वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के द्वारा हाल में घोषित 20 लाख करोड़ के आत्मनिर्भर भारत विशेष आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज (ANBSESP) के चौथे भाग में अंतरिक्ष सेक्टर में प्राइवेट एंटरप्राइज़ की ज़्यादा भागीदारी का फ़ैसला बेहद उम्मीदों भरा है लेकिन इसकी छानबीन होनी चाहिए. इस फ़ैसले का असर स्टार्ट-अप सेक्टर और भारतीय सेना दोनों पर पड़ेगा क्योंकि वित्त मंत्री ने ख़ासतौर पर इस बात का ज़िक्र किया कि भारतीय अंतरिक्ष सेक्टर में स्टार्ट-अप सेगमेंट भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की सुविधाओं और बुनियादी ढांचों का इस्तेमाल कर सकेगा. दूसरी बात, मोदी सरकार का ये ताज़ातरीन बदलाव भारतीय सशस्त्र सेनाओं के लिए भी अहमियत रखता है. पिछले कुछ सालों में भारत के अंतरिक्ष स्टार्ट-अप के विकास ने सैटेलाइट और स्पेस लॉन्च व्हीकल (SLV) में कारोबारी गतिविधियों और आविष्कार को बढ़ावा दिया है. सरकारी संस्थान भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) लॉन्च व्हीकल, सैटेलाइट और स्पेसक्राफ्ट लॉन्च करने में सबसे आगे रहा है. ISRO ने बड़ी मात्रा में अंतरिक्ष सुविधाओं का निर्माण किया है और उनकी देखरेख कर रहा है. इतना ही नहीं वो और बुनियादी ढांचों का निर्माण कर रहा है.
पिछले कुछ सालों में भारत के अंतरिक्ष स्टार्ट-अप के विकास ने सैटेलाइट और स्पेस लॉन्च व्हीकल (SLV) में कारोबारी गतिविधियों और आविष्कार को बढ़ावा दिया है. सरकारी संस्थान भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) लॉन्च व्हीकल, सैटेलाइट और स्पेसक्राफ्ट लॉन्च करने में सबसे आगे रहा है
ऐतिहासिक और परंपरागत तौर पर जो भूमिका ISRO को दी गई थी, उसे लेकर सरकारी नीतियों में बदलाव करके प्राइवेट सेक्टर को बढ़ावा देने को लेकर वित्त मंत्री की ताज़ा घोषणा एक स्तर पर ज़रूरी थी और ये फ़ैसला पूरी तरह से मौजूदा महामारी की वजह से ही नहीं हुआ है. मोदी सरकार अंतरिक्ष गतिविधि बिल पास करने को लेकर कम-से-कम 2017 से ही व्यापक विचार-विमर्श कर रही है लेकिन ये बिल अभी तक क़ानून नहीं बन पाया है. इसकी बड़ी वजह अंतरिक्ष विज्ञान और तकनीक, जो एक रणनीतिक सेक्टर है, को लेकर जटिलताएं हैं. इसे देखते हुए ये क़ानून साफ़ और इस तरह से लागू करने योग्य हो जो निजी पहल, निवेश, प्रबंधन और तकनीकी इनपुट को बढ़ावा दे.
इससे भी बढ़कर ISRO ने 90 के दशक की शुरुआत से तकनीक के ट्रांसफर की एक ऐसी पहल की है जिसके तहत अलग-अलग प्राइवेट और सरकारी कंपनियों को तकनीक का ट्रांसफर किया जाता है जो भारतीय उद्योग के लिए फ़ायदेमंद है. इस पहल के तहत लाइसेंस समझौते के ज़रिए विभिन्न SME को जानकारी मुहैया कराई गई है और इसका मक़सद मुनाफ़ा कमाना है. पिछले कुछ सालों के दौरान ISRO की तरफ़ से विकसित जो तकनीक दूसरों को दी गई है उनमें पॉलीमर, कम्प्युटराइज्ड सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सिस्टम और सैटेलाइट सिस्टम के लिए भूतल आधारित तकनीक शामिल हैं. हाल के दिनों के तकनीक ट्रांसफर के तहत अंतरिक्ष एजेंसी ने कुछ गिनी-चुनी सरकारी और प्राइवेट कंपनियों को लिथियम आयन सेल दी है. हालांकि, फ़ायदा उठाने वाली कंपनियों की लिस्ट में स्टार्ट-अप शामिल नहीं हैं. इससे अलग भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए सप्लाई चेन और ठेके के काम में बड़े औद्योगिक समूह जैसे गोदरेज स्पेस, लार्सन एंड टूब्रो (L&T), टाटा, वालचंदनगर इंडस्ट्रीज़ और दूसरी कंपनियां अभिन्न हिस्सा रही हैं.
अंतरिक्ष तकनीक में अनुसंधान और विकास (R&D) के सहयोगी के तौर पर प्राइवेट सेक्टर में अंतरिक्ष स्टार्ट-अप के उभरने का असर सशस्त्र सेनाओं पर क्या हो सकता है ? जिन बड़े औद्योगिक समूहों के बारे में ऊपर बताया गया है और जो आम तौर पर भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की सप्लाई चेन का हिस्सा रहे हैं, उनसे आगे देखें तो भारत में अंतरिक्ष स्टार्ट-अप पिछले कुछ सालों के दौरान ही उभरे हैं और उन्होंने विभिन्न शहरी केंद्रों जैसे हैदराबाद, बेंगलुरु और चेन्नई में अपनी मौजूदगी का एहसास कराया है. वो अंतरिक्ष तकनीक के विकास में अलग रास्ता अपना रहे हैं. अंतरिक्ष स्टार्ट-अप पहले से ही भारत के प्रथम मानवीय अंतरिक्ष मिशन गगनयान-1 में योगदान की प्रक्रिया में शामिल हैं. कुछ बातें हैं जो अंतरिक्ष स्टार्ट-अप को बड़े सप्लाई चेन उद्योगों से अलग करती हैं. अंतरिक्ष स्टार्ट-अप बड़े उद्योगों के मुक़ाबले ज़्यादा महत्वाकांक्षी हैं. बड़े उद्योग ISRO की तरफ़ से ज़्यादातर ठेकेदारी का काम ही करते हैं. तकनीकी तौर पर काबिल नौजवानों से भरा और सबसे अलग हटकर पहल करने वाला स्टार्ट-अप सेगमेंट अंतरिक्ष सेक्टर में सबसे आगे हो सकता है. कई स्टार्ट-अप के पास कुछ वर्किंग कैपिटल है. 2016 से 2019 के बीच का आंकड़ा बताता है कि वेंचर कैपिटल की मदद से अंतरिक्ष स्टार्ट-अप हथेली के आकार के सैटेलाइट से लेकर छोटे सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (SSLV) को विकसित करने में शामिल हैं. ISRO पहले से ही स्टार्ट-अप के साथ मिलकर महत्वपूर्ण तकनीकों के व्यवसायीकरण में जुटा हुआ है और आत्मनिर्भर भारत विशेष आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज से इस प्रक्रिया को तेज़ करने में मदद मिलेगी. हालांकि, निश्चित तौर पर सभी भारतीय स्टार्ट-अप कामयाब नहीं होंगे और इस बात की ज़्यादा आशंका है कि कुछ स्टार्ट-अप डूब जाएंगे.
अंतरिक्ष में युद्ध की क्षमता की पहचान के लिए मोदी सरकार के द्वारा स्थापित रक्षा अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (DSRO) को स्टार्ट-अप सेक्टर से संपर्क स्थापित करने के लिए नोडल एजेंसी बनाना चाहिए
सशस्त्र सेवाएं आत्मनिर्भर भारत विशेष आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज से उत्पन्न संभावनाओं का फ़ायदा उठाने से पीछे नहीं हट सकती हैं. प्रोत्साहन पैकेज अंतरिक्ष सेक्टर को ज़्यादा आत्मनिर्भर बनाने के लिए तैयार है और महामारी ने इसकी रफ़्तार बढ़ाई है. तीनों सेनाओं को इस बदलाव का फ़ायदा उठाना चाहिए और सरकार को निश्चित तौर पर इस बात की इजाज़त देनी चाहिए कि सेना ख़ुद ये देख सके कि स्टार्ट-अप सेगमेंट के कुछ आविष्कारों से उसकी खुफिया, निगरानी और टोह (ISR) की ज़रूरतें पूरी हो सकें. अंतरिक्ष स्टार्ट-अप के द्वारा छोटी सैटेलाइट तकनीक एक प्रमुख क्षेत्र है जिसका फ़ायदा सरकार के इस फ़ैसले से सशस्त्र सेनाओं को ज़रूर उठाना चाहिए. अंतरिक्ष में युद्ध की क्षमता की पहचान के लिए मोदी सरकार के द्वारा स्थापित रक्षा अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (DSRO) को स्टार्ट-अप सेक्टर से संपर्क स्थापित करने के लिए नोडल एजेंसी बनाना चाहिए. तीनों सेनाओं और अंतरिक्ष स्टार्ट-अप के बीच लचकदार और सहजीवी संबंध स्थापित करने के लिए ये असली मौक़ा है. साथ ही भारत की रक्षा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ज़रूरी माहौल बनाने के मक़सद से भी ये आवश्यक है. स्टार्ट-अप को कामयाब होने के लिए मज़बूत ग्राहकों की ज़रूरत होती है और भारतीय सशस्त्र सेनाएं ये ज़रूरत पूरी कर सकती हैं. सेनाओं की अंतरिक्ष से जुड़ी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पूरी तरह से ISRO पर निर्भर रहने की सलाह देना ठीक नहीं है. अंतरिक्ष स्टार्ट-अप बेहद गतिशील हो सकती है और भारतीय सेना की आंशिक ज़रूरतों को पूरा कर सकती हैं. वास्तव में आत्मनिर्भर भारत विशेष आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज का लक्ष्य अंतरिक्ष सेक्टर में सरकार के एकाधिकार को सीमित करना है और सशस्त्र सेनाओं को DSRO के ज़रिए इसे एक अवसर के तौर पर देखना चाहिए.
हालांकि, आत्मनिर्भर भारत विशेष आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज के ज़रिए अंतरिक्ष सेक्टर को सरकार के नियंत्रण से मुक्त करना सकारात्मक क़दम है और इससे स्टार्ट-अप सेगमेंट को फ़ायदा होगा लेकिन इसको लेकर और स्पष्टता की ज़रूरत है. ख़ासतौर पर व्यापक अंतरिक्ष गतिविधि क़ानून के रूप में जिसमें लाइसेंसिंग और स्टार्ट-अप तथा भारतीय सशस्त्र बलों जैसे ग्राहकों को शामिल करके बने बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) के प्रावधान शामिल हों.
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