Author : Shivam Shekhawat

Published on Nov 01, 2023 Updated 27 Days ago

एक के बाद एक आए भूकंप के झटकों के बाद फंड के लिए अपीलों को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का रवैया बहुत ठंडा रहा है. 

तबाही मचाने वाले भूकंप और आफ्टरशॉक के बाद अफ़ग़ानिस्तान को मदद की दरकार

7 अक्टूबर को अफ़ग़ानिस्तान के पश्चिमी सूबे हेरात में 6.3 तीव्रता का भूकंप आया था. इसके बाद एक हफ़्तों तक ज़लज़ले और आफ्टरशॉक आते रहे थे. 11 और 15 अक्टूबर को तो दो ज़बरदस्त झटके महसूस किए गए. अफ़ग़ानिस्तान के हालात तो पहले से ही ख़राब थे, इन ज़लज़लों ने हाल और भी बुरा बना दिया है. भूकंप की वजह से गांव के गांव तबाह हो गए हैं, और इनकी वजह से 16 लाख लोग प्रभावित हुए हैं, जिनमें से एक लाख 14 हज़ार लोगों को तो फ़ौरी तौर पर मदद की ज़रूरत है. संयुक्त राष्ट्र के मानवीय मामलों में समन्वय के दफ़्तर (UNOCHA) और दूसरे अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने हेरात में भूकंप से हुई तबाही से उबरने की योजना के लिए 9.36 करोड़ डॉलर के फंड की साझा अपील की है. हालांकि, पिछले एक साल के दौरान, अफ़ग़ानिस्तान की मदद के लिए अपीलों के बावजूद, सहायता राशि में गिरावट आई है. फंड की इस कमी से भूकंप के झटकों के बाद लोगों की मदद में जुटे संगठनों की कोशिशों पर बुरा असर पड़ सकता है.

पिछले एक साल के दौरान, अफ़ग़ानिस्तान की मदद के लिए अपीलों के बावजूद, सहायता राशि में गिरावट आई है. फंड की इस कमी से भूकंप के झटकों के बाद लोगों की मदद में जुटे संगठनों की कोशिशों पर बुरा असर पड़ सकता है.

ज़लज़लों वाला सप्ताह

OCHA के अनुमानों के मुताबिक़ सभी भूकंपों और उनके बाद आए झटकों में लगभग 1500 लोगों की जान चली गई है, दो हज़ार के आस-पास लोग घायल हैं और 21 हज़ार पांच सौ से ज़्यादा घरों को नुक़सान पहुंचा है. 9.36 करोड़ डॉलर के फंड की अपील का मक़सद, अफ़ग़ानिस्तान में सर्दियों (अक्टूबर 2023 से मार्च 2024 तक) के दिनों में मदद की सख़्त दरकार वाले एक लाख 14 हज़ार लोगों की ज़रूरतों को पूरा करना है. घरों के अलावा, इन ज़लज़लों ने बहुत सी स्वास्थ्य सुविधाओं, स्कूलों और दूसरे अहम मूलभूत ढांचों को भी तहस-नहस कर दिया है. ज़लज़लों के बाद ख़ुद को बचाने के लिए बहुत से परिवार खुले आसमान के तले ज़िंदगी बसर कर रहे हैं, जबकि बहुत से लोगों ने दूसरे इलाक़ों की ओर कूच कर दिया है. हेरात शहर अब तंबुओं का शहर लगने लगा है, क्योंकि लोग अस्थायी शिविरों में रह रहे हैं. भूकंप की वजह से उनके मिट्टी से बने घर ढह गए हैं, और पूरे हेरात सूबे में बहुत से परिवारों ने अपने परिजनों को सामूहिक क़ब्रों में दफन  किया है. संयुक्त राष्ट्र की मानवीय सहायता के समन्वय के दफ़्तर (OCHA) के अनुसार, हेरात के लगभग 500 गांवों में से 289 गांव या तो बुरी तरह या फिर काफ़ी हद तक प्रभावित हुए हैं. भूकंप ने हेरात में कई ऐतिहासिक ठिकानों को भी नुक़सान पहुंचाया है. क्योंकि हेरात यूनेस्को की विश्व विरासत का एक केंद्र है. हेरात के क़िले में दरारें पड़ गई हैं और कुछ हिस्सा टूट भी गया है. मोसल्ला इमारत और हेरात की जामा मस्जिद को भी भूकंप से क्षति पहुंची है. इन इमारतों की तबाही से एक देश के तौर पर अफ़ग़ानिस्तान और उसके नागरिकों की सांस्कृतिक पहचान और सामूहिक याददाश्त के लिए जोखिम पैदा हो गया है, जो तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद से पहले से ही ख़तरे में थी.

भूकंप के झटकों की वजह से मारे गए और इससे प्रभावित लोगों में से अधिकतर संख्या महिलाओं और बच्चों की है, जो कुल प्रभावित लोगों का 90 प्रतिशत हैं. 7 अक्टूबर को भूकंप का पहला झटका सुबह सुबह आया था, जब ज़्यादातर मर्द खेतों में या फिर सीमा के पार काम करने के लिए घरों से बाहर थे. घरों के भीतर ज़्यादातर महिलाएं, बच्चे या फिर बुज़ुर्ग थे. लेकिन, भूकंप का तुलनात्मक रूप से महिलाओं पर ज़्यादा असर इस बात का भी सबूत है कि औरतों पर तालिबान के प्रतिबंध, संकट के वक़्त कितना बुरा असर डालते हैं. भूकंप को लेकर तैयारी की जानकारी की कमी ने भी उनको शुरुआती झटकों के वक़्त बचने के प्रयासों पर असर डाला होगा.

भूकंप के झटकों की वजह से मारे गए और इससे प्रभावित लोगों में से अधिकतर संख्या महिलाओं और बच्चों की है, जो कुल प्रभावित लोगों का 90 प्रतिशत हैं.

भूकंप के बाद, तालिबान के प्रवक्ता ने मदद पहुंचाने में तालमेल के लिए एक आयोग के गठन का एलान किया था. आपदा प्रबंधन  के राजकीय मंत्रालय ने भूकंप में मारे गए लोगों की संख्या पहले 2,445 बताई थी हालांकि, बाद में मंत्रालय ने मरने वालों का आंकड़ा घटाकर एक हज़ार के आस-पास कर दिया था, जो अंतरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा बताए गए अनुमानों के ज़्यादा क़रीब थी. तालिबान सरकार के प्रवक्ता के मुताबिक़, ऐसा इसलिए किया गया, ताकि बाहर से आ रही सहायता इधर उधर न जा सके और उसके वितरण में कोई भ्रष्टाचार न हो. तालिबान हुकूमत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आगे आकर सहायता करने की अपील भी की. वैसे तो तालिबान ने ये दिखाने की पूरी कोशिश की कि इस तबाही से निपटने में उन्होंने बड़ी कुशलता और तेज़ी से क़दम उठाए हैं. लेकिन, ऐसी ख़बरें भी आईं कि भूकंप के बाद तालिबान सरकार की तरफ़ से शुरुआती प्रतिक्रिया काफ़ी धीमी रही थी और सरकार के बजाय समुदाय और आम लोगों ने पीड़ितों की मदद करने में ज़्यादा तेज़ी दिखाई थी. तालिबान हुकूमत के प्रवक्ता ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा कि उनकी सरकार भूकंप प्रभावित इलाक़ों में मानक मकान बनाने शुरू कर दिए हैं और उनका इरादा सर्दियों का मौसम शुरू होने से पहले ही ये काम पूरा करने का है. आर्थिक मामलों के कार्यवाहक उप-प्रधानमंत्री ने भी राहत सामग्री पहुंचाने की निगरानी के लिए एक प्रतिनिधिमंडल के साथ भूकंप प्रभावित हेरात सूबे का दौरा किया.

भूकंप से तबाही के बाद राहत सामग्री पहुंचाने की प्रक्रिया कई चुनौतियों का सामना कर रही है. भूकंप की वजह से कनेक्टिविटी और संचार के नेटवर्कों को तो नुक़सान पहुंचा ही है, सहायता सामग्री की आपूर्ति करने के रास्ते भी सर्दियों की आमद के साथ बंद हो सकते हैं. भयंकर ठंड की शुरुआत को देखते हुए लोगों की रिहाइश और पनाह लेने की समस्या से फ़ौरन और कुशलता से निपटने की ज़रूरत है. क्योंकि, तंबुओं में रहने की वजह से ख़राब मौसम और सेहत से जुड़ी परेशानियां और बढ़ सकती हैं. 

भूकंप को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया पर्याप्त नहीं है

काबुल के पतन और तालिबान की सत्ता में वापसी के दो साल बाद भी अफ़ग़ानिस्तान में मानवीय आपदा की स्थिति तबाही वाली ही है. अंतरराष्ट्रीय  बचाव समिति के मुताबिक़, मानवीय सहायता में कटौती के साथ साथ अर्थव्यवस्था के तबाह होने और जलवायु परिवर्तन की वजह से ज़रूरतमंद लोगों की संख्या में 60 प्रतिशत का इज़ाफ़ा हो गया है. संयुक्त राष्ट्र की मानवीय सहायता योजना को अगस्त 2023 तक फंड की ज़रूरत का केवल 23 प्रतिशत हिस्सा ही मिल सका है. जबकि पिछले साल ज़रूरत का 40 प्रतिशत फंड मिल गया था. अफ़ग़ानिस्तान की ज़रूरत और मिल रहे फंड के बीच ये फ़ासला तब से और बढ़ गया है, जब से तालिबान ने महिलाओं के संयुक्त राष्ट्र और दूसरे अंतरराष्ट्रीय स्वयंसेवी संगठनों (NGO) के लिए काम करने पर प्रतिबंध लगाने का फ़ैसला किया.

इस साल की शुरुआत में अमेरिका ने ये भी माना था कि वित्तीय कारणों और अन्य स्थानों पर संकटों से निपटने के लिए ये मानवीय मदद और भी कम हो सकती है. जहां ऑस्ट्रेलिया ने अफ़ग़ानिस्तान ह्यूमैनिटेरियन ट्रस्ट फंड के ज़रिए दस लाख डॉलर की सहायता देने का वादा किया, वहीं यूरोपीय संघ ने 37.1 करोड़ डॉलर की मदद देने का वचन दिया.

अफ़ग़ानिस्तान में भूकंप आने के लगभग एक हफ़्ते बाद कुछ देशों ने मदद देने का वादा किया है. 12 अक्टूबर को अमेरिका के विशेष प्रतिनिधि ने अफ़ग़ान जनता को सुरक्षित पीने का पानी, इमरजेंसी शेल्टर किट, खाना पकाने के सामान और कंबल वग़ैरह मुहैया कराने के लिए USAID के ज़रिए फ़ौरन 1.2 करोड़ ड़ॉलर की मदद देने का ऐलान  किया. अगस्त 2021 के बाद से अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान की मदद में लगभग दो अरब डॉलर की मदद का योगदान दिया है. लेकिन, इस साल की शुरुआत में अमेरिका ने ये भी माना था कि वित्तीय कारणों और अन्य स्थानों पर संकटों से निपटने के लिए ये मानवीय मदद और भी कम हो सकती है. जहां ऑस्ट्रेलिया ने अफ़ग़ानिस्तान ह्यूमैनिटेरियन ट्रस्ट फंड के ज़रिए दस लाख डॉलर की सहायता देने का वादा किया, वहीं यूरोपीय संघ ने 37.1 करोड़ डॉलर की मदद देने का वचन दिया. चीन ने भी 41 लाख डॉलर की आपात मानवीय सहायता अफ़ग़ानिस्तान पहुंचाई, जिसे एक समारोह में अफ़ग़ानिस्तान के आपदा प्रबंधन विभाग के हवाले किया गया. ब्रिटेन, ईरान, सऊदी अरब, तुर्की, कज़ाख़िस्तान और ताजिकिस्तान ने फंड के वादे और राहत सामग्री के पैकेज का ऐलान  किया. OCHA के मुताबिक़ 9.36 करोड़ डॉलर के फंड की मांग के मुक़ाबले द्विपक्षीय दानदाताओं और सामुदायिक स्तर पर जुटाए गए फंडों ने 1.55 करोड़ डॉलर और एक करोड़ डॉलर की रक़म देने की पुष्टि की है. लेकिन अभी भी ज़रूरत और उपलब्ध रक़म के बीच बड़ा फ़ासला बना हुआ है. भूकंप के शिकार लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए सहायता संगठनों ने भी अपने संसाधनों का रुक़ मोड़ा है. अब UNDP ने दो अरब डॉलर की रक़म भूकंप राहत में ख़र्च करने का फ़ैसला किया है. वैसे तो इससे भूकंप पीड़ितों की ज़रूरतें पूरी करने में काफ़ी मदद मिलेगी. लेकिन, दूसरे इलाक़ों और लोगों के लिए आवंटित इन फंडों को दूसरे कामों से हटाकर सहायता में लगाने से उन लोगों पर बुरा असर पड़ना भी चिंताजनक है, जिनको इस फंड की उतनी ही ज़रूरत है.

वैसे तो अफ़ग़ानिस्तान में सहायता का वितरण हमेशा से ही भ्रष्टाचार और इधर-उधर किए जाने का शिकार होता रहा है. लेकिन, अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंताएं दूर करने को लेकर तालिबान के अड़ियल रवैये ने मामले को और भी जटिल बना दिया है. चूंकि किसी भी देश ने अभी तक तालिबान की इस्लामिक अमीरात को वैधानिक मान्यता नहीं दी है, तो अब वो अफ़ग़ानिस्तान की जनता से किए गए वादे पूरे करने के तरीक़े निकालने के साथ साथ, ये सुनिश्चित करने की चुनौती से भी निपट रहे हैं कि कहीं उनके प्रयासों से तालिबान की सरकार पर वैधानिकता की मुहर न लग जाए. तालिबान ने सहायता के वितरण और आवंटन को नियंत्रित करने के लिए कुछ हद तक प्रयास किए हैं. तालिबान सरकार की तरफ़ से NGO और दूसरे संगठनों को कड़े निर्देश दिए गए हैं, और हर सहायता परियोजना के लिए सहमति पत्र (MoU) पर दस्तख़त को शामिल करके इस प्रक्रिया को और भी पेचीदा बना दिया गया है. मानवीय गतिविधियों में ख़लल पड़ने की ख़बरें भी आई हैं और हेरात में तो सहायता तक पहुंच का मसला अगस्त 2023 से ही उठने लगा था. हेरात उन पांच सूबों में शामिल था, जहां सहायता देने में तालिबान की ओर से दख़लंदाज़ी की गई थी. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की रिपोर्ट के मुताबिक़ फ़रवरी से मई 2023 के बीच मानवीय सहायता पहुंचाने के दौरान दख़लंदाज़ी की 299 घटनाएं सामने आई थीं. ये सारे कारण मानवीय सहायता के असली ज़रूरतमंदों तक पहुंचने को लेकर चिंताएं पैदा करते हैं. लेकिन, इन चिंताओं के बावजूद, देशों ने ऐसे तरीक़े तलाशने की कोशिश की है, जिससे इन मामलों में दक्ष एजेंसियों के के ज़रिए सहायता सामग्री उन लोगों तक पहुंच सके, जो इसके असली ज़रूरतमंद हैं.

भारत हमेशा से ही अफ़ग़ानिस्तान की जनता के कल्याण को लेकर प्रतिबद्ध रहा है, और वो किसी भी मुश्किल के वक़्त सबसे पहले सहायता पहुंचाने की कोशिश करने वाले देशों में से रहा है.

भारत हमेशा से ही अफ़ग़ानिस्तान की जनता के कल्याण को लेकर प्रतिबद्ध रहा है, और वो किसी भी मुश्किल के वक़्त सबसे पहले सहायता पहुंचाने की कोशिश करने वाले देशों में से रहा है. अगस्त 2021 के बाद से भारत, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और विश्व खाद्यान्न कार्यक्रम (WFP) के ज़रिए गेहूं, दवाएं और कोविड-19 के टीके मुहैया कराकर अफ़ग़ान जनता की मदद करता रहा है. पिछले साल जून से ही भारत ने काबुल में एक कामचलाऊ तकनीकी मिशन खोल रखा है, ताकि सहायता और मदद की सामग्री पहुंचाने में तालमेल किया जा सके. आज जब हेरात में अफ़ग़ान नागरिक भूकंप के बाद दोबारा अपनी ज़िंदगी को पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं, तो ये बात समझ से परे है कि इतनी बड़ी क़ुदरती आपदा के बाद भारत ने अफ़ग़ान जनता की मदद के लिए क़दम आगे क्यों नहीं बढ़ाया है. अब जबकि अफ़ग़ानिस्तान भयंकर ठंड के मौसम की ओर बढ़ रहा है, तो आने वाले हफ़्तों और महीनों में अफ़ग़ान जनता की ज़रूरतें और बढ़ेंगी ही. चूंकि हेरात एक दूर-दराज वाला सूबा है, तो पहले से मौजूद मानवीय चिंताएं और अफ़ग़ानिस्तान के संकट की तरफ़ दुनिया का ध्यान न होने की वजह से हालात स्थिर होने में पहले से कहीं अधिक वक़्त लगेगा. इससे भारत और अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा अफ़ग़ान जनता की मदद के अपने प्रयास और बढ़ाना ज़रूरी हो गया है.

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