19 मई को राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने चीन के ऐतिहासिक शहर शियान में चीन और मध्य एशिया के शिखर सम्मेलन की मेज़बानी की. इस शिखर सम्मेलनमें कज़ाख़िस्तान, उज़्बेकिस्तान, किर्गिज़स्तान, ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान के राष्ट्राध्यक्षों ने शिरकत की. शियान शहर से उस प्राचीन सिल्क रोड कीशुरुआत होती थी, जो 64 हज़ार किलोमीटर में फैला व्यापार के रास्तों का नेटवर्क था और पूर्वी सभ्यता को पश्चिमी देशों से जोड़ता था. शी जिनपिंग की‘अच्छे पड़ोसी होने और दोस्ताना संबंध’ वाली नीति के ज़रिए चीन ने C+C5 देशों के इस सम्मेलन का इस्तेमाल, मध्य एशिया के साथ अपने सामरिकसहयोग को मज़बूत बनाने और आगे बढ़ाने के लिए किया. चीन ने सम्मेलन के ज़रिए ख़ास तौर से बहुचर्चित बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI), ग्लोबलसिक्योरिटी इनिशिएटिव और ग्लोबल सिविलाइज़ेशनल इनिशिएटिव को आगे बढ़ाने की कोशिश की.
मध्य एशिया के किसी भी देश ने यूक्रेन पर रूस के हमले का समर्थन नहीं किया है. अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को ख़तरे का अंदाज़ा लगाते हुए, मध्य एशियाई देश अपनी विदेश नीति में विविधता ला रहे हैं, ताकि रूस के प्रभाव को कम किया जा सके.
रूस और यूक्रेन के युद्ध से चिंतित मध्य एशियाई देश (CARs) अब अपनी सुरक्षा को लेकर रूस पर पारंपरिक निर्भरता को कम करना चाहते हैं. क्योंकि, अब तक इस क्षेत्र में व्यापक आर्थिक और राजनीतिक दबदबा रखने वाले रूस को इलाक़े की स्थिरता, क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता के लिए ख़तरा मानाजाने लगा है. इसीलिए, मध्य एशियाई देश भी रूस के ख़िलाफ़ खड़े होने लगे हैं. मध्य एशिया के किसी भी देश ने यूक्रेन पर रूस के हमले का समर्थननहीं किया है. अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को ख़तरे का अंदाज़ा लगाते हुए, मध्य एशियाई देश अपनी विदेश नीति में विविधता ला रहे हैं, ताकिरूस के प्रभाव को कम किया जा सके. कज़ाख़िस्तान ने तो पूर्वी यूक्रेन को मान्यता देने तक से इनकार कर दिया और रूस के राजनेताओं पर आरोप लगायाकि वो दोनों देशों के बीच मतभेद के बीज बो रहे हैं. कज़ाख़िस्तान और उज़्बेकिस्तान ने यूक्रेन की क्षेत्रीय अखंडता को दोहराते हुए, रूस की उम्मीदों केख़िलाफ़ जाते हुए यूक्रेन को मानवीय सहायता भी भेजी. इन विचित्र स्थितियों में शी जिनपिंग ने शिखर सम्मेलन के दौरान दोहराया कि मध्य एशियाईदेशों की सुरक्षा, संप्रभुता, स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता का हर हाल में सम्मान किया जाना चाहिए.
लेकिन, रूस के ज़बरदस्त दबदबे को देखते हुए मध्य एशियाई देशों के नेताओं के लिए रूस से दूरी बनाना आसान नहीं होगा. इसलिए, इस बात परहैरानी नहीं हुई जब यूक्रेन पर रूस के हमले की आलोचना करने के बावजूद, सभी पांच मध्य एशियाई देशों के नेता बेहद कम वक़्त में सूचना मिलने केबाद भी 9 मई को मॉस्को के रेड स्क्वॉयर पर विक्ट्री डे परेड में शामिल हुए.
उइगर समुदाय पर मध्य एशिया का प्रभाव कम करने और अपने दादागिरी वाले एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए चीन ने 1991 के बाद से ही मध्य एशियाई देशों को मोटे क़र्ज़ देकर और उनके यहां निवेश के ज़रिए अपना आर्थिक दबदबा क़ायम करने की कोशिश शुरू कर दी थी.
रूस और मध्य एशियाई देशों के बीच इस तनाव ने चीन को मौक़ा दे दिया है कि वो अपने भू-राजनीतिक, भू-सामरिक और भू-आर्थिक प्रभाव औरसक्रियता से लक्ष्य आधारित कूटनीति का इस्तेमाल करते हुए इस क्षेत्र में अपना दबदबा क़ायम करने की कोशिशें और मज़बूत कर सके.
1991 के बाद मध्य एशिया में चीन की नीति
मध्य एशिया की भू-सामरिक स्थिति यूरेशिया के केंद्र बिंदु वाली है. अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण मध्य एशियाई देश ‘वर्ल्ड आइलैंड’ के भीतर होरहे भू-राजनीतिक बदलावों की धुरी बन जाएं. इसके अलावा, प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर होने और अपने यहां के बाज़ार में विस्तार की विशाल संभावनाके चलते आज मध्य एशिया के देश बड़ी ताक़तों के लिए ‘दुनिया की शतरंज की चौपड़’ बन गए हैं. चीन के लिए विवादित इतिहास और उसके उत्तरपूर्वी प्रांत शिंजियांग में अलगाववादी ताक़तें और मध्य एशियाई देशों के साथ उसके नज़दीकी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंध एक चिंताजनक तस्वीरपेश करती हैं. क्षेत्र में उइगरों के प्रति हमदर्दी के जज़्बात चीन के लिए विशेष रूप से चिंताजनक हैं.
उइगर समुदाय पर मध्य एशिया का प्रभाव कम करने और अपने दादागिरी वाले एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए चीन ने 1991 के बाद से ही मध्य एशियाईदेशों को मोटे क़र्ज़ देकर और उनके यहां निवेश के ज़रिए अपना आर्थिक दबदबा क़ायम करने की कोशिश शुरू कर दी थी. अपने ऊर्जा आयात मेंविविधता लाने के लिए चीन ने इस क्षेत्र के तेल और गैस के भंडारों में निवेश करने को सबसे बड़ी प्राथमिकता बनाया, ताकि वो अपने यहां उर्जा कीबढ़ती मांग को पूरा कर सके. चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के एक बड़े अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल लियु याझोऊ ने कहा था कि, ‘तेल और गैस के भंडार केकका एक ज़बरदस्त टुकड़ा हैं जिन्हें स्वर्ग से चीन के लोगों के लिए भेजा गया है.’ तुर्कमेनिस्तान से गैस और कज़ाख़िस्तान समेत दूसरे मध्य एशियाई देशों सेतेल और गैस के आयात के लिए कई पाइप लाइन बिछाई हैं. चीन की सरकारी कंपनी चाइना नेशनल पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (CNPC) ने कज़ाख़िस्तानके तेल और गैस उद्योग में 45 अरब डॉलर से ज़्यादा का निवेश किया है. 2021 में तुर्कमेनिस्तान ने चीन को 34 अरब घन मीटर गैस की आपूर्ति की थीऔर 2022 में गैस का बढ़े हुए आयात का मूल्य 9.2 अरब डॉलर लगाया गया था. आज चीन को तुर्कमेनिस्तान के कुल गैस निर्यात का 30 प्रतिशतहिस्सा मिलता है, जो मध्य एशिया को बीजिंग, शंघाई और दूसरे देशों को जोड़ने वाली पाइपलाइनों (जो नीचे नक़्शे में दिखायी गई हैं) के ज़रिए पहुंचतीहै. इसके बदलने में चीन को इन देशों से अपनी अंदरूनी सुरक्षा को लेकर महत्वपूर्ण वादा हासिल हुआ है; चीन की कोशिशों से मध्य एशिया के सभीदेशों ने सारे उइगर संगठनों पर पाबंदी लगा दी है और अपने यहां रह रहे उइगर मुसलमानों की निगरानी और सख़्त कर दी है.
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Source: The Central Asian gas pipeline (scmp.com)[/caption]
चीन ने मध्य एशिया के इलाक़े का इस्तेमाल, रूस, यूरेशिया और यूरोप के साथ कनेक्टिविटी के निर्माण के लिए भी किया है. चीन ने पुरानी सिल्क रोडको फिर से जीवित करने के प्रयासों को तेज़ करते हुए रेलवे लाइन बिछाने, सड़कें बनाने और अन्य मूलभूत ढांचों के विकास में काफ़ी निवेश किया है. इसकी मिसाल, कज़ाख़िस्तान और शिंजियांग के इली कज़ाक़ स्वायत्त क्षेत्र की सीमा के क़रीब स्थित ड्राई पोर्ट खोरगोस है. 2012 में जब खोरगोस केदोनों तरफ़ रेल की पटरियों को जोड़ दिया गया, तो उसके बाद चीन की मालगाड़ियां इस ड्राई पोर्ट से होकर गुज़रने लगीं. चीन ने ताजिकिस्तान केसामरिक रूप से अहम वखान गलियारे में एक सैनिक अड्डा भी स्थापित किया है.
शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन ने मध्य एशिया को लेकर अपनी नीति में बदलाव किया है और इस क्षेत्र को ‘पश्चिम की ओर कूच’ की रणनीति का केंद्रबनाया है. 2013 में BRI की शुरुआत के बाद से चीन इस क्षेत्र के सबसे ताक़तवर देश के रूप में उभरा है. 1992 में जहां चीन और मध्य एशिया के बीच66 करोड़ डॉलर का कारोबार हो रहा था. वहीं, अब ये बढ़कर 70 अरब डॉलर से ज़्यादा हो गया है. चीन ने इस क्षेत्र पर अपना प्रभाव बढ़ाने के लिएबहुपक्षीय मंचों का भी ख़ूब इस्तेमाल किया है.
मध्य एशिया के सत्ताधारी वर्ग के बीच चीन ज़्यादा लोकप्रिय है. क्योंकि, चीन ने काफ़ी मात्रा में निवेश करके इन देशों में जनता की बढ़ती नाराज़गी को शांत किया है और तानाशाही हुक्मरानों के ख़िलाफ़ बग़ावत को जन्म लेने से रोका है.
चीन- किर्गिज़स्तान- उज़्बेकिस्तान के बीच रेलवे लाइन, जिस पर 2022 में समरकंद में हुए शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के शिखर सम्मेलन के दौरानसहमति बनी थी, उसे यूरोप और चीन के बीच की दूरी कम करने के लिए बनाया जा रहा है, ताकि ये रेलवे लाइन प्रतिबंधों के शिकार रूस से बचकरनिकल सके. इस प्रस्तावित रेलवे लाइन की कुल लंबाई 523 किलोमीटर है, जिसमें से 213 किलोमीटर चीन में, 260 किलोमीटर किर्गीज़िस्ना में और50 किलोमीटर उज़्बेकिस्तान में पड़ेगा. शी जिनपिंग ने उज़्बेकिस्तान के साथ भी, व्यापार निवेश और आर्थिक सहयोग के 15 अरब डॉलर के समझौते परदस्तख़त किए. रूस और यूक्रेन के युद्ध के बाद क्षेत्रीय अखंडता को लेकर कज़ाख़िस्तान की चिंता दूर करते हुए शी जिनपिंग ने कहा कि चीनकज़ाख़िस्तान की धरती पर किसी भी तरह का अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं करेगा.
मध्य एशिया में आपसी सहयोग से दबदबा बनाए रखने का वो दौर अब बदल गया है, जिसमें रूस सुरक्षा की गारंटी देता था तो चीन एक निवेशक औरआर्थिक शक्ति था. अब मध्य एशिया के देश बहुआयामी विदेश नीति पर चलना चाहते हैं, जिससे दूसरे देश भी इस क्षेत्र में शामिल हो सके. अपने ऊर्जानिर्यातों में विविधता लाने के लिए मध्य एशियाई देश अब नए क्षेत्रीय बाज़ार भी तलाश रहे हैं. 2021 में कज़ाख़िस्तान ने 6.57 करोड़ टन तेल और तेलके उत्पाद का निर्यात किया था, जिसमें से केवल 36 लाख टन चीन ने आयात किया था. इसकी तुलना में फ्रांस, इटली और नीदरलैंड जैसे यूरोपीय संघके कई देशों ने चीन की तुलना में कहीं ज़्यादा तेल और तेल उत्पाद कज़ाख़िस्तान से ख़रीदे थे. इसी तरह, तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान भी चीन औररूस के अलावा दूसरे बाज़ार तलाश रहे हैं. यही वजह है कि चीन के राष्ट्रपति ने चीन और मध्य एशिया के बीच पाइप लाइन की लाइन-D का निर्माणतेज़ करने पर ज़ोर देने के साथ साथ ऊर्जा की औद्योगिक श्रृंखलाएं और ऊर्जा के विकास की साझेदारियों का प्रस्ताव रखा था.
पूर्व सोवियत संघ के विघटन के बाद स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आए मध्य एशियाई देशों की जनता अभी भी रूस को सांस्कृतिक और भाषाईसमानताओं वाली सॉफ्ट पावर समझते हैं, जिस पर वो आर्थिक और सुरक्षा के मामले में निर्भर है. यूक्रेन संकट के बाद, पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंधलगाए, तो मध्य एशियाई देशों से रूस को निर्यात में वृद्धि हुई है. रूस में रहने वाले उज़्बेक नागरिकों द्वारा अपने देश भेजी जाने वाली रक़म भी 2022 मेंदो गुना बढ़कर 17 अरब डॉलर पहुंच गई.
वहीं दूसरी तरफ़, मध्य एशिया के सत्ताधारी वर्ग के बीच चीन ज़्यादा लोकप्रिय है. क्योंकि, चीन ने काफ़ी मात्रा में निवेश करके इन देशों में जनता कीबढ़ती नाराज़गी को शांत किया है और तानाशाही हुक्मरानों के ख़िलाफ़ बग़ावत को जन्म लेने से रोका है. हालांकि, हाल के दिनों में इन देशों में चीन केख़िलाफ़ ज़मीन पर अवैध क़ब्ज़े, शिनजियांग सूबे में लाखों अल्पसंख्यक मुसलमानों को क़ैद करने और चीन के निवेश वाली परियोजनाओं में स्थानीयलोगों के लिए रोज़गार के मौक़े न होने को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए हैं. 2015 के बाद से मध्य एशिया में 150 से ज़्यादा चीन विरोधी प्रदर्शन हुए हैं. ख़ासतौर से किर्गिज़स्तान, ताजिकिस्तान और कज़ाख़िस्तान में.
ऐसे उथल-पुथल भरे क्षेत्रीय माहौल में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) ने शियान में C+C5 शिखर सम्मेलन का इस्तेमाल, शी जिनपिंग की पसंदीदाBRI की कनेक्टिविटी परियोजनाओं और ग्लोबल सिविलाइज़ेशन इनिशिएटिव को नई रफ़्तार देने के लिए किया, जिससे नज़दीकी संपर्क और साझाइरादों के लिए आपसी सांस्कृतिक सीख को बढ़ावा देने और स्थायी दोस्ती को और गहराई दी जा सके. अहम बात ये है कि सम्मेलन के दौरान शीजिनपिंग ने चीन को एक दबदबे वाले देश के बजाय साझेदार के तौर पर पेश करने की कोशिश की. अब ये देखना बाक़ी है कि मध्य एशियाई देशों केनेता, अपने देश को चीन का उपनिवेश बनाए बग़ैर, बहुआयामी विदेश नीति को किस तरह बनाए रख सकते हैं.
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