Author : Anil Golani

Expert Speak Raisina Debates
Published on Mar 28, 2025 Updated 0 Hours ago

मल्टी डोमेन वॉरफेयर अर्थात बहुक्षेत्रीय युद्ध के दौर में भारतीय सेना को साइलो यानी एक दायरे से परे विचार करना होगा. इसके साथ ही उसे अपनी क्षमताओं को एकीकृत करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अपने कौशल को प्राथमिकता देनी होगी.

युद्ध कला में तालमेल किस तरह से हासिल हो!

Image Source: Getty

युद्ध कला की अब भूमि, समुद्र, हवाई, अंतरिक्ष, साइबर तथा आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस (AI) क्षेत्र से उन्नति हो गई है. इन सभी क्षेत्रों में परिवर्तन के बीच समय का अंतराल घट गया है और इसने युद्ध के चरित्र को ही बदल कर रख दिया है. वर्तमान दुनिया में अनिश्चितता का दौर देखा जा रहा है. इसमें जहां भूराजनीतिक प्रतिद्वंदिता के साथ राष्ट्रवाद में इज़ाफ़ा हो रहा है, वही बहुपक्षीय संगठनों की विफ़लता भी देखने को मिल रही है. इसके अलावा एक ऐसी नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था दोबारा खड़ी हो रही है, जिसमें 'माइट' इस राइट यानी ‘शक्ति’ ही सही है. इस व्यवस्था में जंगल के कानून का राज देखा जा सकता है. ऐसे में किसी भी चीज को हथियार बनाया जा सकता है. ऐसे में सेना शहरी संघर्षों, अनमैंड सिस्टम्स यानी मानवरहित प्रणाली, नॉन - स्टेट अर्थात सरकार के नियंत्रण से बाहर काम करने वाले खिलाड़ियों की ओर से चलाई जा रही प्रॉक्सी-वॉर के साथ ही साइबर, AI तथा स्पेस डोमेन यानी अंतरिक्ष क्षेत्र के उपयोग से जूझ रही है.  इस स्थिति में उसे युद्ध के मूल सिद्धांतों तथा नियमों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए. प्रत्येक देश अपनी भौगोलिक स्थिति, ख़तरों, अर्थव्यवस्था और एक देश के रूप में अपने विकास के दौरान अनूठी चुनौतियों का सामना करता है. इन चुनौतियों का सामना करते हुए वह अपनी सेना को राष्ट्रीय शक्ति का एक इंस्ट्रूमेंट यानी साधन बनाता है.

अब जब देश अपनी सेना को 'आत्मनिर्भरता' ("सेल्फ - रिलायंस") के माध्यम से आधुनिक बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है तब उसने इसके एकीकरण और एकसूत्रता पर बल दिया है. ये दोनों ही बातें न केवल युद्ध को रोकने के काम आती हैं, बल्कि इनके उपयोग से युद्ध को बेहतर तरीके से लड़ा भी जा सकता है.


1947 में आजादी हासिल करने के बाद भारतीय सशस्त्र सेना ने काफ़ी प्रगति कर ली हैं. अपने पड़ोसियों के साथ चार युद्ध लड़ने के अलावा भारतीय सशस्त्र बलों ने काउंटर इनसर्जेंसी ऑपरेशंस यानी घुसपैठियों के ख़िलाफ़ ऑपरेशंस चलाएं हैं और राष्ट्र निर्माण में अपनी अन्य भूमिकाओं को भी बखूबी निभाया है. इसके अलावा भारतीय सेना ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और शांतिसेना के रूप में अपनी भूमिका पर ख़रा उतरने का काम किया है. अब जब देश अपनी सेना को 'आत्मनिर्भरता' ("सेल्फ - रिलायंस") के माध्यम से आधुनिक बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है तब उसने इसके एकीकरण और एकसूत्रता पर बल दिया है. ये दोनों ही बातें न केवल युद्ध को रोकने के काम आती हैं, बल्कि इनके उपयोग से युद्ध को बेहतर तरीके से लड़ा भी जा सकता है. इसके साथ ही इनके सहयोग से किसी भी राष्ट्रीय लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है.

 

सशस्त्र बलों का एकीकरण

सशस्त्र बलों के पुनर्गठन या पुनर्रचना की शुरुआत 2019 में हुई थी. 2019 में MoD के तहत डायरेक्टोरेट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स यानी सैन्य मामलों के निदेशालय का गठन किया गया था और इसके साथ ही चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की नियुक्ति की गई थी. इन बोल्ड स्टेप्स यानी साहसपूर्ण कदमों के साथ ही सचिवस्तरीय अधिकार वर्दीधारी अफसर को सौंप दिए गए थे. उसके बाद से ही सशस्त्र बलों में एकीकरण के लिए काफ़ी काम किया जा रहा है, लेकिन ऑपरेशंस में तालमेल हासिल करने के लिए अब भी काफ़ी कुछ किया जाना बाकी है.

अब घटते या स्थिर होते रक्षा बजट तथा हथियारों और प्लेटफॉर्म्स यानी मंचों की बढ़ती कीमतों को देखते हुए यह बेहद ज़रूरी हो गया है कि सभी क्षेत्रों में क्षमता और योग्यता का तालमेल बनाकर रखा जाए. ऐसा होने पर ही एक ऐसी फिस्ट यानी मुट्ठी बन सकेगी जो एक ही वार में दुश्मन को पस्त कर सके.


भविष्य में सशस्त्र बलों के संगठनात्मक ढांचे एवं स्वरूप को लेकर चर्चाएं आगे बढ़ रही हैं. ऐसे में यह सही वक़्त है जब हम भूमि, समुद्री एवं हवाई बलों की विशेषज्ञता के क्षेत्र पर भी एक नज़र डाल दे. अब युद्ध और संघर्ष ऐसे प्रतिद्वंदी के साथ होता है जो विभिन्न क्षेत्रों में बगैर किसी परेशानी के ऑपरेट करता है यानी युद्ध लड़ सकता है. ऐसे में भारत के लिए यह ज़रूरी हो गया है कि वह अपने सशस्त्र बलों के ढांचे को इस प्रकार तैयार करें कि वह एक आर्केस्ट्रा या सिंफनी के कंडक्टर यानी संचालनकर्ता के रूप में काम कर सकें. इस कंडक्टर या संचालनकर्ता के आदेश के तहत ही विभिन्न सशस्त्र बल आर्केस्ट्रा के ही विभिन्न एलिमेंट्स यानी पहलू या साजो-सामान अर्थात उपकरणों की तरह काम करें. यह ज़िम्मेदारी पाने वाले व्यक्ति के लिए यह ज़रूरी ही नहीं बल्कि महत्वपूर्ण भी होगा कि वह प्रत्येक नोट यानी सुर और इंस्ट्रूमेंट की बारीकियां से अवगत हो ताकि वह अपना बैटन यानी छड़ी प्रभावी तरीके से चला सके. उसके पास अपने पसंदीदा इंस्ट्रूमेंट यानी हथियार चलाने वाले सैनिक की योग्यता को परखने की क्षमता भी होनी चाहिए. ऐसा होने पर ही वह इन पेशेवर सैनिकों पर भरोसा करते हुए उन्हें उनकी पसंद का हथियार सौंप सकेगा. यही बात पेशेवर सैनिकों नौसैनिकों और हवाई जांबाजों पर लागू होती है जिन्हें यह पता होता है कि उन्हें अपने-अपने क्षेत्र में किस प्रकार के बल का उपयोग करना है.

पूंजीगत अधिग्रहण करते वक़्त इस बात का ध्यान रखा जाए कि ख़र्च होने वाले पैसों से युद्ध लड़ने में ज़्यादा से ज़्यादा लाभ मिले और राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोपरि रखा जा सके. 


अब घटते या स्थिर होते रक्षा बजट तथा हथियारों और प्लेटफॉर्म्स यानी मंचों की बढ़ती कीमतों को देखते हुए यह बेहद ज़रूरी हो गया है कि सभी क्षेत्रों में क्षमता और योग्यता का तालमेल बनाकर रखा जाए. ऐसा होने पर ही एक ऐसी फिस्ट यानी मुट्ठी बन सकेगी जो एक ही वार में दुश्मन को पस्त कर सके. इस परिदृश्य में सशस्त्र बलों के लिए अपने क्षेत्र के लिए आवश्यक एसेट्स यानी संपत्तियां अर्थात हथियारों को हासिल करने की बजाय दूसरे बल के क्षेत्र के हथियार लेने की कोशिश करना न केवल मूर्खतापूर्ण साबित होगा बल्कि यह राष्ट्रीय हितों के लिए भी घातक सिद्ध होगा. भूतल बलों, सेना और नौसेना, यदि अपने लिए हवाई सेना, जिसमें फोर्स मल्टीप्लायर यानी ताकत को बढ़ाने वाले उपकरण जैसे फ्लाइट रिफ्यूलर एयरक्राफ्ट तथा एयरपोर्ट वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम का समावेश है, तैयार करना चाहे तो यह फ़ैसला काउंटर प्रोडक्टिव अर्थात विपरीत परिणाम देने वाला साबित हो सकता है. ऐसा होने पर यह दोनों बलों यानी पैदल सेना और नौसेना का ध्यान अपनी विशेषज्ञता से भटक सकता है. हाल ही में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (PLAN) के पास मौजूद सभी लैंड बेस्ड फाइटर एयरक्राफ्ट यानी भूमि आधारित युद्ध हवाई जहाज को पीपुल्स लिबरेशन आर्मी एयर फोर्स (PLAAF) को हस्तांतरित कर दिया गया था. इसके साथ ही मेनलैंड यानी भूतल या मुख़्य भूमि की हवाई सुरक्षा, जो पहले PLAN तथा PLAAF के बीच बंटी/विभाजित हुई थी, भी हस्तांतरित कर दी गई थी. यह फ़ैसला एविएशन एस्टेट्स यानी हवाई संपत्तियों को सिंगल स्पेशलाइज्ड कमांड स्ट्रक्चर अर्थात एकल विशेषज्ञ कमांड यानी नेतृत्व ढांचे के तहत लाने के रणनीतिक पर प्रकाश डालने वाला या इसके महत्व को उजागर करने वाला है. एक राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति अथवा श्वेत पत्र के अभाव के बावजूद राजनीतिक नेतृत्व या कार्यकारी अधिकारी राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर सशस्त्र बलों की ओर से की जाने वाली उम्मीदों का संज्ञान रखता है. ऐसे में सर्विसेस यानी सशस्त्र बलों के लिए यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि वह एकसूत्र में विचार करते हुए अपनी-अपनी आवश्यकताओं को इसी अंदाज में पेश करें. प्रत्येक बल सभी क्षेत्रों में ना तो प्रशिक्षण ले सकता है ना युद्ध कर सकता है. और उसे इसके लिए तैयार भी नहीं किया जा सकता. इसका कारण यह है कि देश प्रत्येक बल को हर क्षेत्र में युद्ध के लिए तैयार करने, हथियार मुहैया कराने तथा उसे प्रशिक्षित करने का ख़र्च वहन नहीं कर सकता.

 

सार

युद्ध कला में आधुनिक तकनीक का समावेश करने के साथ ही एकीकरण और तालमेल हासिल करने से ही सशस्त्र बलों की क्षमता में विकास संभव हो सकेगा और इसके परिणामस्वरूप मनुष्यबल में भी यथोचित कमी आएगी. सेना में तकनीक की भूमिका के कारण जो उच्च प्रशिक्षित, प्रोत्साहित प्रभावी और कुशलता आएगी उससे हासिल होने वाले प्रचुर लाभों का भी विचार किया जाना चाहिए. पूंजीगत अधिग्रहण करते वक़्त इस बात का ध्यान रखा जाए कि ख़र्च होने वाले पैसों से युद्ध लड़ने में ज़्यादा से ज़्यादा लाभ मिले और राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोपरि रखा जा सके. इसमें वर्दी के रंग को देखते हुए आमतौर पर जो पक्षपात होता है उसे दरकिनार किया जाना चाहिए. फिलहाल देश विभिन्न बलों में क्षमताओं के दोहराव को नहीं झेल सकता. कमांडर अथवा कंडक्टर को इतनी समझ होनी चाहिए कि वे अपने अपने क्षेत्र के पेशेवरों को पहचान सकें और पूरी क्षमता के साथ उनका उपयोग कर सकें. इसके साथ ही यह भी न्यायोचित होगा कि कमांडर वर्दी के रंग को देख कर प्रभावित न हो. ऐसे होने पर ही भारतीय सेना सही अर्थों में एकीकरण और एकसूत्रता को हासिल कर सकेगी.


(एयर वाइस मार्शल अनिल गोलानी (सेवानिवृत्त) नई दिल्ली स्थित जनरल सेंटर फॉर और पॉवर स्ट्डीज (CAPS) में अतिरिक्त निदेशक हैं.)

The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.