Author : Abhishek Mishra

Published on Jun 11, 2022 Updated 0 Hours ago

क्या अमेरिका के दोबारा सोमालिया के मैदान में उतरने से वहां पर सैन्य संघर्ष का अंत होगा?

जो बाइडेन ने दी सोमालिया में अमेरिकी फ़ौज को तैनात करने की मंज़ूरी; अमेरिका के ‘अंतहीन युद्ध’ की दिशा में एक और क़दम

अफ्रीका में अमेरिका की आतंकवाद विरोधी नीति के बारे में कहा जाता है कि वो लंबे समय से सोमालिया की अनदेखी करता आया हैयूनाइटेड टास्क फ़ोर्स (UNITAF) नाम वाली बहुराष्ट्रीय सेना के नाकाम अभियान ‘ऑपरेशन रिस्टोर होप’ की असफलता के ख़ौफ़ और 2001 की अमर हो चुकी दास्तान ब्लैक हॉक डाउन ने सोमालिया में अमेरिकी दख़ल की विरासत को जकड़कर रखा हैफिर चाहे वो अमेरिका की जनता हो या उसके नेता.

हाल ही में राष्ट्रपति जो बाइडेन ने एक आदेश पर दस्तख़त करके अमेरिकी सेना को लंबे समय से संघर्ष के शिकार सोमालिया में स्पेशल ऑपरेशन फोर्स के जवान तैनात करने की इजाज़त दे दीबाइडेन का ये फ़ैसला मोटे तौर पर डोनाल्ड ट्रंप के 2020 में दिए गए आदेश के उलट हैजिसके तहत अमेरिका ने सोमालिया से अपने 700 सैनिक वापस बुला लिए थेइस फ़ैसले के बाद सोमालिया में अमेरिकी सैनिकों की तैनाती सोमालिया और अफ्रीकी संघ के सैनिकों के प्रशिक्षण और उन्हें सलाह देने के लिए कभीकभार रुकने तक सीमित रह गई थीहालांकिसैनिकों को बारबार लाने ले जाने और हमेशा सफर में रहने को ख़तरनाकमहंगा और बेअसर तरीक़ा माना गया थासैनिकों को कभी तैनात करने और कभी वापस बुलाने से अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के सैनिकों को काफ़ी जोखिम से गुज़रना पड़ता थाइससे पहले राष्ट्रपति ओबामा ने ‘स्पेशल ऑपरेशंस के सैनिकोंहवाई हमलोंनिजी ठेकेदारों और अफ्रीकी सहयोगियों’ की मदद से सोमालिया में दखल का मक़सद पूरा किया था.

हाल ही में जब ये ख़बर आई कि अल शबाब के आतंकवादियों के हमले में 71 फ़ीसद का इज़ाफ़ा हो गया है, तो बाइडेन, सोमालिया में अमेरिका की सेना तैनात करने का फ़ैसला करने को मजबूर हो गए.

अमेरिका और साथी देशों की सेनाओं की सुरक्षा और उनके असरदार होने के लिए टिकाऊ रूप से ज़मीन पर सेना की तैनाती ज़रूरी थीजिससे ‘अल शबाब के ख़िलाफ़ असरदार जंग लड़ी जा सके.’ हाल ही में जब ये ख़बर आई कि अल शबाब के आतंकवादियों के हमले में 71 फ़ीसद का इज़ाफ़ा हो गया हैतो बाइडेनसोमालिया में अमेरिका की सेना तैनात करने का फ़ैसला करने को मजबूर हो गए. अल क़ायदा के सबसे बड़े और अमीर सहयोगी के तौर पर अल शबाब के पास इतनी क्षमता बनी हुई है कि वो पड़ोसी देशों पर भी हमला कर सके और अमेरिका के नागरिकों और उसके हितों के लिए ख़तरा पैदा कर सकेये बात उस वक़्त साफ़ हो गई थीजब 2020 में अल शबाब के आतंकवादियों ने केन्या के मांडा बे में अमेरिकी हवाई सैनिक अड्डे पर भयानक हमला किया था

सोमालिया के चुनाव और AMISOM का ATMIS के रूप में बदलाव

अमेरिका ने सोमालिया में अपने सैनिक तैनात करने का फ़ैसलावहां हुए चुनाव के बाद लिया हैइस चुनाव में राष्ट्रपति हसन शेख़ मोहम्मद एक बार फिर सत्ता में लौट आए हैंहसन शेख़ मोहम्मद इससे पहले 2012 से 2017 के दौरान सोमालिया के राष्ट्रपति रह चुके हैं. हसन मुहम्मदक्षेत्र के बाहर की ताक़तों के साथ साझेदारी करने में इच्छा ज़ाहिर करते रहे हैं. उनकी यही दिलचस्पी शायद अमेरिका की पूर्वी अफ्रीका संबंधी रणनीति में बदलाव का कारण बनी है. राष्ट्रपति हसन शेख़ मोहम्मद ने सोमालिया में अमेरिकी सेना तैनात करने के बाइडेन प्रशासन के फ़ैसले का स्वागत किया है.

हसन शेख़ मोहम्मद इससे पहले 2012 से 2017 के दौरान सोमालिया के राष्ट्रपति रह चुके हैं. हसन मुहम्मद, क्षेत्र के बाहर की ताक़तों के साथ साझेदारी करने में इच्छा ज़ाहिर करते रहे हैं. उनकी यही दिलचस्पी शायद अमेरिका की पूर्वी अफ्रीका संबंधी रणनीति में बदलाव का कारण बनी है

सोमालिया में अमेरिकी सैनिकों की दोबारा तैनाती उस वक़्त होने जा रही हैजब 1 अप्रैल 2022 को सोमालिया में अफ्रीकी संघ के अभियान (AMISOM) का नाम बदलकर सोमालिया में अफ्रीकी संघ का परिवर्तन अभियान (ATIMIS) कर दिया गया है. ATMIS की गतिविधियांअल शबाब के अभियान को रोकनासोमालिया की सेना को प्रशिक्षण और मार्ग दर्शन देना और उनके साथ मिलकर योजना बनाने की होंगीइसमें कोई शक नहीं है कि अल शबाब के ख़तरे से निपटने के लिए सोमालिया की सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा का ढांचा खड़ा करने के लिए एक व्यापक राजनीतिक समझौता करना होगाजिससे आगे चलकर सोमालिया के नेतृत्व और उसके नियंत्रण वाली सुरक्षा व्यवस्था बनाई जा सकेये लक्ष्य हासिल करने के लिए पैसे के नियमित स्रोतहथियारों की ख़रीद और ख़ास तौर से हवाई सामरिक सहयोग जुटाना ज़रूरी होगा.

कुछ चुनौतियां बनी हुई हैं

सोमालिया की धरती पर अमेरिकी सैनिकों की तैनाती को लेकर बहुत सी चिंताएं बनी हुई हैंइनमें सेना की तैनाती का कोई नियत समय  होने से लेकर 1990 के दशक के अभियान जैसी नाकामी वाली आशंकाएं बनी हुई हैंइसके अलावा अमेरिकी सैनिकों की तैनाती से आतंकवादी संगठन के उस दावे को मज़बूती मिल जाती है जो इस क्षेत्र में अमेरिका की दख़लंदाज़ी को लेकर सवाल उठाता रहा हैइसके अलावाअमेरिका द्वारा सोमालिया के लिए संसाधन उपलब्ध कराने का सवाल भी खड़ा किया जा सकता हैक्योंकियूरोप के मोर्चे पर एक जंग चल रही हैवहीं सोमालिया में अमेरिकी सेना की तैनाती अपने आप में उसके ‘अंतहीन सैन्य अभियानों’ के जारी रहने का सबूत है.

इसके अलावा, सोमालिया में अल शबाब एक ताक़तवर राजनीतिक शक्ति है, और इसीलिए उससे निपटने में बहुत समझदारी की दरकार है. इस समस्या से कुछ हद तक इस तरह निपटा गया है कि अमेरिकी सेना की तैनाती, ‘सोमालिया की नई सरकार की क्षमता के निर्माण और अन्य साझीदारों के साथ ख़ुफिया जानकारी साझा करके अभियान चलाए जाएंगे’. इन बातों से इतर, लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष की वजह से सोमालिया ख़ुद भी युद्ध, सूखे और जलवायु परिवर्तन की वजह से लोगों के बेघर होने जैसी तमाम चुनौतियों का सामना कर रहा है, जिनके समाधान के लिए ज़्यादा विकल्प मौजूद नहीं हैं, जबकि इन चुनौतियों से निपटने के लिए संस्थागत व्यवस्था बनाने की ज़रूरत है. ऐसी संस्थाओं की कमी के अभाव में आतंकवादी संगठनों को जगह बनाने का मौक़ा मिल गया है और इसी वजह से अमेरिका को वहां अपनी सेना तैनात करने को मजबूर होना पड़ा है.

राष्ट्रपति जो बाइडेन ने ड्रोन हमलों के ज़रिए निशाना साधने के उन नियमों को भी निलंबित कर दिया हैजिन्हें ट्रंप प्रशासन ने लागू किया थाइसके बजाय अब ड्रोन हमलों के लिए राष्ट्रपति कार्यालय से मंज़ूरी लेनी होगीइसका मतलब ये है कि अमेरिका की सेना और खुफिया एजेंसियों द्वारा खुफिया मिशन की योजना बनाकर उन्हें लागू करने की क्षमता पर राष्ट्रपति कार्यालय का शिकंजा और कसेगाइसके अलावाजब से जो बाइडेन ने सत्ता संभाली हैतब से अमेरिका के हवाई हमले मोटे तौर पर उन लक्ष्यों तक सीमित रह गए हैंजिनके तहत अपने साझीदारों को फ़ौरी ख़तरे से बचाना हो या फिर जिनसे सोमालिया की सेनाओं को ‘सामूहिक’ रूप से रक्षा की ज़रूरत होव्यवहारिक तौर पर इसका तमलब ये है कि अब ड्रोन और हवाई हमले तभी होंगेजब कोई अमेरिकी सलाहकार सोमालिया की सेना के साथ खड़ा होगाऐसे तरीक़े से केवल अस्थायी और रफ़ू लगाने जैसा समाधान मिलेगाजो इस संघर्ष की जड़ तक जाने वाला नहीं है.

सोमालिया में अमेरिका के नए युद्ध पर बहस

अमेरिका पिछले 15 सालों से सैन्य अभियान के बल पर अल शबाब पर क़ाबू पाने की कोशिश कर रहा हैजिसमें उसे बहुत कामयाबी नहीं मिल पाई हैसोमालिया और अफ्रीकी संघ की सेनाओं को प्रशिक्षण देनेहथियार मुहैया कराने में अरबों डॉलर ख़र्च हो चुके हैं और अमेरिकी नागरिकों की जान गई हैजिसका कोई लाभ अमेरिका को नहीं हुआ हैअफ़ग़ानिस्तान में राष्ट्र निर्माण की नाकाम अमेरिकी कोशिश तालिबान की वापसी के तौर पर ख़त्म हुई और अमेरिका को वहां से अपनी सेना वापस बुलानी पड़ी. अफ़ग़ानिस्तान के तजुर्बे से सबक़ लेते हुए अमेरिका को सोमालिया में वही राह नहीं अख़्तियार करनी चाहिए.

अमेरिकी सैनिक दोबारा तैनात करने का फ़ैसला ये दिखाता है कि आतंकवाद से निपटने को अमेरिका अभी भी बहुत प्राथमिकता देता हैसोमालिया में आतंकवाद निरोधक अभियानों की अगुवाई कर रही उसकी दानाब एडवांस्ड इन्फैंट्री ब्रिगेड के साथ तालमेल करना ज़रूरी होगाइसे सोमालिया के नेतृत्व से भी पूरी ईमानदारी वाले सहयोग की दरकार होगीसोमालिया में कामयाबी के लिए अमेरिका को उसके पड़ोसी देशों जैसे कि जिबूती और केन्या के साथसाथ अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सहयोग की भी ज़रूरत होगीसोमालिया में सेना भेजने का फ़ैसला स्थायी नहीं टिकाऊ क़दम हैइससे ये ज़ाहिर होता है कि वो अल शबाब के चलते पैदा हुए ख़तरे को सीमित रखने का इच्छुक हैजिससे वो पूर्वी अफ्रीकी देशों में अस्थिरता ख़त्म करने का दूरगामी मक़सद भी हासिल कर सके.

हालांकिये कहना मुश्किल है कि सोमालिया को अमेरिका के और सैनिकों की ज़रूरत हैइसके बजाय सोमालिया को सामुदायिक स्तर पर चलाए जाने वाले ज़मीनी अभियानों के लिए निवेश की ज़रूरत हैजो भरोसा क़ायम करने और स्थानीय लोगों से संपर्क मज़बूत करने पर निर्भर हैराष्ट्रपति बाइडेन का सोमालिया में अमेरिका सैनिक दोबारा तैनात करने का फ़ैसला ये दिखाता है कि अमेरिका अभी भी सैन्य विकल्प को तरज़ीह देता हैजबकि ये तरीक़ा पहले कोई ठोस और उम्मीद के मुताबिक़ नतीजा देने में नाकाम रहा हैविदेशी दख़ल या सेना को प्रशिक्षण देने से सोमालिया की सरकार की विश्वसनीयता नहीं बढ़ने वाली है. इसके लिए मज़बूती से कूटनीतिक प्रयास करने की आवश्यकता हैताकि सोमालिया की अस्थिरता और संघर्ष की समस्या को जड़ से ख़त्म किया जा सके.

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Author

Abhishek Mishra

Abhishek Mishra

Abhishek Mishra is an Associate Fellow with the Manohar Parrikar Institute for Defence Studies and Analysis (MP-IDSA). His research focuses on India and China’s engagement ...

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Contributor

Arushi Singh

Arushi Singh

Arushi Singh is a writer at the Consortium of Indo-Pacific Researchers. She has graduated from the Department of Geopolitics and International Relations (GIR) at Manipal ...

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