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ताइवान के एक मिलेनियल (80 के दशक की शुरुआत से लेकर 90 के दशक के अंत में पैदा युवा) ने सोशल मीडिया के ज़रिए चीन के बढ़ते असर को लेकर चिंता जताते हुए कहा, “कभी-कभी मुझे कष्ट होता है कि छोटे बच्चे ताइवान के मूल्यों की उतनी मज़बूती से रक्षा नहीं कर पाएंगे जैसे हमने की थी.”
जैसे-जैसे ताइवान के टीनएनर अधिक संख्या में चीनी शॉर्ट वीडियो देख रहे हैं और चीन के नेटिज़न्स के साथ ऑनलाइन जुड़ रहे हैं, वैसे-वैसे वो अपनी आम बातचीत में स्ट्रेट के पार की बोलचाल की भाषा को तेज़ी से अपना रहे हैं.
ताइवान के युवाओं को अक्सर 2014 के सनफ्लावर मूवमेंट से जोड़ा जाता है जो चीन के साथ एक विवादित व्यापार समझौते के ख़िलाफ़ छात्रों के नेतृत्व वाला एक प्रदर्शन था. उस पीढ़ी, जो राजनीतिक मुद्दों में बहुत ज़्यादा शामिल है, ने चीन को लेकर अपना संदेह बनाए रखा है, विशेष रूप से चीन के राजनीतिक और मीडिया प्रभाव के बारे में. ताइवान स्ट्रेट के उस पार के बारे में इस पीढ़ी की सोच सॉफ्ट पावर की रणनीति से प्रभावित होने की संभावना नहीं है. लेकिन वर्तमान डिजिटल और सांस्कृतिक परिदृश्य चीन को लेकर किशोरों (टीनएजर्स) के दृष्टिकोण को तय करने में मददगार हो सकता है और ये पिछली पीढ़ी से अलग हो सकता है.
ताइवान में चीनी बोलचाल की भाषा का बढ़ता चलन
ताइवान के यूज़र के बीच चीन की सोशल मीडिया सामग्री (कंटेंट) की बढ़ती मौजूदगी को लेकर चिंता बढ़ रही है. साझा भाषा चीन और ताइवान के सोशल मीडिया अकाउंट के बीच कंटेंट को अधिक सुचारू बनाती है. शॉर्ट वीडियो और लाइफस्टाइल कंटेंट के लिए दो लोकप्रिय चीनी प्लैटफॉर्म टिकटॉक और रेडनोट का इस्तेमाल करने वाले लोग ताइवान में बहुत अधिक हैं.
जैसे-जैसे ताइवान के टीनएनर अधिक संख्या में चीनी शॉर्ट वीडियो देख रहे हैं और चीन के नेटिज़न्स के साथ ऑनलाइन जुड़ रहे हैं, वैसे-वैसे वो अपनी आम बातचीत में स्ट्रेट के पार की बोलचाल की भाषा को तेज़ी से अपना रहे हैं. पिछले दिनों इस लेखक की तरफ से ताइवान में कराए गए एक सर्वे के अनुसार 20-35 साल के 75 प्रतिशत जवाब देने वालों ने किशोरों के द्वारा चीन की भाषा अपनाने पर बेचैनी जताई. ये किशोर ‘शॉर्ट वीडियो’ के लिए ताइवानी मंडारिन में ‘दुआन यिंग पियान’ की जगह ‘दुआन शी पिन’ जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं. 20-35 उम्र समूह में जवाब देने वालों में से 78 प्रतिशत ने कहा कि वो जान-बूझकर ऐसी भाषा का प्रयोग करने से बचने की कोशिश करते हैं जबकि सर्वे में शामिल किसी भी किशोर ने ऐसा करने की इच्छा नहीं जताई.
वैसे तो चीन और ताइवान के बीच सैन्य तनाव सुर्खियों में छाया रहता है लेकिन असर बढ़ाने के छोटे तरीके भी इस्तेमाल हो रहे हैं. ताइवान की युवा पीढ़ी को आकर्षित करने के लिए चीन सॉफ्ट पावर की रणनीति में भी बहुत ज़्यादा ज़ोर लगा रहा है.
युवा चीन के शब्दों का प्रयोग करने के मामले में अधिक विरोध करते हुए प्रतीत होते हैं. फिर किशोर उन्हें अपनाने के लिए अधिक तैयार क्यों हैं?
क्या ये रुझान किशोरों के बीच चीन को लेकर रवैये में नरमी का संकेत देता है? उधर ताइवान के मिलेनियल ‘झ्यू’- ऐसा शब्द जो चीन की भाषा के बारे में बताने के लिए अपमानजनक रूप से उपयोग किया जाता है- को फैलाने से पीछे हटते हैं. ये ताइवान के युवाओं में एक सांस्कृतिक बंटवारे के बारे में बताता है जिस पर शायद किसी का ध्यान नहीं गया है. आख़िरकार भाषा में छोटा सा बदलाव समाज के एक-दूसरे से संबंधों पर प्रभाव डाल सकता है.
भाषा में बदलाव- क्या हमें चिंतित होना चाहिए?
सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं का बोलचाल की भाषा अपनाना नई बात नहीं है. उदाहरण के लिए, यूनाइटेड किंगडम में अमेरिकी टेलीविज़न शो के प्रसार और सोशल मीडिया पर अमेरिकी संस्कृति के वर्चस्व के साथ युवाओं ने तेज़ी से अमेरिकी बोलचाल की भाषा को अपनाया है. ये ऐसी स्थिति है जिसे जेन ज़ी (1997 से 2012 के बीच पैदा युवा यानी मिलेनियल के बाद की पीढ़ी) के सोशल मीडिया यूज़र ने बढ़ाया है. ये रुझान न तो चिंता का विषय है और न ही इससे पता चलता है कि ब्रिटेन के लोग ख़ुद को अमेरिका के नज़दीक महसूस करते हैं.
एसोसिएट प्रोफेसर ताई यू-हुई कहते हैं कि ताइवान के युवाओं ने कोरिया के टीवी शो देखने के बाद इसी तरह कोरियाई भाषा को अपनाया है और इसने उनकी पहचान पर असर नहीं डाला है. वास्तव में ताइवान लंबे समय से अलग-अलग देशों और संस्कृतियों से प्रभावित रहा है लेकिन इसके बावजूद लोगों ने अपनी पहचान को गहराई से बनाकर रखा है. पिछले दिनों प्यू रिसर्च सेंटर और नेशनल चेंगची यूनिवर्सिटी के द्वारा कराए गए सर्वे से पता चलता है कि ताइवान के युवा अभी भी ख़ुद को चीन से अलग मानते हैं और वो चीन के साथ नज़दीकी संबंध का कोई संकेत नहीं देते हैं.
चीनी सोशल मीडिया का उदय केवल ताइवान तक ही सीमित नहीं है और ये एक उभरती हुई ताकत के रूप में चीन को लेकर दुनिया की बढ़ती दिलचस्पी को भी दिखा सकता है. ये सतर्क होने का कारण कम है और चीन के बढ़ते असर का नतीजा ज़्यादा है.
ताइवान के मिलेनियल संशय में हैं. न्यू ताइपे के एक 31 साल के युवा कहते हैं, "ये वीडियो केवल ये दिखाने का प्रयास करते हैं कि चीन कितना सुंदर है." दूसरे युवा उन्हें "फर्ज़ी और सच्चाई से दूर" बताकर खारिज करते हैं. वो एक आलोचनात्मक दृष्टिकोण बरकरार रखने में सक्षम होने को लेकर आश्वस्त होते हैं.
जब बात स्ट्रेट के पार संबंधों की आती है तो छोटे से बदलाव का भी पता लगाना ज़रूरी है.
लेकिन ताइवान-चीन संबंधों और शी जिनपिंग के एकीकरण के लक्ष्यों को देखते हुए इस रुझान की नज़दीक से छानबीन करना आवश्यक है. वैसे तो चीन और ताइवान के बीच सैन्य तनाव सुर्खियों में छाया रहता है लेकिन असर बढ़ाने के छोटे तरीके भी इस्तेमाल हो रहे हैं. ताइवान की युवा पीढ़ी को आकर्षित करने के लिए चीन सॉफ्ट पावर की रणनीति में भी बहुत ज़्यादा ज़ोर लगा रहा है.
2003 से इस बात को लेकर चिंता बढ़ी है कि चीनी सोशल मीडिया के इन्फ्लूएंसर ताइवान की चर्चाओं को तय कर रहे हैं. ख़बरें ऐसी भी हैं कि ताइवान के इन्फ्लूएंसर्स को चीन की सरकार अपना दुष्प्रचार फैलाने के लिए पैसे देती है. ये एक ऐसा विषय है जिसके बारे में पिछले दिनों ताइवान के चैनल ताइवान प्लस ने दिखाया था.
प्राथमिक चिंता ये नहीं है कि ताइवान के युवा अपनी पहचान की भावना को खो देंगे बल्कि ये है कि सकारात्मक लेकिन चालाकी से बनाए गए कंटेंट- जो चीन के पक्ष में नैरेटिव को मज़बूत करता है, घरेलू आवाज़ों को तोड़-मरोड़ कर पेश करता है और ताइवान के लोकतंत्र और उसके सहयोगियों को बदनाम करता है- को देखकर चीन के बारे में उनकी सोच पर असर पड़ सकता है.
एक सांस्कृतिक मोड़: असर की छानबीन
ये चीन से आने वाले सभी कंटेंट पर अविश्वास करने या इस मान्यता को बढ़ावा देने की अपील नहीं है कि सभी कंटेंट तालमेल करके चीन की सरकार के द्वारा दर्शकों को प्रभावित करने के प्रयासों का हिस्सा है. हमारे सामने आने वाली सभी पोस्ट के इरादों को नुकसानदेह बताने से बचना महत्वपूर्ण है.
हालांकि हमें ये पता है कि हम एक सांस्कृतिक मोड़ के बिंदु पर हैं. जैसे-जैसे चीनी सोशल मीडिया के कंटेंट की मात्रा ताइवान के लोगों की मोबाइल स्क्रीन पर ज़्यादा जगह ले रही है, वैसे-वैसे ये सही समय बनता जा रहा है कि हम अपना ध्यान युवा पीढ़ी की तरफ लगाएं और उनकी राय में उभरते किसी भी अंतर की छानबीन करें. आने वाले वर्षों में इस तरह के बदलावों का व्यापक परिणाम हो सकता है.
ये छानबीन एक व्यापक सांस्कृतिक बदलाव की पृष्ठभूमि में होती है. लेकिन इस बदलाव की शुरुआत कहां से होती है?
ताइवान से चीन तक: एक तरह के पॉप कल्चर की शुरुआत
दशकों तक ताइवान के पॉप कल्चर ने उस पार चीनी भाषा बोलने वाले लोगों के रुझानों को परिभाषित किया है. नई शताब्दी की शुरुआत तक चीन नए स्टाइल के लिए ताइवान की तरफ देखता था. ताइवान जहां अभी भी प्रभावशाली बना हुआ है वहीं चीन का मनोरंजन उद्योग भी विकसित हुआ है और मनोरंजन में सबसे ज़्यादा बदलाव सोशल मीडिया में साफ तौर पर दिखता है.
चीन का इन्फ्लूएंसर उद्योग 2025 तक 7 ट्रिलियन चीनी युआन (965.3 अरब अमेरिकी डॉलर) पर पहुंचने का अनुमान है. जैसे-जैसे अमेरिका में टिकटॉक पर प्रतिबंध की संभावना बढ़ती जा रही है, वैसे-वैसे अमेरिका के लाखों टिकटॉक यूज़र्स रेडनोट पर अपना अकाउंट बना रहे हैं. ये एक और संकेत है कि चीन के सोशल मीडिया उद्योग में मंदी आने का कोई संकेत नहीं दिख रहा है.
ताइवान के किशोर युवाओं की तुलना में टिकटॉक से बहुत ज़्यादा जुड़ते हैं. 38 प्रतिशत किशोरों के मुकाबले 18-29 साल के 33 प्रतिशत युवा ही टिकटॉक का इस्तेमाल करते हैं. 30 वर्ष से ज़्यादा उम्र के तो और भी कम युवा टिकटॉक से जुड़े हुए हैं. शुरुआत में वो हल्के-फुल्के कंटेंट की तलाश में टिकटॉक की तरफ आकर्षित हुए लेकिन अब ज़्यादातर किशोर टिकटॉप जैसे ऐप का इस्तेमाल समाचार के प्राथमिक स्रोत के रूप में करते हैं.
चीन की बढ़ती सॉफ्ट पावर को लेकर चर्चा के बीच एक सवाल बना हुआ है: क्या ताइवान के युवा इतनी आसानी से प्रभावित हो जाते हैं?
बंटी हुई प्रतिक्रियाएं: मिलेनियल और टीनएजर्स
ताइवान के मिलेनियल संशय में हैं. न्यू ताइपे के एक 31 साल के युवा कहते हैं, "ये वीडियो केवल ये दिखाने का प्रयास करते हैं कि चीन कितना सुंदर है." दूसरे युवा उन्हें "फर्ज़ी और सच्चाई से दूर" बताकर खारिज करते हैं. वो एक आलोचनात्मक दृष्टिकोण बरकरार रखने में सक्षम होने को लेकर आश्वस्त होते हैं. इस उम्र समूह के लोग चीनी प्रभाव को लेकर किशोरों की तुलना में अपनी कमज़ोरी के बारे में कम चिंतित हैं. पिछले दिनों इस लेखक के द्वारा कराए सर्वे में जवाब देने वाले 86 प्रतिशत लोगों ने ये चिंता जताई कि किशोरों पर चीनी प्रभाव ज़्यादा बढ़ रहा है और वो उसे स्वीकार कर रहे हैं. एक जवाब देने वाले ने कहा कि "अगर टीनएजर चीन के शब्दों (एक्सप्रेशन) का उपयोग जारी रखते हैं तो वो सोचेंगे कि ये कुछ नहीं है और वो ये मानना शुरू कर देंगे कि स्ट्रेट के दोनों किनारे एक परिवार की तरह हैं."
नए आंकड़े बताते हैं कि उनकी चिंताएं आधारहीन नहीं हैं. उसी सर्वे में 20-35 उम्र समूह के केवल 13 प्रतिशत जवाब देने वालों ने कहा कि वो कभी-कभी चीन के शब्दों का उपयोग करते हैं जबकि 4 प्रतिशत ने कहा कि उन्होंने अपनी रोज़ की बातचीत में चीन के शब्दों को शामिल कर लिया है. इसके विपरीत 80 प्रतिशत किशोरों ने कहा कि वो कभी-कभी चीन के शब्दों का इस्तेमाल करते हैं जबकि 20 प्रतिशत ने कहा कि चीन की भाषा उनके प्रतिदिन के जीवन का हिस्सा बन गई है.
जिस समय ताइवान के युवा डिजिटल दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं, उस समय उनका बदलता दृष्टिकोण स्ट्रेट के पार समीकरणों को फिर से परिभाषित कर सकता है.
ये बंटवारा भाषा के आगे तक फैला हुआ है. चीन के आकर्षण के बारे में पूछे जाने पर 20 प्रतिशत किशोरों की तुलना में सिर्फ 4 प्रतिशत उम्रदराज जवाब देने वालों ने देखे गए कंटेंट के आधार पर चीन को रहने के लिए अच्छी जगह बताया. ताइझोंग के एक 16 साल के किशोर ने कहा कि चीन के सुंदर दृश्यों को दिखाने वाले वीडियो ने वहां के बारे में उसके दृष्टिकोण को तय किया.
ऐसे समय में जब टीनएजर घरों की बढ़ती लागत और रुके हुए वेतन से जूझ रहे समाज में बड़े हो रहे हैं, उस वक्त क्या सोशल मीडिया पर चीन के रहन-सहन के बारे में अच्छा चित्रण उनके लिए ज़्यादा आकर्षण रख सकता है?
स्ट्रेट के पार विभाजन को दूर करना
ये देखा जाना बाकी है कि क्या इस रुझान का ताइवान स्ट्रेट के लिए दीर्घकालिक परिणाम पड़ेगा. मौजूदा समय में रवैये में बदलाव को लेकर कोई भी धारणा अटकलबाज़ी है और किशोरों की सोच पर चीनी सोशल मीडिया के कंटेंट और बोलचाल की भाषा का असर मालूम नहीं है.
हालांकि चीन को लेकर युवाओं की धारणा में बारीक परिवर्तन- चाहे वो भाषा के माध्यम से हो या संस्कृति के माध्यम से- पर निगरानी रखी जानी चाहिए और रखी जाएगी.
चीन के किशोरों के साथ ताइवान के किशोरों की बढ़ती नज़दीकी की भावना को सिर्फ राजनीतिक नज़रिए से नहीं देखा जाना चाहिए. व्यक्तिगत संपर्कों और राजनीतिक गठबंधन के बीच अंतर करना महत्वपूर्ण है. वैसे तो ताइवान में चीन की सरकार की आलोचना होती है लेकिन चीन के लोगों के साथ दोस्ती कायम करना या सांस्कृतिक तत्वों की सराहना करना चीन का समर्थक होने के बराबर नहीं है. इस दोतरफा मानसिकता को भरना आवश्यक है. इसके अलावा, आपसी समझ को बढ़ावा देने और अधिक बारीक संवाद के लिए मार्ग प्रशस्त करने के उद्देश्य से बातचीत महत्वपूर्ण हो सकती है.
जिस समय ताइवान के युवा डिजिटल दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं, उस समय उनका बदलता दृष्टिकोण स्ट्रेट के पार समीकरणों को फिर से परिभाषित कर सकता है. चाहे ये बदलाव का संकेत हो या किसी आपस में जुड़ी दुनिया को दिखाता हो लेकिन एक सवाल बना हुआ है: क्या ये पीढ़ीगत परिवर्तन चीन को लेकर ताइवान के लोगों के रवैये को शांति से परिभाषित कर सकता है?
ब्रिटिश-इटैलियन लौरा बॉनसेवर ताइपे स्थित ताइवान नेक्स्टजेन फाउंडेशन में रिसर्चर हैं.
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