Author : Shoba Suri

Expert Speak Health Express
Published on Mar 16, 2023 Updated 0 Hours ago

रोकथाम, जल्दी पता लगाना और इलाज ग़ैर-संक्रामक बीमारियों से होने वाली मौतों में महत्वपूर्ण कमी लाने के लिए आवश्यक है. 

महिलाओं में ग़ैर-संक्रामक बीमारियों का बढ़ता प्रचलन!

ग़ैर-संक्रामक बीमारियां यानी (NCD) दुनिया भर में सालाना 4 करोड़ 10 लाख या कुल मौतों में से 74 प्रतिशत के लिए ज़िम्मेदार हैं. NCD से जुड़ी मौतों में से 77 प्रतिशत निम्न या मध्यम आमदनी वाले देशों में होती हैं. ग़ैर-संक्रामक बीमारियों से हर साल होने वाली आधी से ज़्यादा मौतें या 1 करोड़ 79 लाख मौतें दिल से जुड़ी बीमारियों से होती हैं. इसके बाद कैंसर (93 लाख), फेफड़े से जुड़ी बीमारी (41 लाख) और डायबिटीज़ (20 लाख मौतें जिनमें डायबिटीज़ की वजह से होने वाली किडनी की बीमारी से मौतें शामिल हैं) हैं. ग़ैर-संक्रामक बीमारियों से जुड़ी मौतों में से जो 80 प्रतिशत से ज़्यादा मौतें समय से पहले होती हैं वो इन चार तरह की बीमारियों के कारण होती हैं. 

ग़ैर-संक्रामक बीमारियां यानी (NCD) दुनिया भर में सालाना 4 करोड़ 10 लाख या कुल मौतों में से 74 प्रतिशत के लिए ज़िम्मेदार हैं. NCD से जुड़ी मौतों में से 77 प्रतिशत निम्न या मध्यम आमदनी वाले देशों में होती हैं. ग़ैर-संक्रामक बीमारियों से हर साल होने वाली आधी से ज़्यादा मौतें या 1 करोड़ 79 लाख मौतें दिल से जुड़ी बीमारियों से होती हैं. इसके बाद कैंसर (93 लाख), फेफड़े से जुड़ी बीमारी (41 लाख) और डायबिटीज़ (20 लाख मौतें जिनमें डायबिटीज़ की वजह से होने वाली किडनी की बीमारी से मौतें शामिल हैं) हैं. ग़ैर-संक्रामक बीमारियों से जुड़ी मौतों में से जो 80 प्रतिशत से ज़्यादा मौतें समय से पहले होती हैं वो इन चार तरह की बीमारियों के कारण होती हैं. 

महिलाएं एवं लड़कियां विशेष रूप से जोख़िम का सामना कर रही हैं क्योंकि मरने वाली हर तीन महिलाओं और लड़कियों में से क़रीब-क़रीब दो की मौत NCD से होती है. इसका मतलब है कि हर साल 1 करोड़ 68 लाख महिलाओं की मृत्यु गैर-संक्रामक रोगों से होती है.

महिलाएं एवं लड़कियां विशेष रूप से जोख़िम का सामना कर रही हैं क्योंकि मरने वाली हर तीन महिलाओं और लड़कियों में से क़रीब-क़रीब दो की मौत NCD से होती है. इसका मतलब है कि हर साल 1 करोड़ 68 लाख महिलाओं की मृत्यु गैर-संक्रामक रोगों से होती है. पिछले तीन दशकों के दौरान निम्न और मध्यम आमदनी वाले देशों में महिलाओं की सेहत से जुड़ी समस्याओं में काफ़ी बदलाव आ चुका है. NCD, जिन्हें पहले अमीरों की बीमारी माना जाता था, अब विकासशील और विकसित- दोनों प्रकार के देशों में महिलाओं के बीच मौत और विकलांगता का सबसे बड़ा कारण है. लैंसेट के मुताबिक़, जिन 186 देशों और क्षेत्रों में अध्ययन किया गया है उनमें से 164 (88 प्रतिशत) में महिलाओं और 165 (89 प्रतिशत) में पुरुषों के 70 वर्ष से कम उम्र में संक्रामक, मां से जुड़ी, नवजात और पोषण संबंधी बीमारियों को मिलाकर होने वाली कुल मौत़ों के मुक़ाबले NCD से मरने की ज़्यादा आशंका है.  

आंकड़ा 1: अलग-अलग उम्र और लिंग के अनुसार विश्व में ग़ैर-संक्रामक बीमारियों का बोझ

 The Heightened Prevalence Of Noncommunicable Diseases In Women

उपर्युक्त आंकड़े से पता चलता है कि पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं में ग़ैर-संक्रामक बीमारियां होने की आशंका ज़्यादा है और जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ती जाती है, उनकी सेहत में गिरावट आती है. हर साल महिलाओं की कुल मौत में अकेले दिल से जुड़ी बीमारियों का योगदान 35 प्रतिशत (तीन में से एक मौत) है लेकिन इसके बावजूद इनका ठीक से निदान या उपचार नहीं होता है. एक अनुमान के मुताबिक़ 2045 तक 2017 के मुक़ाबले 20 से 79 साल की उम्र की 30 करोड़ 80 लाख ज़्यादा महिलाओं को डायबिटीज़ होगा. ये बीमारियां महिलाओं और लड़कियों के बीच तीन में से दो मौतों के लिए ज़िम्मेदार होंगी और उनमें मृत्यु और अपंगता का मुख्य कारण हैं. 

महिलाएं एवं लड़कियां, विशेष रूप से निम्न और मध्य आमदनी वाले देशों में रहने वाली, अक्सर संक्रामक और ग़ैर-संक्रामक बीमारियों के साथ-साथ प्रजनन से जुड़े स्वास्थ्य की समस्याओं के तिगुने  बोझ का अनुभव करती हैं. NCD की वजह से ख़राब सेहत और मृत्यु समाज में महिलाओं की सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति को जोख़िम में डालती हैं और जीवन भर उनके स्वास्थ्य एवं विकास को प्रभावित करती हैं. महिलाएं एवं लड़कियां को डिप्रेशन और पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर होने का ख़तरा ज़्यादा है और इन दोनों ही बीमारियों का शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर दीर्घकालीन नकारात्मक असर पड़ता है. 

महिलाओं एवं लड़कियों की केवल व्यक्तिगत सेहत के आगे भी इन बीमारियों का उनके ऊपर काफ़ी असर होता है. मौजूदा समय में मानव जनसंख्या में महामारी विज्ञान से जुड़ी रिसर्च और आनुवंशिक बदलाव की प्रक्रिया की बेहतरीन जानकारी से पता चलता है कि जन्म से पहले की घटनाएं डायबिटीज़ और दूसरी ग़ैर-संक्रामक बीमारियों के विकसित होने में योगदान कर सकती हैं. कुपोषण, देर से शारीरिक एवं मानसिक विकास और वयस्क होने पर ग़ैर-संक्रामक बीमारियां, जिनमें डायबिटीज़ और दिल से जुड़े रोग शामिल हैं, कुपोषित मां के गर्भ से पैदा होने से जुड़े जोख़िम हैं. 

बदनामी और सामाजिक नियमों के कारण अक्सर तंबाकू खाने, हानिकारक शराब पीने, ख़राब भोजन, शारीरिक रूप से निष्क्रियता और अंदरुनी एवं आस-पास के प्रदूषण से जोख़िम पुरुषों एवं लड़कों के मुक़ाबले महिलाओं एवं लड़कियों में अलग होता है. दुनिया में लगभग 37 प्रतिशत वयस्क पुरुष एवं 9 प्रतिशत वयस्क महिलाएं धूम्रपान करती हैं. 

मज़बूत स्वास्थ्य नीति

पुरुषों एवं महिलाओं के बीच NCD से जुड़े जोख़िम अलग-अलग होते हैं. ज़्यादा वज़न या मोटापा स्वास्थ्य से जुड़ी एक गंभीर चिंता है और ये कई तरह के ग़ैर-संक्रामक रोगों से जुड़ा है. बीमारी, अपंगता और मौत का ज़्यादा जोख़िम इसके साथ जुड़ा है. कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों में बढ़ोतरी, जैसे कि कोरोनरी हार्ट बीमारी, हाइपरटेंशन, स्ट्रोक, टाइप-2 डायबिटीज़ और कई तरह के कैंसर, जिनमें मासिक धर्म समाप्त होने के बाद महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर, गर्भाशय का कैंसर, कोलन एवं किडनी का कैंसर शामिल हैं, मौत के लिए बड़े जोख़िम के कारक हैं. मोटापा और शारीरिक निष्क्रियता जैसे जोख़िमों के कारण सामान्य रूप से पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं को NCD से जुड़ा ख़तरा ज़्यादा है. इसकी वजह ये है कि मोटापा और शारीरिक निष्क्रियता पुरुषों की तुलना में महिलाओं में आम तौर पर ज़्यादा देखी जाती हैं. 

NCD के कारण स्वास्थ्य देखभाल की लागत में बढ़ोतरी होती है, उत्पादकता को नुक़सान होता है और बेतहाशा खर्च होता है. दुनिया भर में महिलाओं के बीच ग़रीबी ज़्यादा है और वो NCD का इलाज कराने में सक्षम नहीं होती हैं. 

महिलाओं की सेहत का असर उनके बच्चों की सेहत पर भी पड़ता है. कुपोषित मां से पैदा बच्चों में कुपोषण, जन्म के समय कम वज़न और बड़े होने पर NCD के प्रति ज़्यादा संवेदनशीलता का जोख़िम होता है. इसलिए मां की बेहतर सेहत भविष्य की पीढ़ी के लिए भी महत्वपूर्ण है. 

NCD को सतत विकास के लिए 2030 के एजेंडा में महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य की चिंता के रूप में स्वीकार किया जाता है. सतत विकास लक्ष्य (SDG) 3 के टारगेट 3.4 में 2030 तक NCD से जुड़ी मौतों की संख्या में एक-तिहाई कमी का आह्वान किया गया है. 2015 के स्तर की तुलना में 30 और 70 साल की उम्र के बीच कैंसर, कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों, सांस की बीमारियों और डायबिटीज़ से मरने की आशंका में एक-तिहाई कमी के साथ SDG 3 के टारगेट 3.4 को 35 देशों (19 प्रतिशत महिलाओं और 16 प्रतिशत पुरुषों) में पूरा कर लिया जाएगा.

महिलाओं की सेहत का असर उनके बच्चों की सेहत पर भी पड़ता है. कुपोषित मां से पैदा बच्चों में कुपोषण, जन्म के समय कम वज़न और बड़े होने पर NCD के प्रति ज़्यादा संवेदनशीलता का जोख़िम होता है. 

टारगेट 3.4 तक पहुंचने के उद्देश्य से ग़ैर-संक्रामक बीमारियों से होने वाली मौतों में महत्वपूर्ण कमी के लिए रोकथाम, जल्दी पता लगाना और इलाज आवश्यक हैं. महिलाओं के लिए स्वास्थ्य बीमा और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने वाली लैंगिक रूप से संवेदनशील स्वास्थ्य नीतियों की आवश्यकता है. बड़ा बदलाव लाने के लिए वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर निवेश और प्रतिबद्धताओं की ज़रूरत है.  

महिलाएं एवं लड़कियां विशेष रूप से जोख़िम का सामना कर रही हैं क्योंकि मरने वाली हर तीन महिलाओं और लड़कियों में से क़रीब-क़रीब दो की मौत NCD से होती है. इसका मतलब है कि हर साल 1 करोड़ 68 लाख महिलाओं की मृत्यु गैर-संक्रामक रोगों से होती है. पिछले तीन दशकों के दौरान निम्न और मध्यम आमदनी वाले देशों में महिलाओं की सेहत से जुड़ी समस्याओं में काफ़ी बदलाव आ चुका है. NCD, जिन्हें पहले अमीरों की बीमारी माना जाता था, अब विकासशील और विकसित- दोनों प्रकार के देशों में महिलाओं के बीच मौत और विकलांगता का सबसे बड़ा कारण है. लैंसेट के मुताबिक़, जिन 186 देशों और क्षेत्रों में अध्ययन किया गया है उनमें से 164 (88 प्रतिशत) में महिलाओं और 165 (89 प्रतिशत) में पुरुषों के 70 वर्ष से कम उम्र में संक्रामक, मां से जुड़ी, नवजात और पोषण संबंधी बीमारियों को मिलाकर होने वाली कुल मौत़ों के मुक़ाबले NCD से मरने की ज़्यादा आशंका है.  

आंकड़ा 1: अलग-अलग उम्र और लिंग के अनुसार विश्व में ग़ैर-संक्रामक बीमारियों का बोझ

 The Heightened Prevalence Of Noncommunicable Diseases In Women

उपर्युक्त आंकड़े से पता चलता है कि पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं में ग़ैर-संक्रामक बीमारियां होने की आशंका ज़्यादा है और जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ती जाती है, उनकी सेहत में गिरावट आती है. हर साल महिलाओं की कुल मौत में अकेले दिल से जुड़ी बीमारियों का योगदान 35 प्रतिशत (तीन में से एक मौत) है लेकिन इसके बावजूद इनका ठीक से निदान या उपचार नहीं होता है. एक अनुमान के मुताबिक़ 2045 तक 2017 के मुक़ाबले 20 से 79 साल की उम्र की 30 करोड़ 80 लाख ज़्यादा महिलाओं को डायबिटीज़ होगा. ये बीमारियां महिलाओं और लड़कियों के बीच तीन में से दो मौतों के लिए ज़िम्मेदार होंगी और उनमें मृत्यु और अपंगता का मुख्य कारण हैं. 

महिलाएं एवं लड़कियां, विशेष रूप से निम्न और मध्य आमदनी वाले देशों में रहने वाली, अक्सर संक्रामक और ग़ैर-संक्रामक बीमारियों के साथ-साथ प्रजनन से जुड़े स्वास्थ्य की समस्याओं के तिगुने  बोझ का अनुभव करती हैं. NCD की वजह से ख़राब सेहत और मृत्यु समाज में महिलाओं की सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति को जोख़िम में डालती हैं और जीवन भर उनके स्वास्थ्य एवं विकास को प्रभावित करती हैं. महिलाएं एवं लड़कियां को डिप्रेशन और पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर होने का ख़तरा ज़्यादा है और इन दोनों ही बीमारियों का शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर दीर्घकालीन नकारात्मक असर पड़ता है. 

महिलाओं एवं लड़कियों की केवल व्यक्तिगत सेहत के आगे भी इन बीमारियों का उनके ऊपर काफ़ी असर होता है. मौजूदा समय में मानव जनसंख्या में महामारी विज्ञान से जुड़ी रिसर्च और आनुवंशिक बदलाव की प्रक्रिया की बेहतरीन जानकारी से पता चलता है कि जन्म से पहले की घटनाएं डायबिटीज़ और दूसरी ग़ैर-संक्रामक बीमारियों के विकसित होने में योगदान कर सकती हैं. कुपोषण, देर से शारीरिक एवं मानसिक विकास और वयस्क होने पर ग़ैर-संक्रामक बीमारियां, जिनमें डायबिटीज़ और दिल से जुड़े रोग शामिल हैं, कुपोषित मां के गर्भ से पैदा होने से जुड़े जोख़िम हैं. 

बदनामी और सामाजिक नियमों के कारण अक्सर तंबाकू खाने, हानिकारक शराब पीने, ख़राब भोजन, शारीरिक रूप से निष्क्रियता और अंदरुनी एवं आस-पास के प्रदूषण से जोख़िम पुरुषों एवं लड़कों के मुक़ाबले महिलाओं एवं लड़कियों में अलग होता है. दुनिया में लगभग 37 प्रतिशत वयस्क पुरुष एवं 9 प्रतिशत वयस्क महिलाएं धूम्रपान करती हैं. 

मज़बूत स्वास्थ्य नीति

पुरुषों एवं महिलाओं के बीच NCD से जुड़े जोख़िम अलग-अलग होते हैं. ज़्यादा वज़न या मोटापा स्वास्थ्य से जुड़ी एक गंभीर चिंता है और ये कई तरह के ग़ैर-संक्रामक रोगों से जुड़ा है. बीमारी, अपंगता और मौत का ज़्यादा जोख़िम इसके साथ जुड़ा है. कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों में बढ़ोतरी, जैसे कि कोरोनरी हार्ट बीमारी, हाइपरटेंशन, स्ट्रोक, टाइप-2 डायबिटीज़ और कई तरह के कैंसर, जिनमें मासिक धर्म समाप्त होने के बाद महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर, गर्भाशय का कैंसर, कोलन एवं किडनी का कैंसर शामिल हैं, मौत के लिए बड़े जोख़िम के कारक हैं. मोटापा और शारीरिक निष्क्रियता जैसे जोख़िमों के कारण सामान्य रूप से पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं को NCD से जुड़ा ख़तरा ज़्यादा है. इसकी वजह ये है कि मोटापा और शारीरिक निष्क्रियता पुरुषों की तुलना में महिलाओं में आम तौर पर ज़्यादा देखी जाती हैं. 

NCD के कारण स्वास्थ्य देखभाल की लागत में बढ़ोतरी होती है, उत्पादकता को नुक़सान होता है और बेतहाशा खर्च होता है. दुनिया भर में महिलाओं के बीच ग़रीबी ज़्यादा है और वो NCD का इलाज कराने में सक्षम नहीं होती हैं. 

महिलाओं की सेहत का असर उनके बच्चों की सेहत पर भी पड़ता है. कुपोषित मां से पैदा बच्चों में कुपोषण, जन्म के समय कम वज़न और बड़े होने पर NCD के प्रति ज़्यादा संवेदनशीलता का जोख़िम होता है. इसलिए मां की बेहतर सेहत भविष्य की पीढ़ी के लिए भी महत्वपूर्ण है. 

NCD को सतत विकास के लिए 2030 के एजेंडा में महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य की चिंता के रूप में स्वीकार किया जाता है. सतत विकास लक्ष्य (SDG) 3 के टारगेट 3.4 में 2030 तक NCD से जुड़ी मौतों की संख्या में एक-तिहाई कमी का आह्वान किया गया है. 2015 के स्तर की तुलना में 30 और 70 साल की उम्र के बीच कैंसर, कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों, सांस की बीमारियों और डायबिटीज़ से मरने की आशंका में एक-तिहाई कमी के साथ SDG 3 के टारगेट 3.4 को 35 देशों (19 प्रतिशत महिलाओं और 16 प्रतिशत पुरुषों) में पूरा कर लिया जाएगा. 

महिलाओं की सेहत का असर उनके बच्चों की सेहत पर भी पड़ता है. कुपोषित मां से पैदा बच्चों में कुपोषण, जन्म के समय कम वज़न और बड़े होने पर NCD के प्रति ज़्यादा संवेदनशीलता का जोख़िम होता है.

टारगेट 3.4 तक पहुंचने के उद्देश्य से ग़ैर-संक्रामक बीमारियों से होने वाली मौतों में महत्वपूर्ण कमी के लिए रोकथाम, जल्दी पता लगाना और इलाज आवश्यक हैं. महिलाओं के लिए स्वास्थ्य बीमा और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने वाली लैंगिक रूप से संवेदनशील स्वास्थ्य नीतियों की आवश्यकता है. बड़ा बदलाव लाने के लिए वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर निवेश और प्रतिबद्धताओं की ज़रूरत है.  

The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.