

वैंग यी के मालदीव दौरे के दौरान दोनों देशों ने तमाम क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए कई समझौते किए थे. इस सहयोग का ज़्यादातर हिस्सा तो चीन के साथ अभी चल रहे सहयोग का दायरा बढ़ाने का था. इसमें आवासीय परियोजनाएं, वेलाना हवाई अड्डे का सुधार और विदेश मंत्रालय की इमारत का हाल ही में किया गया पुनरुद्धार शामिल है. इसके अलावा, चूंकि भारत की मदद से चलाई जा रही परियोजनाओं की रफ़्तार सुस्त है, जैसे कि ग्रेटर माले कनेक्टिविटी परियोजना, तो चीन द्वारा तेज़ी से मूलभूत ढांचे का विकास कर पाने की क्षमता के प्रति लालच बढ़ना तय है. ये बात तो तब और भी प्रासंगिक हो जाती है, जब चुनावी साल हो. क्योंकि मालदीव में मूलभूत ढांचे की बड़ी परियोजनाओं को सियासी रणनीति के हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है.

मालदीव की पिछली और मौजूदा सरकार में जो बड़ा अंतर हैं, वो ये है कि मौजूदा सरकार चीन के साथ मुक्त व्यापार समझौता करने को लेकर हिचक रही है. ये ऐसी हिचक है, जिससे शायद सितंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के बाद पार पा लिया जाए. सच तो ये है कि मालदीव के साथ चीन के मौजूदा कारोबारी संबंधों को देखते हुए, शायद चीन को अपनी महत्वाकांक्षाएं पूरी करने के लिए मालदीव में सरकार बदलने तक इंतज़ार करना ही न पड़े. मालदीव में गहराई से जड़ें जमा चुके अपने कारोबारी दबदबे की मदद से चीन पहले ही ऐसी स्थिति में है कि वो अपनी भागीदारी को अपनी ज़रूरत और हितों के हिसाब से हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर सके.

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