ऑस्ट्रेलिया अपनी विदेश नीति को बड़ी तत्परता के साथ नए सिरे से गढ़ने में लगा है. एंथनी अलबनीज की सरकार चीन के साथ रिश्तों में नरमी लाने की दिशा में काम कर रही है, जिसके साथ कैनबरा के संबंध हाल के वर्षों में काफी बिगड़े हैं. चीन की आक्रामक व्यापार नीति और उस पर ऑस्ट्रेलिया के जबरदस्त पलटवार ने संबंधों में कड़वाहट घोल दी, जिसे दूर करने के लिए ऑस्ट्रेलिया के वाणिज्य मंत्री ने गत माह अपने चीनी समकक्ष के साथ वर्चुअल वार्ता की.
उल्लेखनीय है कि अलबनीज के अमेरिकी दौरे पर ऑस्ट्रेलिया के लिए परमाणु पनडुब्बी की आपूर्ति पर अंतिम मुहर लग सकती है. इस सौदे की राह उसके लिए 2021 में आकस समझौते से खुली थी.
ऑस्ट्रेलिया ने भले ही चीन के साथ संबंधों को सामान्य बनाने के संकेत दिए हैं, लेकिन अपनी विदेश नीति के माध्यम से यह भी स्पष्ट किया है कि इसमें उसके हित ही सर्वोपरि होंगे. ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री अलबनीज की गत सप्ताह भारत और इस सप्ताह अमेरिकी यात्रा को इस संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए. क्वाड के सदस्य दो देशों के साथ कैनबरा की बढ़ती साझेदारी को चीन सहजता से नहीं ले पाएगा.
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सामरिक स्थायित्व आएगा
उल्लेखनीय है कि अलबनीज के अमेरिकी दौरे पर ऑस्ट्रेलिया के लिए परमाणु पनडुब्बी की आपूर्ति पर अंतिम मुहर लग सकती है. इस सौदे की राह उसके लिए 2021 में आकस समझौते से खुली थी. ऑस्ट्रेलिया यूएस वर्जीनिया-क्लास पनडुब्बी खरीद रहा है. उसकी तीन से पांच ऐसी पनडुब्बी खरीदने की योजना है. आकस के साथियों अमेरिका और ब्रिटेन के साथ एडिलेड में उसकी साझा डिजाइन की भी तैयारी है. कैनबरा को परमाणु पनडुब्बी क्षमताएं बहुत तेजी से मिलने जा रही हैं. इससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सामरिक स्थायित्व आएगा. इसके साथ ही ऑस्ट्रेलिया-अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, भारत और रूस के बाद परमाणु पनडुब्बी की क्षमताओं से लैस सातवां देश बन जाएगा.
जहां भारत ऑस्ट्रेलियाई कंपनियों को निवेश के लिए प्रोत्साहित कर रहा है, वहीं ऑस्ट्रेलियाई सरकार की मंशा है कि उनकी कंपनियां चीन से इतर निवेश की राह पर बढ़ें. चूंकि भारत कार्बन उत्सर्जन को घटाकर हरित ऊर्जा की दिशा में अग्रसर हो रहा है तो इसमें ऑस्ट्रेलिया के साथ सहयोग के लिए सौर ऊर्जा और हाइड्रोजन जैसे अक्षय ऊर्जा विकल्पों पर बात आगे बढ़ी है.
हालांकि, यह मामला परमाणु पनडुब्बियों से कहीं बढ़कर तीन पारंपरिक सामरिक साझेदारों के बीच मजबूत होते रिश्तों का है, जिन्हें अपने समक्ष उत्पन्न हो रही चुनौतियों का प्रभावी रूप से मुकाबला करने के लिए खुफिया और हाई-टेक सहयोग को तत्काल बढ़ाने की आवश्यकता है. कुछ हलकों में आरंभिक हिचक के बाद ऑस्ट्रेलियाई राजनीतिक बिरादरी इस अहम साझेदारी के लिए आगे आई है. यही बात भारत-ऑस्ट्रेलिया संबंधों के बारे में भी कही जा सकती है, जिसके लिए दलगत भावना से परे जोरदार भावनाएं उभार ले रही हैं, जबकि कई वर्षों से यह साझेदारी अपेक्षित रफ्तार से आगे नहीं बढ़ पा रही थी.
निवेश के लिए प्रोत्साहित कर रहा भारत
गत सप्ताह अलबनीज के दौरे में यह अनुभूति हुई कि अंतत: दोनों देशों को अपने संबंधों की वास्तविक संभावनाओं का आभास हुआ. भारत में अलबनीज ने न केवल व्यापार, सुरक्षा, सामरिक और शैक्षणिक विषयों पर चर्चा की, बल्कि होली खेलने के साथ ही क्रिकेट का लुत्फ भी उठाया, जो दर्शाता है कि दोनों देशों के बीच रिश्ते कितने व्यापक एवं गहरे हो गए हैं. गत वर्ष आर्थिक सहयोग एवं व्यापार समझौते पर बनी सहमति से व्यापार के मोर्चे पर महत्वाकांक्षाएं कहीं अधिक बढ़ गई हैं. इस समझौते से ऑस्ट्रेलिया से भारत को होने वाले 85 प्रतिशत निर्यात पर शुल्क खत्म हो गया. दोनों देश व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर करने को लेकर भी प्रतिबद्ध हैं. अलबनीज ने कहा कि इस साल के अंत तक इसे मूर्त रूप देने का लक्ष्य रखा गया है.
जहां भारत ऑस्ट्रेलियाई कंपनियों को निवेश के लिए प्रोत्साहित कर रहा है, वहीं ऑस्ट्रेलियाई सरकार की मंशा है कि उनकी कंपनियां चीन से इतर निवेश की राह पर बढ़ें. चूंकि भारत कार्बन उत्सर्जन को घटाकर हरित ऊर्जा की दिशा में अग्रसर हो रहा है तो इसमें ऑस्ट्रेलिया के साथ सहयोग के लिए सौर ऊर्जा और हाइड्रोजन जैसे अक्षय ऊर्जा विकल्पों पर बात आगे बढ़ी है. सोलर पीवी और आपूर्ति शृंखला को गति देने के लिए ऑस्ट्रेलिया-भारत सोलर टास्कफोर्स जैसी संकल्पना सुनने को मिली. प्रमुख खनिजों के मामले में भारत की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए लीथियम और कोबाल्ट जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की निर्बाध आपूर्ति को लेकर भी दोनों देश काम कर रहे हैं.
भारत और ऑस्ट्रेलिया के संबंधों को आकार देने में दोनों देशों के लोगों के बीच सक्रियता महत्वपूर्ण हो गई है. ऑस्ट्रेलिया में भारतवंशी आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से प्रभावशाली होते जा रहे हैं. वहीं भारतीय मध्य वर्ग में ऑस्ट्रेलियाई शिक्षा तंत्र के प्रति आकर्षण भी निरंतर बढ़ने पर है. अध्ययन के लिए भारतीय छात्र बड़ी संख्या में ऑस्ट्रेलिया के विभिन्न शहरों का रुख कर रहे हैं तो कई ऑस्ट्रेलियाई विश्वविद्यालय भारत सरकार के नए नियमों का लाभ उठाने के उद्देश्य से देश में ही अपने परिसर स्थापित करने की तैयारी कर रहे हैं.
द्विपक्षीय संबंधों में एक परिपक्वता के संकेत
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समान विचार वाले देशों का बढ़ता रक्षा एवं सामरिक सहयोग इससे भी महत्वपूर्ण पहलू है. वर्ष 2007 में जहां ऑस्ट्रेलिया और भारत को लेकर ही क्वाड का मामला अधर में अटका था, वही दोनों देश अब इस समूह को नई धार दे रहे हैं. इसी कड़ी में ऑस्ट्रेलिया पहली बार मालाबार सैन्य अभ्यास की मेजबानी करने जा रहा है. भारत भी अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और अन्य साझेदार देशों के साथ तालिसमान सेबर अभ्यास में शामिल होगा. भारत और ऑस्ट्रेलिया के नौसैन्य अभ्यास अब आम हो गए हैं. अलबनीज की यात्रा के दौरान द्विपक्षीय संबंधों में एक परिपक्वता के संकेत भी मिले हैं कि मुश्किल और असहज मुद्दों पर भी सार्वजनिक रूप से सहज चर्चा हो सकती है. ऑस्ट्रेलिया में हिंदू मंदिरों पर हमलों की घटना को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चिंता पर अलबनीज ने कहा कि ऐसी हरकतें बिल्कुल बर्दाश्त नहीं की जाएंगी और ऐसा करने वालों से कानून कड़ाई से निपटेगा.
ऑस्ट्रेलिया ने यह कहकर अपनी मंशा भी स्पष्ट कर दी है कि भारत हिंद-प्रशांत और उससे इतर भी ऑस्ट्रेलियाई रणनीति के मूल में है तो स्पष्ट है कि द्विपक्षीय संबंधों में नई संभावनाओं के द्वार खुल रहे हैं. इस साझेदारी में हिंद-प्रशांत के सामरिक ढांचे का कायाकल्प करने का दमखम है.
जब ऑस्ट्रेलिया अपनी विदेश और सामरिक नीतियों को तेजी से नए तेवर दे रहा है तो भारत इससे सृजित हो रहे व्यापक अवसरों का लाभ उठा सकता है. ऑस्ट्रेलिया ने यह कहकर अपनी मंशा भी स्पष्ट कर दी है कि भारत हिंद-प्रशांत और उससे इतर भी ऑस्ट्रेलियाई रणनीति के मूल में है तो स्पष्ट है कि द्विपक्षीय संबंधों में नई संभावनाओं के द्वार खुल रहे हैं. इस साझेदारी में हिंद-प्रशांत के सामरिक ढांचे का कायाकल्प करने का दमखम है.
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यह लेख जागरण में प्रकाशित हो चुका है.
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