Published on Oct 07, 2020 Updated 0 Hours ago

आईएसआईएस के भीतर महिलाओं की बदलती भूमिका को वैश्विक स्तर पर समझने और आतंकवाद विरोधी प्रयासों में इनके विश्लेषण को हाल फिलहाल ही स्वीकार किया गया है. इससे पहले रणनीतिक रूप से इसे कोई तवज्जो नहीं दी गई.

आईएसआईएस की नई रणनीति: प्रोपेगेंडा के तहत संगठन में हो रही है महिलाओं की भर्ती

इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक़ एंड अल-शाम अपने संगठन में सदस्यों की भर्ती करने और उन्हें प्रेरित करने के लिए प्रचार या प्रोपेगेंडा का इस्तेमाल करता है. इस संगठन के सबसे व्यापक और प्रभावी अंग्रेज़ी प्रकाशनों में से एक है डिजिटल पत्रिका दाबिक, जिसे इस्लामिक स्टेट द्वारा सीरियाई शहर दाबिक पर नियंत्रण खो जाने के बाद रूमियाह का नाम दिया गया था. ये पत्रिकाएं आईएसआईएस की मज़बूत महत्वाकांक्षाओं और मुसलमानों को नियंत्रित करने के उन तरीकों को प्रदर्शित करती हैं, जिनके ज़रिए वह दुनिया भर के मुसलमानों तक अपना संदेश पहुंचाना चाहते हैं, और उन्हें अपने संगठन में भर्ती करना चाहते हैं. हालांकि, ये प्रकाशन बड़े पैमाने पर उन पुरुषों को अपना लक्ष्य मानते हैं जो आईएसआईएस के समर्थन में हथियार उठा सकते हैं, लेकिन ये पत्रिकाएं दुनिया के विभिन्न देशों में ‘महिलाओं और बहनों’ को भी संबोधित करती हैं, ताकि वो इस्लामिक स्टेट में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित हों.

आईएसआईएस में महिलाओं की महत्वपूर्ण उपस्थिति इसे एक ऐसी इकाई के रूप में मान्यता दिलवाने का काम करती है, जो केवल “हिंसक पुरुषों द्वारा चलाए जाने वाला दुष्कर अभियान नहीं बल्कि एक उद्देश्यपूर्ण सामाजिक क्रांति” है. वास्तव में देखें तो आईएसआईएस की स्थापना के बाद से इस संगठन को स्वेच्छा से चुनने वालों में 15 प्रतिशत हिस्सा प्रवासी महिलाओं का ही है. इसलिए इस बात को विशेष तौर पर समझने की ज़रूरत है कि आईएसआईएस की संचालन नीति क्या है, और पुरुषों के मुक़ाबले औरतों को अपने संगठन में भर्ती करने के लिए वो किस रणनीति का इस्तेमाल करता है. यह लेख एक प्रयास है इन पत्रिकाओं द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले इन तरीकों की पहचान और पड़ताल करने का ताकि यह समझा जा सके कि महिलाएं आईएसआईएस से जुड़ने के लिए क्यों प्रेरित होती हैं, और इस संगठन में शामिल होने की उनकी वजहें, क्या पुरुषों से अलग हैं?

भर्ती की तकनीकों में अंतर

आईएसआईएस की प्रचार पत्रिकाएं दुनिया भर में विभिन्न भाषाओं में प्रसारित की जाती हैं. इन पत्रिकाओं को देखते ही यह स्पष्ट हो जाता है कि वो चरमपंथी विचारधारा को बढ़ावा देती हैं- यानी विभत्स और हिंसक तस्वीरों का इस्तेमाल जो पढ़ने वाले को हैरान कर दे और उसकी संवेदनशीलता को धीरे-धीरे खत्म कर दे. हालाँकि, जिन तरीकों से दाबिक और रुमियाह जैसी पत्रिकाएं पुरुषों और महिलाओं को निशाना बनाती हैं, उनमें काफी अंतर है. पुरुषों को संदेश देते हुए या उनके समक्ष प्रचार करते हुए हिंसा और सैन्य कार्यवाही में जीत की पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, वहीं महिलाओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वो संगठन में ऐसी भूमिका निभाएं, जिनके लिए अत्यधिक रुप से सक्रिय होना ज़रूरी नहीं. आईएसआईएस में शामिल होने वाले पुरुषों को अल्लाह के संदेश का पालन करने और इस्लामिक स्टेट के अस्तित्व के लिए लड़ने के लिए प्रेरित किया जाता है. इस संदेश को लड़ाकों के साक्षात्कार, उनकी जीवनगाथा, आईएसआईएस के सैनिकों के भाषणों और दुश्मन द्वारा कही गई बातों के विश्लेषण के ज़रिए दोहराया जाता है, जैसे कि दाबिक के अंक-5 में इस्तेमाल किया गया अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा का बयान.

दोनों पत्रिकाओं में एक अलग खंड है जो महिलाओं की ओर लक्षित है, और उसका उद्देश्य है महिलाओं से मुखातिब होना. इसमें  कथित तौर पर अन्य महिलाओं द्वारा लिखे गए लेख शामिल होते हैं, जो दूसरी महिलाओं को इस्लामिक स्टेट में शामिल होने के लिए उकसाने का प्रयास करते हैं. इन लेखों का एक महत्वपूर्ण केंद्र बिंदु महिलाओं का वो “कर्तव्य” है, जिसके तहत उन्हें अगली पीढ़ी के सेनानियों को जन्म देना है. ऐसे बच्चों को जन्म देना (ख़ासतौर पर बेटों को), जो अंततः आईएसआईएस के लिए लड़ सकें, महिलाओं का मूलभूत कर्तव्य है और इसे इस्लाम के प्रति उनके अटूट दायित्व के रूप में देखा जाता है. महिलाओं की ज़िम्मेदारी न केवल बच्चों को जन्म देना है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि वो अपने लक्ष्य के प्रति ईमानदार और “स्थिर” रहें. इन बच्चों की परवरिश ऐसी हो जो उन्हें अच्छा मुजाहिदीन बनाए (रुमियाह, अंक-2). रुमियाह पत्रिका के अंक-1 में इस विचार को विस्तार से समझाया गया है: “जो कोई भी अल्लाह के निमित्त एक सेनानी को तैयार करता है, उसने एक तरह से खुद लड़ाई लड़ी है, और जो कोई भी अल्लाह के निमित्त काम करने वालों और उसके लिए लड़ने वालों के परिवार का ख्याल रखता है, वह भी खुद अल्लाह के लिए लड़ा है.” फिनलैंड की एक ऐसी महिला द्वारा लिखा गया यह लेख, जो अपना देश छोड़कर ‘ख़िलाफ़त’ यानी इस्लामी राज्य में आकर बसी, इस बात पर ज़ोर देता है कि यह बच्चों को पालने और उन्हें बड़ा करने की सही जगह है. “यहाँ आप एक शुद्ध जीवन जी रहे हैं, और आपके बच्चों को उनके आस-पास मौजूद अच्छे माहौल से बहुत कुछ सीखने को मिलेगा.” बहुत संभावना है कि इस तरह के प्रशंसापत्र उन महिलाओं को आकर्षित करें, जो एक पवित्र माहौल में अपने बच्चों की परवरिश करना चाहती हैं, और इसे अपना दायित्व समझती हैं. इस तरह के संदेश उनसे एक अलग शैली और मुद्दे पर बात करते हैं, यानी इस्लामिक स्टेट जो आमतौर पर बच्चों के लिए असुरक्षित या ख़तरनाक लग सकता है, इन लेखों के ज़रिए उनके लिए ‘आदर्श’ बन जाता है.

इसके अलावा जिस परिवेश या जिन देशों में ये महिलाएँ रहती हैं वहां वो अक्सर खुद को हाशिए पर महसूस करती हैं. उनके पास खुद को साबित करने के अवसर नहीं होते, इसलिए इस दुष्प्रचार से प्रभावित होने की उनकी संभावना अधिक होती है. इस बात का फायदा उठाते हुए आईएसआईएस अक्सर महिला सशक्तीकरण की ओट में अपना प्रचार करता है, और यह बात अक्सर मुख्यधारा में नज़रअंदाज़ कर दी जाती है, क्योंकि आईएसआईएस को समझने के लिए हमेशा वैचारिक कट्टरपंथ पर ही ध्यान केंद्रित किया गया है. आईएसआईएस में शामिल होने वाली महिलाएं अक्सर “अपने अस्तित्व, जीवन के उद्देश्य, साहसिक बनने और सशक्तिकरण” संबंधी अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए संगठन में शामिल होती हैं. एक संगठन के रूप में आईएसआईएस के महिला विरोधी होने के बावजूद वो महिलाओं को सशक्तिकरण और विशेषाधिकार से भरा एक ऐसा जीवन देने का वादा करता है, जो उन्हें किसी अन्य रूप में अपने लिए संभव नहीं लगता. उदाहरण के लिए, दाबिक पत्रिका के अंक-9 में यह दावा किया गया है कि आईएसआईएस  के पास मेडिकल स्कूल हैं जो पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए खुले हैं. लेख कहता है कि, “इस्लामिक स्टेट हर वो चीज़ दे सकता है जो यहां रहने, काम करने और एक बेहतर ज़िंदगी जीने के लिए ज़रूरी है, इसलिए आप किस चीज़ के इंतज़ार में हैं?” आईएसआईएस के पास ऐसे स्कूल भी हैं जहाँ लड़कियों को धर्म, विज्ञान, गणित आदि की शिक्षा दी जाती है, जिसके चलते उनके पास शिक्षित होने आईएसआईएस के राज्य-क्षेत्र के भीतर महिलाओं के लिए निश्चित नौकरियां करने का विकल्प है.

आईएसआईएस उन महिलाओं के प्रति भी प्रगतिशील और क्रांतिकारी विचार रखने का दावा करता है, जो अपने पति का साथ छोड़ कर संगठन में शामिल होने आती हैं. दाबिक पत्रिका के अंक-10 में कहा गया है कि, “अगर आपके पति अक्खड़पन दिखाते हैं और पाप की दुनिया में रहते हुए उनका अभिमान उन्हें उस दुनिया को छोडने नहीं देता, तो यह पूरी तरह से आप पर है कि आप उन्हें उस ‘दुनिया’ में छोड़कर आ जाएं ताकि अपने जीवन को यहां सार्थक बना सकें. मैं आह्वान करता हूँ कि आप इस्लामी राज्य की इस पवित्र धरती पर रहने के लिए अपने प्रिय का त्याग करें और यहां हिज्र करें!” इस रूप में यह संगठन बड़ी चतुराई से महिलाओं को अपने पति को इस तरह से छोड़ने की नसीहत देता है, जो उन्हें धर्म के अनुरूप प्रतीत हो.

महिलाओं का ऐसे संगठन के प्रति आकर्षित होना जो उनके प्रति बेहद हिंसक है, इसलिए मुमकिन हो पाता है क्योंकि इस हिंसा को धार्मिक रूप से मंजूरी दी जाती है. ‘गुलाम बनाई गई लड़कियों’ के साथ दुर्व्यवहार को लेकर, दाबिक के अंक-9 में ज़ोर देकर कहा गया है कि, “ये गुलाम-लड़कियां कुफ़्र का प्रतिनिधित्व करती हैं और इसलिए यह ज़रूरी है कि उन्हें अपमानित किया जाए”. संगठन यह भी दावा करता है कि जो महिलाएं इस्लामिक स्टेट से बच कर निकली हैं और अपने साथ हुए दुर्व्यवहार के बारे में लिखती हैं, वे झूठ बोल रही हैं और वो “इस हद तक कुटिल और दुष्ट हैं कि उनकी कहानियां किसी के भी विश्वास करने लायक नहीं” इसके अलावा इन पत्रिकाओं में लगातार एक ऐसी बात का प्रचार किया जाता है महिलाओं को ध्यान में रखकर गढ़ी गई है. ये बयानबाज़ी और प्रोपगंडा है एक “अच्छी” मुस्लिम महिला की परिभाषा और उसकी अवधारणा को लेकर- जिसके कई पहलू दुनिया भर की महिलाओं को पसंद आते हैं. महिलाओं में धार्मिक साक्षरता की कमी के चलते वो इस तरह के चरमपंथी प्रचार को झुठला नहीं पातीं और उनके शिकार होने की संभावना और इस प्रचार के प्रति उनकी संवेदनशीलता बढ़ जाती है.

दाबिक पत्रिका के अंक-10 में कहा गया है कि, “अगर आपके पति अक्खड़पन दिखाते हैं और पाप की दुनिया में रहते हुए उनका अभिमान उन्हें उस दुनिया को छोडने नहीं देता, तो यह पूरी तरह से आप पर है कि आप उन्हें उस ‘दुनिया’ में छोड़कर आ जाएं ताकि अपने जीवन को यहां सार्थक बना सकें.

कल्पना बनाम सच्चाई: आईएसआईएस में महिलाओं की भूमिका

परंपरागत रूप से, महिलाओं को केवल इस्लामिक स्टेट के रोज़मर्रा कामकाज और सरकारी प्रक्रियाओं में ही भाग लेने की अनुमति दी गई थी. उनके युद्ध संबंधी गतिविधियों और सैन्य अभियानों में शामिल होने पर रोक थी. हालाँकि, पिछले कुछ सालों में आईएसआईएस में संगठनात्मक स्तर पर महिलाओं की भागीदारी में बदलाव आया है क्योंकि संगठन के पास अब संसाधनों की कमी है और उसने कई तरह के नुकसान और असफलताएं झेली हैं. हाल ही में की गई भर्तियों से संबंधित आंकड़े स्पष्ट रूप में मौजूद नहीं है, लेकिन नियमित रुप से दक्षिण-एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया से इस्लामिक स्टेट में लोगों के शामिल होने के उदाहरण सामने आते रहे हैं. यह भी स्पष्ट है कि इस्लामिक स्टेट में अब महिलाएं संगठन के सैन्य अभियानों और युद्ध संबंधी गतिविधियों में पहले से अधिक खुलकर भाग ले रही हैं. महिलाओं को अब अक्सर मोर्चे पर होने वाली लड़ाई में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है. यह मुख्य रूप से लड़ाकों की संख्या बढ़ाने के लिए किया जाता है, लेकिन साथ ही उन “पुरुषों को शर्मिंदा करने के लिए भी किया जाता है जो लड़ाई से बाहर आ गए हैं या लड़ना नहीं चाहते”. इसलिए, इस्लामिक स्टेट अपनी महिला अनुयायियों से जो कहता है, और ज़मीनी स्तर पर उनसे जो उम्मीद करता है, उसके बीच काफ़ी अंतर है. संगठन ने अब महिलाओं को युद्ध क्षेत्रों में शामिल न करने के अपने पिछले सिद्धांत और वैचारिक रुख को छोड़ दिया है, और अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए वह इस्लामी क़ानून और सीख को अब नए से नए तरीकों से परिभाषित और व्याख्यायित करता है.

संगठन यह भी दावा करता है कि जो महिलाएं इस्लामिक स्टेट से बच कर निकली हैं और अपने साथ हुए दुर्व्यवहार के बारे में लिखती हैं, वे झूठ बोल रही हैं और वो “इस हद तक कुटिल और दुष्ट हैं कि उनकी कहानियां किसी के भी विश्वास करने लायक नहीं”

आईएसआईएस के भीतर महिलाओं की बदलती भूमिका को वैश्विक स्तर पर समझने और आतंकवाद विरोधी प्रयासों में इनके विश्लेषण को हाल फिलहाल ही स्वीकार किया गया है. इससे पहले रणनीतिक रूप से इसे कोई तवज्जो नहीं दी गई. भले ही पारंपरिक धारणा यह हो कि इन महिलाओं को उनकी इच्छा के विरुद्ध और जबरन आईएसआईएस की गतिविधियों में शामिल किया जाता है, ब्रिटिश मूल की शमीमा बेग़म की कहानी इस धारणा को गलत ठहराती है. आईएसआईएस का दामन छोड़कर वापस लौटी शमीमा बेग़म के इस दावे के बावजूद कि वह कभी भी इस्लामिक स्टेट की बर्बरता में शामिल नहीं रही, तमाम रिपोर्ट इस बात का दावा करती हैं कि वो संगठन की ‘नैतिक-पुलिस’ का हिस्सा थीं और उन्होंने संगठन में भर्ती से जुड़ी गतिविधियों में हिस्सा लिया. शमीमा बेग़म की तरह के मामले आईएसआईएस के भीतर महिलाओं की अनदेखी भूमिकाओं पर प्रकाश डालते हैं. ये मामले यह साबित करते हैं कि इस्लामिक स्टेट में महिलाएं भर्ती के अलावा कई तरह की भूमिकाएं निभाती हैं. इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र की आतंकवाद विरोधी समिति के कार्यकारी निदेशालय (CTED) के जुलाई 2020 के सूचना-पत्र के मुताबिक आईएसआईएस से भागकर वापस लौटी महिलाओं के पुनर्वास ये यह बात पुष्ट हुई है कि संगठन में शामिल होने वाली महिलाएं, युद्ध अपराधों और आतंकी हमलों में शामिल रही हैं. हालाँकि, हिंसा के अपराधियों के रूप में आईएसआईएस के भीतर महिलाओं की सक्रिय भागीदारी पर प्रतिबंधात्मक लिंग मानदंडों के कारण प्रमुखता से बात नहीं की गई है.

आईएसआईएस के भीतर महिलाओं की बदलती भूमिका को वैश्विक स्तर पर समझने और आतंकवाद विरोधी प्रयासों में इनके विश्लेषण को हाल फिलहाल ही स्वीकार किया गया है. इससे पहले रणनीतिक रूप से इसे कोई तवज्जो नहीं दी गई.

इस्लामिक स्टेट में महिलाओं की भूमिका के बारे में बढ़ती जानकारी, आतंकवाद विरोधी रणनीतियों को व्यापक बनाने की ज़रूरत पर ज़ोर देती है. यह ज़रूरी है कि आईएसआईएस के प्रचार से लोगों को बचाने की रणनीतियों पर ध्यान दिया जाए और इस काम में बाधा उत्पन्न करने वाले व्यवस्थागत मुद्दों को संबोधित किया जाए. ऐसे में उन बातों पर ध्यान केंद्रित करना भी ज़रूरी है जिनके चलते महिलाएं इस्लामिक स्टेट की ओर आकर्षित होती हैं, और उनके प्रोपगंडा को सही मानती हैं. यह सुनिश्चित करने के लिए कि समाज के हाशिए पर खड़े लोग कट्टरपंथी विचारधारा की ओर प्रेरित न हों, यह ज़रूरी है कि हिंसा, आर्थिक-असंतोष, वित्तीय असुरक्षा, और अवसरों की कमी जैसे मुद्दों पर काम किया जाए. यह वो बातें हैं जिनका महिलाएं अक्सर सामान्य जीवन में सामना करती हैं, और इसके चलते इससे जुड़ी कोई भी बात उनके लिए महत्वपूर्ण और प्रभावी साबित होती है.

The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.