यह लेख रायसीना फाइल्स 2023 सीरीज़ का हिस्सा है.
पहले कोई संबंध नहीं, फिर गुपचुप बातचीत और अब सामान्य संबंध- भारत, इज़रायल और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच हाल के दशकों में साझेदारी का कायाकल्प हो गया है. मौजूदा रूप में भारत-इज़रायल-UAE के बीच त्रिपक्षीय संबंध अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में यथार्थवाद और रचनावादी दृष्टिकोण के बीच मेलजोल का एक स्पष्ट उदाहरण पेश करता है. व्यावहारिक राजनीति का उपयोग करके तीनों देश अपने राष्ट्रीय हित को प्रधानता दे सकते हैं. इसके साथ-साथ भू-राजनीतिक और मुख्य रूप से भू-आर्थिक वास्तविकताओं के साथ उभरते ग़ैर-परंपरागत वैश्विक संकटों ने तीनों देशों को पारस्परिक चिंता के क्षेत्र में सहयोग के लिए प्रेरित किया है. इसका एक उदाहरण भारत-मध्य पूर्व खाद्य एवं ऊर्जा कॉरिडोर का निर्माण है.[1]
भू-राजनीतिक और मुख्य रूप से भू-आर्थिक वास्तविकताओं के साथ उभरते ग़ैर-परंपरागत वैश्विक संकटों ने तीनों देशों को पारस्परिक चिंता के क्षेत्र में सहयोग के लिए प्रेरित किया है. इसका एक उदाहरण भारत-मध्य पूर्व खाद्य एवं ऊर्जा कॉरिडोर का निर्माण है.
मई 1948 में इज़रायल की स्वतंत्रता को लेकर भू-राजनीतिक जटिलताओं को देखते हुए भारत ने औपचारिक रूप से 17 सितंबर 1950 को इस यहूदी राष्ट्र को मान्यता दी. लेकिन फिलिस्तीन को लेकर अपनी चिंताओं के कारण भारत ने इज़रायल के साथ संबंधों को सामान्य करने में चार दशक से ज़्यादा का समय लगा दिया और इसके बाद जल्द ही रक्षा एवं कृषि दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों में आधार बन गए. बहुआयामी क्षेत्रों में रणनीतिक साझेदारी की शुरुआत जून 2017 में हुई जब इज़रायल और फिलिस्तीन की अलग-अलग यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोनों देशों को लेकर भारत के अलग दृष्टिकोण का संकेत दिया.[2] 1992 में भारत और इज़रायल के बीच संबंध सामान्य होने का कारण सोवियत संघ के विघटन के बाद वैश्विक भू-राजनीतिक माहौल में बदलाव था. मोदी प्रशासन के तहत भू-आर्थिक प्रेरणाओं के साथ-साथ विचारधारा में समानता की वजह से यहूदी राष्ट्र से नज़दीकी बढ़ी है.[3]
आज भारत और इज़रायल के बीच कुल व्यापार 7.86 अरब अमेरिकी डॉलर है.[4] रक्षा के मोर्चे पर भारत के कुल हथियार आयात में इज़रायल का हिस्सा 8.48 प्रतिशत है और ये रूस (46 प्रतिशत), फ्रांस (27 प्रतिशत) और अमेरिका (12 प्रतिशत) के बाद चौथा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है. कृषि समर्थन के मामले में इज़रायल ने भारत के साथ न केवल अपनी कृषि तकनीक और जल संरक्षण की तकनीकों को साझा किया है बल्कि देश भर में कृषि से जुड़े लगभग 30 ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ की भी स्थापना की है.[5] राजनयिक दूत की तरह इज़रायल ने भारत के कृषि विकास में सहायता देने के लिए विशेष नियुक्ति के रूप में अपने कृषि और जल दूत की भी तैनाती की है.[6]
इस बीच भारत-अमीरात संबंध लंबे समय से ऊर्जा, अर्थव्यवस्था और प्रवासियों पर टिके हुए थे और ये काफ़ी हद तक लेन-देन से जुड़ा था. जनवरी 2017 में दोनों देशों ने एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी समझौते पर हस्ताक्षर किए और इसके बाद कई क्षेत्रों में संबंध फलने-फूलने की शुरुआत हुई. आज UAE न सिर्फ़ भारत का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा आपूर्तिकर्ता (20,320.22 मिलियन अमेरिकी डॉलर) है[7] बल्कि ये तीसरा सबसे बड़ा व्यापार साझेदार भी है. 2021-22 में दोनों देशों के बीच कुल द्विपक्षीय व्यापार 73 अरब अमेरिकी डॉलर पर पहुंच गया.[8]
दूसरी तरफ़ UAE एक समय नाम के लिए इज़रायल का दुश्मन था लेकिन दोनों देशों के बीच अनौपचारिक संबंध 2010 से बने हुए हैं. नवंबर 2015 में इज़रायल ने अबू धाबी में अपना पहला राजनयिक दूतावास खोला.[9]
इन साझेदारियों में भारत-मध्य पूर्व-यूरोप कॉरिडोर की तर्ज पर एक अंतर-क्षेत्रीय प्रणाली की स्थापना शामिल है. ये अंतर-क्षेत्रीय प्रणाली आर्थिक पूरकता, संभावित जोशपूर्ण इकोसिस्टम और तकनीकी क्षमताओं पर आधारित है.
इस तरह द्विपक्षीय स्तर पर इज़रायल एवं संयुक्त अरब अमीरात के साथ भारत की भागीदारी और इज़रायल-UAE के बीच संबंध बेहतरी की राह पर हैं. अमेरिका के हस्तक्षेप से महामारी के दौरान अगस्त 2020 में अब्राहम अकॉर्ड[10] की वजह से UAE और इज़रायल के रिश्तों के सामान्य होने से त्रिपक्षीय संबंधों के और मज़बूत होने का रास्ता साफ़ हो गया है. इस समझौते ने तीनों साझेदारों को भविष्य की साझेदारी के लिए अपनी-अपनी विशेष ताक़त को लगाने के लिए समर्थ कर दिया है. इन साझेदारियों में भारत-मध्य पूर्व-यूरोप कॉरिडोर की तर्ज पर एक अंतर-क्षेत्रीय प्रणाली की स्थापना शामिल है. ये अंतर-क्षेत्रीय प्रणाली आर्थिक पूरकता, संभावित जोशपूर्ण इकोसिस्टम और तकनीकी क्षमताओं पर आधारित है. सही मायनों में संबंधों के ‘सामान्यीकरण’ ने तीनों देशों को निर्भरता, सहयोग और मेलजोल की तरफ़ धकेला है.
इन घटनाक्रमों की वजह से कुछ विद्वान इस त्रिपक्षीय संबंध को ‘इंडो-अब्राहमिक अकॉर्ड’[11] कहने लगे हैं. ये संदर्भ उस समय भारत के नये, विश्वसनीय भू-राजनीतिक क्षेत्र को दिखाता है जब वो पश्चिम एशिया में अपना असर बढ़ा रहा है. इसके अलावा दक्षिण एशिया के दिग्गज के रूप में भारत का कद दुनिया के लिए अब कोई रहस्य नहीं है. भारत की आर्थिक स्थिरता एवं विकास, जिसने भारत की क्रय शक्ति समता (परचेज़िंग पावर पैरिटी) में बढ़ोतरी की है, उसे साझेदार देशों के द्वारा विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) के लिए एक आकर्षक बाज़ार बनाता है.[12] [13]
भारत-UAE-इज़रायल त्रिपक्षीय सहयोग
इज़रायल और UAE के बीच संबंधों के सामान्य होने के आठ महीने बाद मई 2021 में भारत ने दोनों क्षेत्रीय किरदारों के साथ एक त्रिपक्षीय साझेदारी पर हस्ताक्षर किया. वर्तमान में, 2030 तक अनुमानित 110 अरब अमेरिकी डॉलर का समझौता UAE में एक बहुत बड़ी परियोजना के लिए इनोवेटिव रोबोटिक सोलर क्लीनिंग तकनीक के उत्पादन पर केंद्रित है.[14] वैसे तो इस परियोजना का एक ही एजेंडा है लेकिन ये इनोवेशन और कारोबारी संभावना से जुड़ा हुआ है और इसलिए ये दोनों देशों के बीच सामान्य सहयोग में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी.
इसी तरह, चार देशों के स्तर पर अक्टूबर 2021 में भारत-इज़रायल-UAE और अमेरिका ने आर्थिक सहयोग के उद्देश्य से एक छोटे गठबंधन का निर्माण किया. (जुलाई 2022 में इसका नाम ‘I2U2’ कर दिया गया) शेरपा, विदेश मंत्री और राष्ट्र प्रमुखों के अलग-अलग स्तर पर इसकी बैठकें आयोजित हुई है. परंपरागत और ग़ैर-परंपरागत क्षेत्रों- जल, ऊर्जा, परिवहन, अंतरिक्ष, स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा- में आपसी हित के कई समझौते हुए हैं लेकिन ज़ोर वैश्विक के साथ-साथ क्षेत्रीय ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा की चुनौतियों का ध्यान रखने पर दिया जा रहा है.[15]
गठबंधन का उद्देश्य समावेशी होना है और ये इंफ्रास्ट्रक्चर, कनेक्टिविटी, कम कार्बन वाले विकास और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी पहल में सार्वजनिक और निजी- दोनों क्षेत्रों को शामिल करना चाहता है. इस प्रकार, त्रिपक्षीय और चार पक्षीय- दोनों स्तरों पर पश्चिम एशियाई देशों के साथ भारत के जुड़ाव का उद्देश्य सहयोग के लिए क्षेत्रों में तालमेल का निर्माण करना है.
क्या भारत एक अंतर-क्षेत्रीय कनेक्टिविटी कॉरिडोर की योजना बना रहा है?
अमेरिका की मध्यस्थता में UAE और इज़रायल के बीच हुए शांति समझौते ने सितंबर 2020 से पश्चिम एशिया के अपने दोनों महत्वपूर्ण साझेदारों के साथ भारत की त्रिपक्षीय बातचीत को आगे बढ़ाया है.[16] [17]इससे पहले भारत पश्चिम एशिया में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता के प्रभावी इस्तेमाल के ज़रिए अलग-अलग रूप से इज़रायल और UAE- दोनों देशों के साथ एक फलता-फूलता संबंध बरकरार रखने में कामयाब रहा था.
इसी तरह, भारत और संयुक्त अरब अमीरात ने फरवरी 2020 में एक व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) पर हस्ताक्षर किए जो मई 2022 में प्रभाव में आया. ये समझौता दोनों देशों के बीच मुक्त, खुला और ग़ैर-भेदभावकारी व्यापार सुनिश्चित करता है.[18] व्यापक समझौता दोनों देशों के बीच कारोबार किए जाने वाले 80 प्रतिशत से ज़्यादा उत्पादों पर शुल्क कम करके या पूरी तरह हटाकर भारतीय बाज़ार में UAE के निर्यात के लिए अधिक पहुंच की गारंटी देता है.
इसी तरह, चार देशों के स्तर पर अक्टूबर 2021 में भारत-इज़रायल-UAE और अमेरिका ने आर्थिक सहयोग के उद्देश्य से एक छोटे गठबंधन का निर्माण किया. शेरपा, विदेश मंत्री और राष्ट्र प्रमुखों के अलग-अलग स्तर पर इसकी बैठकें आयोजित हुई है.
इसी तरह के एक समझौते पर भारत और इज़रायल के बीच बातचीत चल रही है ताकि द्विपक्षीय व्यापार को आसान किया जा सके.[19] मिस्र के साथ भारत की बढ़ती कूटनीतिक नज़दीकी और इस क्षेत्र में भारत की दिलचस्पी में बढ़ोतरी से संकेत मिलता है कि भारत कई साझेदारों के साथ व्यापक अंतर-क्षेत्रीय मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने की उम्मीद कर रहा है.
इस तरह भारत, UAE (फारस की खाड़ी में) और इज़रायल (भूमध्य सागर के क्षेत्र में) के बीच एक जोशपूर्ण त्रिपक्षीय संबंध; साझेदारों के बीच व्यापक मुक्त व्यापार समझौते और अन्य अंतर-क्षेत्रीय किरदारों को शामिल करना- ये सभी बातें संकेत देती हैं कि भारत लाल सागर और खाड़ी के ज़रिए भूमध्य सागर से भारत तक संपर्क की अपनी योजना को लेकर गंभीर है.[20] नवंबर 2021 में अबू धाबी में आयोजित 12वें सर बनी यास फोरम के दौरान भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने UAE, सऊदी अरब, मिस्र, ग्रीस, इज़रायल और साइप्रस के विदेश मंत्रियों के साथ मुलाक़ात की.[21]
प्रस्तावित कॉरिडोर के बारे में कहा जा रहा है कि वो भारत, खाड़ी, अफ्रीका के कुछ हिस्सों और पूर्वी भूमध्य सागर को यूरोप के क्षेत्रों के साथ जोड़ेगा. वैसे तो ये अभी प्राथमिक स्थिति में है लेकिन इस तरह का कनेक्टिविटी कॉरिडोर भारत के द्वारा अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन कॉरिडोर[22] और चाबहार बंदरगाह[23] के विकास की पहल की तरह है जो यूरोप, रूस, मध्य एशिया, ईरान और अफ़ग़ानिस्तान को भारत से जोड़ते हैं. इन दोनों परियोजनाओं में जहां रूस और ईरान भारत के साझेदार हैं, वहीं कनेक्टिविटी कॉरिडोर के विकास में UAE और इज़रायल के साथ अमेरिका की भागीदारी बहुपक्षीय स्तरों पर भारत की सामरिक स्वायत्तता का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है. दिलचस्प बात ये है कि इन कॉरिडोर को बनाकर भारत अपने अंतर-क्षेत्रीय साझेदारों के साथ न केवल सामानों के सुरक्षित आवागमन को सुनिश्चित करना चाहता है बल्कि इंडो-पैसिफिक के पश्चिमी किनारे में अपने हितों की भी रक्षा करना चाहता है. एक तरह से ये चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव जैसी भारत की अपनी परियोजना है.
खाद्य एवं ईंधन कॉरिडोर
दुनिया के कई हिस्सों में मौजूदा खाद्य संकट, जो कोविड-19 महामारी और यूरोप में चल रहे युद्ध की वजह से बढ़ गया है, ने खाने-पीने की चीज़ों के लिए पश्चिम एशिया में विशेष रूप से मांग में बढ़ोतरी की है. ये इलाक़ा अनाज को लेकर अपनी ज़्यादातर ज़रूरतों के लिए रूस और यूक्रेन पर निर्भर है. मई 2022 में खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की एक रिपोर्ट के अनुसार, अनाज के लिए रूस एवं यूक्रेन पर निर्भर 50 देशों में से लगभग 10 देश पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका (WANA) के क्षेत्र में हैं जिनकी रूस और यूक्रेन पर संयुक्त निर्भरता का स्तर 30 प्रतिशत से ज़्यादा है.[24]
त्रिपक्षीय और चार देशों- दोनों स्तर पर भारत-UAE-इज़रायल दक्षिण एशिया और WANA में खाद्य असुरक्षा के मुद्दों का समाधान करने के लिए खाद्य कॉरिडोर बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं. भारत-मध्य पूर्व खाद्य कॉरिडोर- जो कि पश्चिम एशिया में एक नया क़ीमती सप्लाई चेन है- का मक़सद तीनों देशों के बीच व्यावसायिक, निवेश, बाज़ार और तकनीकी तालमेल का इस्तेमाल करके एक त्रिपक्षीय गठबंधन बनाना और अनाज का निर्यात करने वाला एक शक्तिशाली समूह बनना है.[25]
मिस्र के साथ भारत की बढ़ती कूटनीतिक नज़दीकी और इस क्षेत्र में भारत की दिलचस्पी में बढ़ोतरी से संकेत मिलता है कि भारत कई साझेदारों के साथ व्यापक अंतर-क्षेत्रीय मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने की उम्मीद कर रहा है.
इनोवेशन, कृषि-तकनीक और जलवायु अनुकूल तकनीकों से बना संभावित फूड सप्लाई चेन भारत-मध्य पूर्व-यूरोप के बीच प्रस्तावित संपर्क कॉरिडोर के साथ-साथ व्यावसायिक संबंधों को प्रभावी रूप से नया रूप दे सकता है. इसके साथ, इस रूट का उपयोग अंतर-क्षेत्रीय साझेदारों के लिए ऊर्जा कॉरिडोर के रूप में भी होगा. लंबे समय से चल रहे रूस-यूक्रेन युद्ध ने अनाज और ऊर्जा को लेकर आपूर्ति और मांग के बीच अंतर पैदा किया है और इस तरह क्षेत्र में दो महत्वपूर्ण चीज़ों के मामले में कनेक्टिविटी कॉरिडोर से मदद मिलेगी.
तीनों कॉरिडोर- कनेक्टिविटी, ऊर्जा और अनाज- का भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक महत्व कोई नई बात नहीं है; इन परियोजनाओं की मज़बूती इस तथ्य पर निर्भर है कि UAE और इज़रायल- दोनों देश अलग-अलग रूप से भारत के खाद्य उत्पादन और वितरण को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. भारत-मध्य पूर्व खाद्य एवं ऊर्जा कॉरिडोर को सामरिक ताक़त और निरंतरता इस तथ्य से मिलती है कि ये व्यवस्थित रूप से विकसित किया गया है और सबसे पहले इसे द्विपक्षीय स्तर पर मज़बूती मिली थी. निजी क्षेत्र को शामिल करके, संयुक्त उपक्रम के निवेश और द्विपक्षीय सार्वजनिक-निजी हिस्सेदारी के ज़रिए साझेदार देश कॉरिडोर की व्यावहारिकता को सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं.
वर्तमान में इज़रायल के द्वारा विकसित 30 सेंटर ऑफ एक्सीलेंस भारत में हैं जो निजी कंपनियों को शामिल करते हैं और किसानों के प्रशिक्षण एवं उपज बढ़ाने के लिए कृषि-तकनीक और स्मार्ट-तकनीक के प्रभावी उपयोग पर ध्यान देते हैं.
उदाहरण के तौर पर, भारत के कृषि क्षेत्र में इज़रायल 2014 से द्विपक्षीय स्तर पर शामिल है जब उसने देश भर में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाने की शुरुआत की थी. वर्तमान में इज़रायल के द्वारा विकसित 30 सेंटर ऑफ एक्सीलेंस भारत में हैं जो निजी कंपनियों को शामिल करते हैं और किसानों के प्रशिक्षण एवं उपज बढ़ाने के लिए कृषि-तकनीक और स्मार्ट-तकनीक के प्रभावी उपयोग पर ध्यान देते हैं. इसी तरह 2019 से भारत में फूड पार्क की स्थापना I2U2 से पहले संयुक्त अरब अमीरात के द्वारा साजो-सामान की योजना का एक अभिन्न हिस्सा थी.[26]
द्विपक्षीय स्तरों से परे हिस्सेदारी साझेदार देशों को कॉरिडोर के साथ एक अधिक निरंतर खाद्य-पानी-ऊर्जा के गठजोड़ के दृष्टिकोण को इस्तेमाल करने पर ध्यान केंद्रित करने में सक्षम बनाता है. इस तरह I2U2 में अमेरिका की भागीदारी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे राजनीतिक प्रतिबद्धता सुनिश्चित होती है और ये इस जुड़ाव को अधिक बाध्यकारी बनाएगी. वैसे तो अमेरिका कॉरिडोर में सहायता करने वाला नहीं है लेकिन अंतर-क्षेत्रीय साझेदारी में उसकी हिस्सेदारी इंडो-पैसिफिक की सामरिक संरचना में उसकी उपस्थिति दिखाकर इसे एक फ़ायदेमंद स्थिति में रखती है. पश्चिमी इंडो-पैसिफिक, विशेष रूप से पश्चिम एशिया में जहां लगता है कि अमेरिका की पकड़ कमज़ोर हो रही है, में चीन की बढ़ती व्यावसायिक और सामरिक मौजूदगी को काबू में रखने के लिए ये महत्वपूर्ण है.
इसलिए दोनों पहल में एक तालमेल है. I2U2 परियोजना के तहत UAE ने भारत में एकीकृत अनाज कॉरिडोर और पार्क की एक श्रृंखला के निर्माण में 2 अरब अमेरिकी डॉलर के निवेश का संकल्प लिया है. खाद्य-पानी-ऊर्जा के संबंध को शामिल करने के लिए फूड पार्क का निर्माण इस ढंग से किया गया है कि वो एक साथ खाद्य उत्पादन बढ़ाने एवं भोजन की बर्बादी कम करने, जल के संरक्षण और नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोतों के इस्तेमाल की दिशा में काम करेंगे. इसके साथ-साथ कॉरिडोर तीन मुख्य लक्ष्यों यानी भारत में फसल का उत्पादन बढ़ाने; किसानों को अच्छी गुणवत्ता वाले बीज की आपूर्ति करके, उन्हें कृषि-तकनीक की सुविधाओं से लैस करके एवं बेहतर दर पर फसल की बिक्री के ज़रिए उनकी आमदनी बढ़ाने; और दक्षिण एशियाई एवं पश्चिम एशियाई बाज़ारों की आवश्यकताओं का ध्यान रखने के लिए निर्यात की गुणवत्ता का मानक बरकरार रखने को हासिल करने के लिए अधिक समग्र रूप से खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा के पहलुओं का समाधान करना चाहता है.[27]
इसलिए ये पहुंच, उपलब्धता, उपयोग के माध्यम से खाद्य सुरक्षा से जुड़े दाम और स्थायित्व के पहलुओं का समाधान करेगा.[28] वैसे तो कॉरिडोर का उपयोग खाद्य एवं ईंधन की उपलब्धता को सुनिश्चित करता है जबकि जलवायु अनुकूल तकनीक के इस्तेमाल से फसल के उत्पादन में बढ़ोतरी होती है, वहीं कृषि-तकनीक उपलब्धता के पहलू का समाधान करती है और अतिरिक्त एवं लगातार आपूर्ति दाम को बनाए रखने में सहायता करती है. इस तरह खाद्य सुरक्षा की वहनीयता, उपयोगिता और स्थायित्व का समाधान होता है.
I2U2 और त्रिपक्षीय हिस्सेदारी में महत्व दी गई दूसरी परियोजना का उद्देश्य गुजरात के द्वारका में एक हाइब्रिड ऊर्जा प्लांट को आगे बढ़ाना है जिसकी पवन और सौर ऊर्जा क्षमता 300 मेगावाट है. अमेरिकी व्यापार एवं विकास एजेंसी (USTDA) और संयुक्त अरब अमीरात की अंतर्राष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी (IRENA) ने इस प्रस्ताव में जानकारी एवं निवेश साझेदार के तौर पर निवेश करने का संकल्प लिया है. USTDA ने परियोजना की संभावना के अध्ययन पर 300 मिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश किया है. निजी क्षेत्र की कंपनियों की भागीदारी इस परियोजना को भारत के द्वारा 2030 तक 500 गीगावॉट के ग़ैर-जीवाश्म ईंधन की क्षमता तक पहुंचने के लक्ष्य को हासिल करने में समर्थ बनाएगी. इस तरह परियोजना की सफलता नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भारत के वैश्विक सप्लाई चेन का केंद्र बनने की संभावना को निर्धारित करेगी.[29]
हर साझेदार की मज़बूती यानी अमेरिका की राजनीतिक प्रतिबद्धता, इज़रायल की सर्वश्रेष्ठ जलवायु अनुकूल तकनीक, UAE की निवेश की क्षमता और भारत की मानव पूंजी, विशाल कृषि योग्य भूमि एवं व्यावसायिक संभावनाओं को आसान बनाने के लिए सीमित कूटनीतिक बाधाओं का फ़ायदा उठाकर ये साझा पहल भारत-मध्य पूर्व-यूरोप कॉरिडोर के साथ अंतर-क्षेत्रीय खाद्य एवं ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक व्यावहारिक समाधान हो सकती है.
अंत में, इज़रायल-UAE संबंधों के सामान्य होने से भारत समर्थ बना है कि वो पश्चिम एशिया के अपने दो जोशपूर्ण साझेदारों के साथ द्विपक्षीय, त्रिपक्षीय, चार पक्षीय और बहुपक्षीय स्तरों पर जुड़े. इस तरह की बहु-स्तरीय भागीदारों ने अलग-अलग देशों को विभिन्न पहलुओं में अपनी निर्भरता, सहयोग और मेलजोल को एक लक्ष्य की तरफ़ केंद्रित करने में सहायता की है. इस तरह की परिणाम केंद्रित मानसिकता यूरोप-भूमध्यसागर-खाड़ी-भारत रूट के साथ-साथ एक अंतर-क्षेत्रीय संपर्क कॉरिडोर विकसित करने में महत्वपूर्ण है.
खाद्य-पानी-ऊर्जा के गठजोड़ का इस्तेमाल करके तीनों देश का उद्देश्य पश्चिमी इंडो-पैसिफिक के साथ-साथ अपनी आर्थिक एवं राजनीतिक संभावनाओं को मज़बूत करना है. जिस समय इंडो-पैसिफिक भारत की सामरिक गणना में महत्वपूर्ण स्थान रखता है, उस समय UAE और इज़रायल के साथ ज़्यादा मज़बूत साझेदारी इस क्षेत्र में रणनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने में महत्वपूर्ण होगा. कुल मिलाकर खाद्य, ऊर्जा एवं पानी भविष्य के अहम ग़ैर-परंपरागत रणनीतिक भाग हैं. वैश्विक सप्लाई चेन में कार्य-कुशलता के साथ आवश्यकता का ध्यान रखकर भारत और उसके अंतर-क्षेत्रीय साझेदार दुनिया के बड़े देशों की सूची में अपनी जगह बना रहे हैं.
Endnotes
[1] [1] Michael Tanchum, “The India-Middle East Food Corridor: How the UAE, Israel and India Are Forging a New Inter-regional Supply Chain,” The Middle East Institute, July 27, 2022.
[2] [2] Sanjeev Miglani and Tova Cohen, “India’s Modi Heads to Israel, Lifting the Curtain on Close Ties,” Reuters, June 30, 2017.
[3] [3] Manjari Singh and Chirayu Thakkar, “The Real Story Behind India and Israel’s Surprising Alliance,” Haaretz, February 8, 2022.
[4] [4] Naina Bhardwaj, “India-Israel Bilateral Trade and Investment Trends,” India Briefing, August 25, 2022.
[5] [5] Manjari Singh and Chirayu Thakkar, “India and Israel Mean Business, In Many New Sectors,” The Economic Times, February 13, 2022.
[6] [6] Manjari Singh, “Can I2U2 Address India’s Food Security Challenges?,” The Times of India, September 28, 2022.
[7][7] Director General of Foreign Trade (DGFT), “Import: Commodity and Countrywise,” Export Import Databank, 2022.
[8] [8] Embassy of India in Abu Dhabi, “Bilateral Economic and Commercial Relations,” Government of India.
[9][9] Barak Ravid, “Exclusive: Israel to Open First Diplomatic Mission in Abu Dhabi,” Haaretz, November 27, 2015.
[10][10] Under the Trump administration, a peace accord was signed between Israel and a few Arab countries, such as the UAE, Bahrain and eventually Morocco (effective since September 2020). The peace deal was named the Abraham Accords to give theological importance to the accord based on common lineage. Abraham or Ibrahim (in Islam) is the father of Isaac (a Jew) and Ishma’il (an Arab Muslim), thus suggesting that Abraham is the father figure to both Muslims and Jews, and therefore, Jews and Muslims are brothers. As family and blood relations are part of a close-knit social fabric, designating such a name to the accord would symbolise its success.
[11][11] Mohammed Soliman, “An Indo-Abrahamic Alliance On the Rise: How India, Israel, and the UAE are Creating a New Transregional Order,” Middle East Institute, July 28, 2021.
[12][12] With 7 percent growth, India’s economy stands at US$3.53 trillion at current prices, which makes the country the fifth largest economy in the world. In terms of purchasing power parity, India stands third. For more details, refer Martin Armstrong, “India Overtakes UK to Become Fifth Biggest Economy,” World Economic Forum, September 26, 2022.
[13][13] Ravi Bhoothlingam, “The ‘Asian Age’ and Role of China and India,” Global Times, July 14, 2019.
[14][14] Rezaul H. Laskar, “UAE Trade Deals With India, Israel Hold Potential for Extensive Trilateral Cooperation: Naor Gilon,” The Hindustan Times, May 31, 2022.
[15][15] Ministry of External Affairs (MEA).
[16] [16] “Abraham Accords Peace Agreement: Treaty of Peace, Diplomatic Relations and Full Normalization between the United Arab Emirates and the State of Israel,” US State Department, September 15, 2020.
[17][17] Alexander Cornwell, “Israel, UAE Boost Ties With Free Trade Pact,” Reuters, May 31, 2022.
[18][18] “UAE-India Comprehensive Economic Partnership Agreement,” United Arab Emirates Ministry of Economy.
[19][19] Ministry of Commerce and Industry, “India-Israel Free Trade Agreement (FTA) Negotiations,” Government of India.
[20][20] Sidhant Sibal, “Plans Afoot for Connectivity from Mediterranean to India Via Gulf,” WION, October 5, 2021.
[21][21] Sidhant Sibal, “Plans Afoot for Connectivity from Mediterranean to India Via Gulf”
[22][22] “Explained: INSTC, the Transport Route That Has Russia and India’s Backing,” Business Standard, July 14, 2022.
[23][23] Manjari Singh, “The Chabahar Port Imperative,” in Iran Under Ebrahim Raisi: The View from India, Special Report No. 154, ed. Kabir Taneja, Observer Research Foundation, August 2021, pp. 5–9.
[24][24] Lebanon, Egypt, Libya, Oman, Saudi Arabia, Yemen, Tunisia, Iran, Jordan, and Morocco import exorbitantly from Russia and Ukraine. For details, see Food and Agriculture Organization (FAO), Impact of the Ukraine-Russia Conflict on Global Food Security Related Matters Under the Mandate of the Food and Agriculture Organization of the United Nations (FAO), May 2022, https://www.fao.org/3/nj164en/nj164en.pdf.
[25][25] Tanchum, “The India-Middle East Food Corridor: How the UAE, Israel and India Are Forging a New Inter-Regional Supply Chain.”
[26][26] I2U2 is an acronym for the India-Israel-UAE-US quadrilateral and inter-regional engagement which aims to address six areas of critical and mutual interests. Food and energy are the two most focused areas of cooperation in the current format.
[27][27] Manjari Singh, “Can I2U2 Address India’s Food Security Challenges?”
[28][28] Food and Agriculture Organization (FAO), Food Security, June 2006, https://www.fao.org/fileadmin/templates/faoitaly/documents/pdf/pdf_Food_Security_Cocept_Note.pdf.
[29][29] Manjari Singh, “I2U2: Shaping Stable and Prosperous Middle East,” India and the World 5, no. 3: 66–71.
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