ये लेख हमारी पत्रिका रायसीना फ़ाइल्स 2023 का एक अध्याय है.
अंतरराष्ट्रीय संबंधों से जुड़े शास्त्र की शुरुआत तक़रीबन एक सदी पहले हुई थी. मोटे तौर पर तभी से ज्ञान की ये शाखा यूरोप केंद्रित रही है. प्राथमिक तौर पर महाशक्तियों के बीच की प्रतिस्पर्धा से इसके जुड़ाव के साथ-साथ सत्ता, व्यवस्था, सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों के यथार्थवादी विचारों का सार्वभौमिकरण किए जाने की प्रक्रिया ने ग़ैर-पश्चिमी समाजों में ज्ञान के निर्माण की अहमियत को हाशिए पर डाल दिया. ऊपर बताई गई पूरी प्रक्रिया प्रमुख रूप से राज्यसत्ता और शासनकला के पश्चिमी ईसाई आधार पर खड़ी की गई. बहरहाल, वैश्वीकरण ख़ासतौर से चीन और भारत के उभार ने उनकी सामरिक संस्कृतियों (जो उनके प्राचीन अतीत पर आधारित है) के अध्ययन को प्रासंगिक बना दिया है. इनके ज़रिए राज्यसत्ता के बर्ताव की सांस्कृतिक व्याख्या उजागर होती है. घरेलू स्तर पर विकसित ऐसे दार्शनिक सिद्धांत ढेरों सार्वभौम और यथार्थवादी विचारों को साझा करने के साथ-साथ कई अनोखी विशेषताओं का प्रदर्शन करते हैं.
वैश्वीकरण, पुनर्संतुलन और बहुध्रुवीयता से संचालित समसामयिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति ने दूसरी भौगोलिक इकाइयों के महत्व को विस्तार दे दिया है. साथ ही इस प्रक्रिया ने असलियत में 'वैश्विक' अंतरराष्ट्रीय संबंधों की ज़रूरत को रेखांकित किया है.
प्राचीन भारतीय चिंतक कौटिल्य ने राजमंडल (अंतर-राज्यीय क्षेत्रों की संकेंद्रिक, भूराजनीतिक परिकल्पना), सत्ता का सप्तगंगा सिद्धांत (सात अंग), और मत्स्य न्याय (मछलियों के नियम) प्रस्तुत किए थे. ये तमाम विचार मैकियावेली के 'प्रिंस' (1513), हॉब्स के स्टेट ऑफ़ नेचर (1651), हैंस जे मॉर्गेंथो की 'नेशनल पावर' (1948) या केनेथ वाल्ट्ज़ की 'एनार्की' (1959) से काफ़ी पहले आए. मोटे तौर पर पश्चिम की इन तमाम रचनाओं में कौटिल्य की नीतियों के ही संकेत मिलते हैं. हालांकि इनकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि अलग-अलग है. मौजूदा वक़्त में भारत, दुनिया के साथ गहन रूप से जुड़ाव बना रहा है. ऐसे में इन विचारों के बीच की समानता और भेदों को स्पष्टता के साथ सामने रखना पहले से ज़्यादा प्रासंगिक हो गया है. दोनों विचारों के केंद्र में दुनिया की गंभीर चुनौतियों का निपटारा करने के साथ-साथ वैश्विक सहयोग के अवसरों और संभावनाओं का उपयोग करना शामिल है. इन क़वायदों को अंजाम देने के लिए ज़बरदस्त क्षमता और इच्छाशक्ति मौजूद है.
हालिया वक़्त में क्षेत्रीय तौर पर भारत सबसे ख़तरनाक सुरक्षा वातावरण का सामना कर रहा है. आक्रामक चीन और उथलपुथल भरा आस-पड़ोस वैश्विक चिंताओं का सबब बनने के साथ-साथ भारत के लिए कई नाज़ुक मसले पैदा कर रहा है. हालांकि इन मिश्रणों के बावजूद भारत इन चुनौतियों से निपटने के लिए कई उपायों का अनोखा समूह प्रस्तुत करता है. आम तौर पर ये विरोधाभासी लगते हैं, और अक्सर सहयोगियों के रुख़ से बेमेल नज़र आते हैं. समकालीन हिंदुस्तान की ख़ासियत बन चुकी निर्गुटता, सौदेबाज़ी के व्यवहार, सामरिक संयम और रिश्तों में 'काले अध्यायों' को भारत द्वारा ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार कर लिए जाने से जुड़ी क़वायदों की भविष्यवाणी करना इतना कठिन क्यो रहा है? भारतीय सभ्यता का आधार उन भौगोलिक इकाइयों से इसे कैसे अलग करता है जहां से थुसाइडिडेस, मैकियावेली, क्लाउज़विट्ज़ और मॉर्गेंथो जुड़े हैं?
ये लेख उस दृष्टिकोण को बेपर्दा करता है जिसके ज़रिए भारत विश्व को देखता है शासन कला पर प्राचीन पुस्तक कौटिल्य के अर्थशास्त्र की पड़ताल के ज़रिए इसका अध्ययन किया गया है. व्यापक रूप से इसी पुस्तक को भारत के राजनीतिक चिंतन की बुनियादी रचना के तौर पर देखा जाता है.
समग्र शासन कला
अंतरराष्ट्रीय संबंध से जुड़े विचार प्राचीन भारतीय शासन कला में जुड़े हुए हैं. प्राथमिक रूप से कौटिल्य के अर्थशास्त्र का अंतिम लक्ष्य और 'वैचारिक खाका' योगक्षेम है. इसमें 'योग' का मतलब क्रिया या वस्तुओं का संग्रहण है और 'क्षेम' का मतलब संघटन या सुरक्षित भंडारण है. कुल मिलाकर इस वैचारिक परिकल्पना से प्रजा की रक्षा और पालना (बेहतरी) सुनिश्चित होती है. राजनीतिक और आर्थिक रुख़ के ज़रिए इस दोहरे कार्य को अंजाम दिया जाता है. ये राजनीति विज्ञान (दंडनीति) और अर्थशास्त्र (वर्त); आंतरिक क्षेत्र (तंत्र) और अंतर-राज्यीय (अवाप) को सार्थक रूप से जोड़ता है. प्रजा की भौतिक बेहतरी, राजनीतिक वैधानिकता को पुख़्ता करते हुए सामाजिक एकजुटता को बरक़रार रखती है. इससे लाभदायक आर्थिक उत्पादन होता है, जो आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में राजा द्वारा धारण किए दंड को मज़बूती देता है. इससे राज्य की सुरक्षा उन्नत होती है. कौटिल्य का सिद्धांत पश्चिमी राज्य प्रणाली के भीतरी/बाहरी ढांचे को इस विचार के साथ ख़ारिज करता है कि "किसी राज्यसत्ता का कल्याण सक्रिय विदेश नीति पर निर्भर करता है."[1]
ये लेख उस दृष्टिकोण को बेपर्दा करता है जिसके ज़रिए भारत विश्व को देखता है. इसमें प्राचीन भारतीय सामरिक चिंतन के बुनियादी सिद्धांतों की पड़ताल की गई है. साथ ही ये बताया गया है कि अवसरों और चुनौतियों से घिरे संसार को इस चिंतन से क्या हासिल हो सकता है.
आपस में जुड़े ये दो क्षेत्र "राज्यसत्ता के सात संघटक तत्वों" के इर्द-गिर्द घूमते हैं जो राज निकाय के सात अंगों (सप्तांग) का प्रतिनिधित्व करते हैं. इन सात अंगों में- (1) राजा (स्वामी); (2) मंत्रिपरिषद (अमात्य); (3) ग्रामक्षेत्र (जनपद); (4) किला (दुर्ग); (5) ख़ज़ाना (कोष); (6) सेना (दंड); और (7) सहयोगी (मित्र) शामिल हैं. ये पदों के अनुक्रम का पालन करता हुए आपस में मिलकर किसी राज्य की समग्र राष्ट्रीय शक्ति का निर्माण करते हैं. राजकीय सत्ता, सैन्य शक्ति की बजाए राजनीतिक नेतृत्व की बुद्धिमानी और प्रजा (जनपद) की ख़ुशहाली से तय होती है. ये बात ग़ौर करने लायक़ है और संघटक तत्वों की व्यवस्था से प्रसारित होती है. शासक के कंधों पर ऊर्जावान और सक्रिय रहने की ज़िम्मेदारी होती है. साथ ही उसे भौतिक बेहतरी (अर्थ) लाने वाले उद्यमों से जुड़ा रहना होता है. यही आध्यात्मिक संतुष्टि (धर्म) और संवेदी सुखों (काम) की बुनियाद है.
वैश्वीकृत और आपस में निर्भरता वाली सम-सामयिक राज्य प्रणाली में किसी राज्य की समृद्धि और सुरक्षा, सहज रूप से उस क्षेत्र और समूची दुनिया की समृद्धि और सुरक्षा पर निर्भर होती है. "मुक्त, खुले और समावेशी" हिंद-प्रशांत के अपने दृष्टिकोण में भारत स्पष्ट रूप से योगक्षेम की दिशा में प्रतिबद्ध है. वो इस क्षेत्र और इससे इतर तमाम किरदारों की "प्रगति और समृद्धि की साझा क़वायद" की ओर प्रयास कर रहा है.[2] दुनिया में व्यापार और ऊर्जा का एक तिहाई हिस्सा इसी इलाक़े से प्रवाहित होता है. लिहाज़ा भारत का राष्ट्रीय विकास, समुद्र के ज़रिए संचार के सुरक्षित रास्तों से नाज़ुक रूप से जुड़ा हुआ है. आर्थिक विकास और व्यापार के साथ-साथ ऊर्जा सुरक्षा के नज़रिए से ये क्षेत्र बेहद अहम हैं. मात्रा के हिसाब से राष्ट्र के व्यापार का लगभग 95 फ़ीसदी और मूल्य के हिसाब से 68 प्रतिशत हिस्से का आवागमन समुद्रों और महासागरों के ज़रिए होता है.[3] एक आकलन के मुताबिक तेल के संदर्भ में भारत की सकल "समुद्री निर्भरता' 93 प्रतिशत है.[4] घरेलू क्षमताओं को आगे बढ़ाने के लिहाज़ से बाहरी तौर पर सुरक्षित वातावरण सबसे अनुकूल है. इस संदर्भ में सुरक्षा और समृद्धि का स्तर ऊंचा उठाने में क्वॉड्रिलैट्रल सिक्योरिटी डायलॉग या क्वॉड एक उत्पादक तंत्र की भूमिका अदा करता है.
स्वाभाविक रूप से कौटिल्य के महादेशीय राजमंडल में मित्र-शत्रु के दृढ़ रुझानों का त्याग किया गया है. कनेक्टिविटी और साझा समृद्धि के युग में पहले से ज़्यादा सहयोगकारी ढांचे को अहमियत देने की क़वायद, भारत की विदेश नीति में घरेलू वाहकों की प्रमुखता को रेखांकित करती है.
स्वाभाविक रूप से कौटिल्य के महादेशीय मिसाल के तौर पर यूक्रेन संघर्ष के दौरान रूस से भारत के तेल आयात को सरकार ने "भारतीय जनता के हित में बेहतरीन सौदा पाने वाली जगह तक जाने की चतुराई भरी नीति" के तौर पर देखा है.[5]
यथार्थवादी राजनीति और नैतिकतावादी राजनीति
यक़ीनन भारत का 'अंतरराष्ट्रवादी राष्ट्रवादी' रुख़, राज्यसत्ता के अस्तित्व के 'यथार्थवादी' जड़ों वाली प्राचीन व्यवस्था का प्रमाण है. इसके साथ लोकसंग्रह (सामाजिक धन) के भ्रामक सार्वभौम आदर्शों पर 'राजनीति से इतर यथार्थवादी' लक्ष्यों की भी मिसाल दी जा सकती है.[6] एक के नफ़े से दूसरे का नुक़सान होने वाले मौजूदा संसार में अस्तित्व और सत्ता, मानवता के संरक्षण के स्वाभाविक रुख़ से संतुलित होती है, जिसे परिवर्तनशील योग वाले स्वरूप के ज़रिए देखा जाता है.
मुमकिन है कि सांसारिक नज़रिया, प्राचीन भारत में देशकाल के हिसाब से धर्म की परंपरा की प्रचलित सैद्धांतिक समझ से तय होती है. ये विचार 'सह-अस्तित्व' की परिकल्पना से जुड़ा हुआ है.[7] ये 'स्वयं' और 'अन्य' के बीच की सरहदों को फीका करते हुए जीवन के अनेक पक्षों और विविधता को पुख़्ता करता है. इसके अलावा पौराणिक भू-विवरण में जम्बूद्वीप (चार दलों वाले कमल के तौर पर वर्णित) के एक वर्ष की तरह भारतवर्ष के चित्रण से सामंजस्यपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सह-अस्तित्व से जुड़ा भारतीय क़िस्सा बयां होता है. ये प्राचीन चीन की 'मध्यम राजशाही जटिलता' से काफ़ी अलग है. इस संदर्भ में G20 की अध्यक्षता भारत को वसुधैव कुटुंबकम (एक धरती, एक परिवार, एक भविष्य) की विषयवस्तु को हासिल करने के लिहाज़ से अनोखा मुकाम देती है.
यथार्थवादी एक ओर दूसरे विश्वयुद्ध के बाद के संदर्भ में[8] निर्गुटता की परिकल्पना ने वसुधैव कुटुंबकम (पूरी दुनिया के लोग एक हैं) के विश्वास को ठोस रूप दिया, वहीं दूसरी ओर क्षमता निर्माण और राष्ट्रीय सुरक्षा के यथार्थवादी विचारों को भी आगे बढ़ाया. जवाहर लाल नेहरु के शब्दों में, "विदेश नीति के निर्माण में हर राष्ट्र अपने हितों को सबसे पहला स्थान देता है. ख़ुशक़िस्मती से भारत के हित सभी प्रगतिवादी राष्ट्रों के साथ सहयोगपूर्ण और शांतिपूर्ण विदेश नीति से मेल खाते हैं."[9]
संशोधनवादी लेख के तौर पर कौटिल्य ने भारतीय उपमहाद्वीप के राजनीतिक एकीकरण की वक़ालत की थी, जो प्राकृतिक बाधाओं द्वारा संरक्षित पवित्र भू-सांस्कृतिक क्षेत्र था. बहरहाल, चक्रवर्तिंकक्षेत्र (संप्रभु क्षेत्र) से परे उनका कोई साम्राज्यवादी इरादा नहीं था- जो यथार्थवादी राजनीति और नैतिकतावादी राजनीति का बढ़िया चित्रण है.
'शक्ति' की परिकल्पना
सत्ता को लेकर कौटिल्य की परिकल्पना भी आंतरिक को बाहरी से जोड़ती है और तार्किकता को नियामकता के साथ आगे बढ़ाती है. उनके विचार से सत्ता सापेक्ष है और साध्य ना होकर केवल एक साधन है. कौटिल्य की शासन कला के सप्तांग सिद्धांत में संघटक तत्वों की सूची दी गई है, जो एक साथ मिलकर किसी राज्यसत्ता की राष्ट्रीय शक्ति का निर्माण करते हैं. घटकों और उनकी व्यवस्था से चार महत्वपूर्ण नतीजे निकाले जा सकते हैं. पहला, भौतिक (आर्थिक और सैन्य शक्ति) और अभौतिक कारकों (नेतृत्व का राजनीतिक प्रदर्शन, मंत्रियों की निष्ठा और दक्षता, नागरिकों की उत्पादकता, सशस्त्र बलों का हौसला) का अनोखा सम्मिलन, किसी राज्यसत्ता की क्षमता और इच्छाशक्ति के बारे में सूक्ष्म दृष्टि उपलब्ध कराते हैं.
दूसरा, शीर्ष जोड़ी के रूप में स्वामी (शासक) और अमात्य (मंत्रिपरिषद) के साथ कौटिल्य सबसे ऊंचे स्तर पर राजनीतिक नेतृत्व और नीति-निर्माण को अहमियत देते हैं; मंत्रशक्ति (सलाह की शक्ति) का दर्जा प्रभावशक्ति (ख़ज़ाने और सेना की ताक़त) और उत्साहशक्ति (शौर्य शक्ति) से ऊपर होता है. तीसरा, मित्र (बाहरी सहयोगी) का समावेश निश्चित रूप से अनूठा है. पद सूची में उसका स्थान ये संकेत करता है कि बाहरी मदद अहम हो सकती है. हालांकि इसका प्रयोग तभी किया जाना चाहिए जब पहली छह क़वायदों के ज़रिए आंतरिक संतुलन साधने की कोशिशें, उम्मीद के मुताबिक नतीजा दे पाने में विफल हो जाएं.
चौथा, राज्यसत्ता के कारकों के बीच दूरगामी प्रभाव होते हैं. शीर्ष पर स्वामी सर्वोच्च है और वही अमात्य का चुनाव करता है जो जनपद में कार्यों को अंजाम देते हैं. इन उद्यमों की कामयाबी भौतिक समृद्धि लाती है, जो राज्यसत्ता की राजनीतिक वैधानिकता को मज़बूत करती है. साथ ही उसके रक्षा-कवच को बढ़ावा देती है और उसके कोष और भंडार में योगदान देती है. इन तमाम सफलताओं से सेना को बेहतर रूप से प्रशिक्षित करने और उसकी बचावकारी शक्ति को उन्नत करने में मदद मिलती है. इससे अंतरराज्यीय व्यवहार में राज्यसत्ता की सौदेबाज़ी की ताक़त को बढ़ाना सरल हो जाता है. वैश्विक स्तर पर एकाधिकारवादी शासन के विस्तार के संदर्भ में ये क़वायद ख़ासतौर से अहम हो जाती है.
बहरहाल, राजमंडल में किसी राज्यसत्ता की शक्ति गतिशील और दूसरी राज्यसत्ताओं के सापेक्ष होती है. राज्यसत्ता के संदर्भ में स्वभाव (भाविन) के संयोजन से सामने आने वाली सापेक्षिक शक्ति विदेश नीति से जुड़ी कार्रवाई का पहले से चुनाव करने (भले ही पूर्व निर्धारण ना हो सके) में मदद करती है. ये प्रक्रिया राजमंडल से संबंधित भौगोलिक नियतिवाद का प्रभाव कम कर देती है. सद्गुण (विदेश नीति के छह उपाय) में समायोजन या शांति समझौते की नीतियां (संधि), शरण की चाह (संश्रय) और आम तौर पर कमज़ोरों के लिए निर्देशित दोहरी नीति (द्वैधिभाव); शत्रुता (विग्रह) और शक्तिशाली के लिए प्रस्थान (यण); बराबर वालों के लिए तटस्थता (असन) शामिल हैं.
अर्थशास्त्र अंतराज्यीय परिदृश्य की बहुस्तरीय समझ प्रस्तुत करता है. लागत और लाभ से जुड़े अविराम विश्लेषण के आधार पर बाहरी ख़तरे के निपटारे के सबसे उपयुक्त साधन सूक्ष्म होने के बावजूद लोचदार हैं. लिहाज़ा सही अनुमानों तक पहुंचने की अहमियत, ज्ञान को शासन कला का बुनियादी आधार बना देती है.
सचमुच, प्रकृति और राजकीय आपदाओं (व्यसन) पर आधारित नियम के अनेक अपवाद हैं. अल्पकाल और दीर्घकाल में इसके प्रभाव, शासक का औचित्य और हितों की पारस्परिकता भी इसी कड़ी में शामिल हैं. पारस्परिक शांति की सामान्यीकृत इच्छा के साथ एक-समान शक्ति वाली दो इकाइयां सामंजस्य अपना सकती हैं- जैसा कि भारत और चीन के बीच सरहदी इलाकों में शांति और स्थिरता के लिए 1993 में हुए समझौते में देखा गया था. हालांकि संधि में राज्यसत्ता का प्रतिस्पर्धी ढांचा भी जुड़ा होता है, जो क्षमताओं को आगे बढ़ाने और नीतियों में बदलाव लाने वाले संक्रमण से भरे दौर के रूप में काम करता है. लामबंदी के लंबे कालखंड के बाद चीन ने भारत के मुक़ाबले अपनी सामरिक बढ़त का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. इस तरह उसने संधि से समध्ययन (समझौते से जुड़ने के बाद दूर छिटकना) की ओर रुख़ कर लिया. 2020 की गर्मियों में लद्दाख में उसकी घुसपैठ इसी नीति का उदाहरण है.[10]
अर्थशास्त्र भौगोलिक, भौतिक, स्वभाव से जुड़े और परिस्थितिजन्य विचार, सामरिक आकलनों को धार देते हैं. इन्हीं विचारों के आधार पर मित्रों और शत्रुओं का वर्गीकरण नीतिगत उपायों को प्रभावी बना देता है.[11] ये 'जन्मजात' शत्रु (सामने खड़ा, बेमिसाल गुणों से रहित और लगातार नुक़सान पहुंचाने वाला) और 'आकस्मिक' शत्रु (जो दुश्मन है और कम से कम मौजूदा वक़्त में दुश्मनी भरा बर्ताव करता है) के बीच फ़र्क़ करता है. मिसाल के तौर पर भारत संभावित रूप से चीन और पाकिस्तान को किस ख़ास नज़रिए से देखता है, इसको समझने में ये वर्गीकरण बेहद उपयोगी है.[12] उपाय समूह राजनीति के चार तौर-तरीक़ों पर टिका होता है- मेल-मिलाप, उपहार देना, मतभेद और बल का प्रयोग. ये एकाकी, वैकल्पिक या संयुक्त रूप से इस्तेमाल किए जाने वाले विकल्पों का तरकश उपलब्ध कराता है.[13]
सबसे अहम बात ये है कि कौटिल्य ने सत्ता को शक्ति का भंडार समझा, जिसे सफलता हासिल करने के साधन (साध्य की बजाए) के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. इस कामयाबी को "प्रजा की ख़ुशहाली" के तौर पर परिभाषित किया जाता है.
सामरिक स्वायत्तता
न्याय की स्वतंत्रता और आत्म-निर्भरता के सहगामी विचार की जड़ें कौटिल्य की शासन कला तक जाती हैं. यक़ीनन, आज़ादी के बाद भारत की विदेश नीति के ढांचे का सबसे टिकाऊ कारक इसी से जुड़ा है. यही तत्व पश्चिम के लिए सबसे पेचीदा है. जवाहरलाल नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक, भारत के तमाम प्रधानमंत्री आत्म-निर्भर भारत में साझा आधार देखते रहे हैं.[14]
स्पष्ट रूप से कौटिल्य की शासनकला (अपने सप्तगंगा सिद्धांत के ज़रिए) सहयोगी (मित्र) की पहचान आख़िरी और इकलौते बाहरी कारक के तौर पर करती है. भले ही पहले छह घरेलू कारकों के ज़रिए आंतरिक संतुलन साधने की क़वायद को वरीयता दी गई, पर राज्यसत्ताएं अपनी ख़ुद की ताक़त बढ़ाने के लिए बाह्य सहायता को सामरिक साझेदारी (समावय) के स्वरूप में प्रयोग में ला सकती हैं. इसी तरह एक से लड़ने के लिए दूसरे के साथ गठजोड़ करने की दोहरी नीति (द्वैधिभव) को भी अमल में लाया जा सकता है. साथ ही ख़ुद से मज़बूत ताक़त से पेश ख़तरे के मद्देनज़र शरण (संश्रय) की भी तलाश की जा सकती है. चूंकि शरण का जुगाड़ करने की क़वायद में निर्णय ले पाने की स्वायत्तता ख़तरे में पड़ जाती है, लिहाज़ा अपने राजनीतिक हित सधने की वजह से आख़िरी दो कारकों में दोहरी नीति को वरीयता दी जाती है.
अहम बात ये है कि रचनाओं में सामरिक साझेदारियों पर मंथन इस युग में बेहद प्रासंगिक है, क्योंकि मौजूदा दौर में ऐसी साझेदारियों का विस्तार देखा गया है. "वैश्वीकरण के साथ सत्ता संतुलन के मिलन" के चलते सहयोग को लेकर पहले से ज़्यादा प्रोत्साहन दिखाई देने लगे हैं.[15] इन प्राचीन व्यवस्थाओं ने अलग-अलग सापेक्षिक शक्तियों वाली राज्यसत्ताओं के लिए संभावनाओं की एक व्यापक फ़ेहरिश्त खोल दी है. आज का अंतरराष्ट्रीय वातावरण गठजोड़ और प्रतिस्पर्धा, दोनों मोर्चों पर प्रोत्साहनों से पटा पड़ा है. हालांकि मज़बूत और कमज़ोर राज्यसत्ताओं के बीच क़रार के नतीजतन बड़ी ताक़त का कमज़ोर राज्यसत्ताओं पर निरंतर दबदबा देखने को मिलता है. बहरहाल कौटिल्य ने तात्कालिक लाभ और भविष्य के संभावित मुनाफ़ों- दोनों पर विचार करने की सलाह दी है. साझेदारियों से जुड़ने के स्पष्ट सिद्धांत हैं- शक्ति, विश्वसनीयता और हितों का सम्मिलन.
बढ़िया सहयोगी के गुणों में निरंतरता, क़ाबू में रहने की स्थिति, जल्द लामबंदी करना, आनुवंशिकी, शक्ति और विश्वसनीयता शामिल हैं. इनमें क़ाबू में रहने वाले (भले ही अस्थिर) साथी को वरीयता दी गई. निरंतरता के साथ छोटी-छोटी मदद देने को वरीयता दी गई. साथ ही जल्द से जल्द लामबंदी करने वाली छोटे साथी को लामबंदी में सुस्त बड़े साथी के मुक़ाबले ऊंचा दर्जा दिया गया. कौटिल्य एक मज़बूत राज्यसत्ता की बजाए दो समान राज्यसत्ताओं में साझेदारी बनाने की सलाह देते हैं. इसी तरह वो अपने बराबर ताक़त वाली राज्यसत्ता की बजाए दो कमज़ोर राज्यसत्ताओं से साझेदारी करने का सुझाव देते हैं. इससे नियंत्रण को जोख़िम में डाले बग़ैर ज़रूरी उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं. यक़ीनन, यही विचार विश्व मंच पर भारत के बहुपक्षीय रुख़ का सामरिक-सांस्कृतिक आधार है. ब्रिक्स (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ़्रीका), SCO (शंघाई सहयोग संगठन), और क्वॉड में भारत की हिस्सेदारी से यही बात उभरकर सामने आती है.
साझेदारियों के गठन और गठजोड़ से जुड़ने की सूक्ष्म समझ की गूंज महाभारत और रामायण के अध्ययन में भी सुनाई देती है रावण के ख़िलाफ़ अपने युद्ध में राम ने बलशाली बाली के साथ जुड़ने की बजाए सत्ता से बेदख़ल और कमज़ोर सुग्रीव से मित्रता का विकल्प चुना. इसी तरह कमज़ोर माने जाने वाले कर्ण (जिसकी अर्जुन से शत्रुता हो गई थी) को साथी के तौर पर चुनने की दुर्योधन की पसंद के पीछे भी वफ़ादारी का महत्व रहा है. इससे कमज़ोर और चोट खाए साथी की दृढ़ता का भी प्रमाण मिलता है. "प्रतिद्वंदी के प्रतिद्वंदी की मदद कर दुर्योधन प्रभावी रूप से अपने मित्र की मदद कर रहा था"- ये उदाहरण कौटिल्य के सिद्धांत- "मुसीबत मित्रता में दृढ़ता लाती है"- को दोहराता है.[16]
कई रूपों में अमेरिका के साथ भारत के रिश्ते व्यापक तौर पर इन्हीं झुकावों से प्रेरित रहे हैं. इस दिशा में मौजूदा सदी की शुरुआत से धीमी गति से लेकर पूरी निरंतरता के साथ, आगे की राह तय होती रही है. 1990 के दशक में द्विपक्षीय रिश्तों की दशादिशा अनिश्चित थी, लेकिन अब दोनों ही देश अपने राष्ट्रीय हितों को साधने को लेकर लगातार केंद्रीय भूमिका निभाने लगे हैं. ये घटनाक्रम कई कारकों की अहमियत को रेखांकित करते हैं. इनमें हितों का सम्मिलन, बाहरी ख़तरे को लेकर परस्पर-व्यापक धारणाएं और सापेक्षिक शक्ति शामिल हैं. भारत के संदर्भ में देखें तो अपने से मज़बूत शक्ति के साथ साझेदारी क़ायम करने और उनके साथ गठजोड़ करने को लेकर गहरे संदेह और मज़बूत प्रतिरोध का वातावरण रहा है. लिहाज़ा विविधता लाने का रुख़, सामंजस्य और प्रतिरोध की मिश्रित रणनीति का प्रदर्शन करता है. हालांकि जोख़िमों की रोकथाम के लिए आंतरिक क्षमता निर्माण पर भी समानांतर रूप से ज़ोर दिया जा रहा है. अमेरिका भी धीरे-धीरे भारत के अपने "तौर-तरीक़ों"[17] के साथ सामंजस्य बिठा रहा है. इन उपायों में नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का झंडा बुलंद रखना शामिल है. अमेरिकी नज़रिए में "भागीदारी और गठजोड़ में अपने क़िस्म का और ख़ास तरह का समान मतलब" होता है, हालांकि भारत की समझ इस मामले में सूक्ष्म है. 'भागीदारी' का भारतीय विचार "गठजोड़ से जुड़े बग़ैर गठजोड़' क़ायम करने का है.[18]अमेरिका भी अब भारत के इन विचारों को समझने लगा है.
[pullquote]भारतीय सभ्यता की पहचान उसे अनोखे मुकाम पर ला देती है. सहयोग को बढ़ावा देने, सीमित प्रतिस्पर्धा, समावेश पर ज़ोर देने, गुट बनाने के रुख़ों से परहेज़ करने और लोकतांत्रिक और नियम-आधारित व्यवस्था की अगुवाई करने के लिहाज़ से भारत बेहतर स्थिति में है. [/pullquote]
निष्कर्ष
दुनिया आज तमाम तरह की व्यवस्थाओं के साथ-साथ बढ़ती प्रतिस्पर्धा और अविश्वास के बीच घिरी है. विश्व पटल पर आश्वासनों में सिकुड़न आती जा रही है. बहुपक्षीयवाद में दरार के बीच अतीत में कम सक्रिय रहे किरदार अपनी हिस्सेदारियों के स्तर को ऊंचा उठा रहे हैं. ऐसे में मौजूदा हालात से पूरी सूक्ष्मता और दृष्टिकोण से निपटे जाने की दरकार है. आज के समय में सभी प्रमुख किरदार अपनी राह बदल रहे हैं. इस सिलसिले में वो विदेश नीति से जुड़े अपने दीर्घकालिक बुनियादी सिद्धांतों को झुठला रहे हैं. ऐसे में भारत अपने अपरिवर्तित राष्ट्रीय चरित्र के साथ सुरक्षित रूप से जुड़ा हुआ है, जिसे व्यापक तौर पर उसकी ऐतिहासिक विरासत से आकार मिला है. तीन कारकों के मिश्रण से ये क़वायद पूरी हुई है- धारणा, सिद्धांत और यथार्थवाद. इनका मतलब हैं क्रमश: निर्णय की स्वतंत्रता और आत्म-निर्भरता की तलाश, सम्मान की पारस्परिकता और अपना मॉडल किसी और पर नहीं थोपने का इरादा.[19]
भारतीय सभ्यता की पहचान उसे अनोखे मुकाम पर ला देती है ये सिर्फ़ इसलिए नहीं है कि भारत एक ज़िम्मेदार अंतरराष्ट्रीय भूमिका की तलाश में है. दरअसल वो समानांतर रूप से अपने प्रधान राष्ट्रीय हितों और बहुकेंद्रीय दृष्टिकोण के साथ जुड़ा हुआ है.
Endnotes
[1] P. V. Narasimha Rao, Selected Speeches, Volume III, 1993–1994, 399.
[2] Narendra Modi, “Keynote Address” (speech, Singapore, June 1, 2018) Shangri-La Dialogue.
[3] Ministry of Ports, Shipping and Waterways, Annual Report 2020-21, Government of India, 6.
[4] Indian Navy, Indian Maritime Security Strategy, January 2016.
[5] Outlook Web Desk, “Russia is India’s Top Oil Supplier for Second Month in a Row, EAM Jaishankar Says ‘Sensible Policy to Buy Oil at Best Deal’,” Outlook India, December 15, 2022.
[6] Deepshikha Shahi, Kautilya and Non-Western IR Theory (Palgrave Macmillan, 2019).
[7] Navnita Chadha Behera, “Globalization, Deglobalization and Knowledge Production,” International Affairs 97, no. 5 (2021).
[8] Narasimha Rao, “A Moral Authority,” in A Role of Persuasion: Thoughts on a Nation, a People and the World to Which They Belong (New Delhi: Ministry of Human Resource Development, Department of Education, 1986), 47.
[9] Shyam Saran, How India Sees the World: Kautilya to the 21st Century (New Delhi: Juggernaut, 2017).
[10] For India–China relations post Ladakh, read Kajari Kamal and Lt. Gen. Prakash Menon, “Why China is the Kautilya of International Politics,” The Print, March 9, 2021.
[11] Enemies are categorised as: a) neighbour with excellences of a foe is an enemy, b) one in calamity is vulnerable, and c) one without support is fit to be exterminated. Similarly, a) one with territory separated by another is a natural ally, b) one related through mother/father is ally by birth, and c) one who has sought shelter for wealth or life is an ally made.
[12] For a detailed deliberation on this, see Kajari Kamal and Gokul Sahni, “The Relevance of Ancient Indian Strategy in Contemporary Geopolitics,” ORF Issue Brief No. 470, July 2021, Observer Research Foundation.
[13] For a full exposition of use of upayas as a tool set in hybrid scenarios, see Brigadier Nick Sawyer, “Can a Toolset Based on Kautilya’s Arthashastra Offer an Alternative Methodology to Western Systems for Strategy in Complex Hybrid Scenarios” (Thesis, National Defence College, New Delhi, 2021).
[14] Kajari Kamal, “A Self-reliant India is Where Modi and Nehru Find Common Ground,” Moneycontrol, May 20, 2020.
[15] T. V. Paul, “When Balance of Power Meets Globalization: China, India and the Small States of South Asia,” Politics, June 6, 2018.
[16] Aruna and Amrita Narlikar, Bargaining with a Rising India: Lessons from the Mahabharata (Oxford: Oxford University Press, 2014).
[17] Derek Grossman, “India’s Maddening Russia Policy Isn’t as Bad as Washington Thinks,” Foreign Policy, December 9, 2022.
[18] Alyssa Ayres, Our Time Has Come; How India Is Making Its Place in the World (New York: Oxford University Press, 2018).
[19] Rao, “A Moral Authority,” 48.
The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.