Expert Speak Raisina Debates
Published on Mar 02, 2023 Updated 0 Hours ago

यूक्रेन संकट ने ना सिर्फ़ यूरोपियन यूनियन को भीतर से मज़बूत किया है, बल्कि उसे यूरोपीय संघ के संस्थानों को ताक़तवर बनाने के उपाय सुनिश्चित करने के लिए भी मजबूर किया है.

जानिए किस प्रकार यूक्रेन संकट ने यूरोप को बदल दिया!

पोलैंड की राजधानी वारसॉ में 21 फरवरी, 2023 को अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन के भाषण और उसी दिन रूसी राष्ट्रपति पुतिन का राष्ट्र के नाम संबोधन, दोनों ने ही पश्चिम और रूस के बीच के मतभेदों को स्पष्ट रूप से सामने ला दिया है कि उन्होंने पिछले वर्ष हुए घटनाक्रमों को किस प्रकार से देखा है. अपने भाषणों में दोनों नेताओं ने अपनी प्रतिबद्धताओं को ज़ोरदार तरीक़े से दोहराया. कुल मिलाकर उनके भाषणों से जो साफ संदेश मिला, वह यह था कि यह रूस-यूक्रेन युद्ध ज़ल्द समाप्त नहीं होगा. जैसा कि यूक्रेन युद्ध को शुरू हुए एक साल पूरा हो चुका है. युद्ध की वजह से जहां यूक्रेन के लाखों नागरिकों ने देश छोड़ दिया है, वहीं अब तक लगभग 100,000 सैनिकों और 30,000 से अधिक नागरिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी है. युद्ध के कारण यूक्रेन के महत्त्वपूर्ण ऊर्जा और आर्थिक इन्फ्रास्ट्रक्चर तबाह हो गए हैं. जहां तक यूरोप की बात है, तो रूस की तरफ़ से की गई कार्रवाइयों ने यूरोपीय सदस्य देशों की एकता को मज़बूत करने का काम किया है, विस्तारित NATO (नाटो) में नई जान फूंक दी है और सबसे अहम बात यह है कि यूरोपीय संघ ने कुछ अभूतपूर्व निर्णय लिए हैं. इस लेख में यूरोपीय संघ (EU) द्वारा पिछले एक वर्ष में लिए गए पांच प्रमुख नीतिगत निर्णयों पर विस्तार से चर्चा की गई है.

दोनों ने ही पश्चिम और रूस के बीच के मतभेदों को स्पष्ट रूप से सामने ला दिया है कि उन्होंने पिछले वर्ष हुए घटनाक्रमों को किस प्रकार से देखा है. अपने भाषणों में दोनों नेताओं ने अपनी प्रतिबद्धताओं को ज़ोरदार तरीक़े से दोहराया. कुल मिलाकर उनके भाषणों से जो साफ संदेश मिला, वह यह था कि यह रूस-यूक्रेन युद्ध ज़ल्द समाप्त नहीं होगा.

सुरक्षा का खाका फिर से तैयार करना

यूक्रेन संकट ने यूरोप के भीतर रक्षा संरचनाओं और संसाधनों को सुदृढ़ करने को लेकर नए सिरे से बहस छेड़ दी है. नाटो और यूरोपीय संघ दोनों ही स्तरों पर अपने संबंधित ढांचे को पूरी तरह से पुनर्गठित करने को लेकर क़वायद देखी गई है. गठबंधन को मज़बूत करने के लिए नाटो पूर्वी सीमाओं में अपनी मौज़ूदगी को बढ़ाने के लिए अपने एनहांस्ड फॉरवर्ड प्रेजेंस (eFP) मिशनों की संख्या को चार से बढ़ाकर आठ कर रहा है. इसके साथ ही नाटो ने फिलहाल के लिए अपने रैपिड रिएक्शन फोर्स यानी त्वरित प्रतिक्रिया बल को सक्रिय कर दिया है. नाटो ने जून 2022 में अपना स्ट्रैटजिक कम्पास भी जारी किया है, जिसमें अगले दशक के लिए उसने अपनी प्राथमिकताओं का निर्धारण किया है. हालांकि, इस युद्ध का सबसे अहम नतीज़ा यह है कि स्वीडन और फिनलैंड द्वारा अपनी तटस्थता और निष्पक्षता का त्याग किया जा रहा है, जिससे उत्तरी यूरोप में नाटो के विस्तार की संभावनाएं बलबती हो गई हैं.

यूरोपीयन यूनियन ने अपनी तरफ से अपनी यूरोपियन पीस फैसिलिटी के ज़रिए यूक्रेन को सैन्य मदद उपलब्ध कराने की दिशा में कार्य किया है. इसके तहत, यूरोपीय संघ अब तक यूक्रेन को 3.6 बिलियन यूरो की सैन्य सहायता प्रदान कर चुका है, जिसमें घातक हथियारों (3.1 बिलियन यूरो) और गैर-घातक हथियारों की आपूर्ति (380 मिलियन यूरो) शामिल हैं. यूरोपियन यूनियन ने यूक्रेन के सशस्त्र बलों की सैन्य क्षमता में वृद्धि के लिए यूक्रेन की मदद हेतु एक मिलिट्री असिस्टेंस मिशन (EUMAM यूक्रेन) भी स्थापित किया है. उल्लेखनीय है कि ईयू के सदस्य देशों की तरफ़ से यूक्रेन को मिलने वाली कुल सैन्य सहायता लगभग 8.4 बिलियन यूरो है. राष्ट्रीय स्तर पर देखें, तो ईयू के सदस्य राष्ट्रों ने अपने-अपने रक्षा बजट में वृद्धि करने का भी कार्य किया है, लेकिन सबसे अहम बात यह दिखी कि जर्मनी ने युद्ध क्षेत्रों में हथियारों की आपूर्ति नहीं करने की अपनी नीति को छोड़ दिया है और देश के रक्षा बजट के लिए अपनी जीडीपी की 2 प्रतिशत राशि फिर से जारी की है

ऊर्जा के विविधीकरण की संभावना बनना

सबसे मूलभूत बदलाव यह हुआ है कि यूरोप की रूसी एनर्जी पर निर्भरता कम हो गई है. वर्ष 2020-2021 में यूरोपीयन यूनियन ने रूस से 29 प्रतिशत क्रूड ऑयल, 43 प्रतिशत प्राकृतिक गैस और 54 प्रतिशत ठोस जीवाश्म ईंधन का आयात किया था और इस पर कुल 71 बिलियन यूरो खर्च किए थे. एनर्जी के लिए रूस पर अपनी निर्भरता को कम करने के लिए यूरोपीयन यूनियन और उसके सदस्य राष्ट्रों ने चुनौती का जवाब देने के लिए तीन महत्त्वपूर्ण क़दम उठाए हैं.

इस युद्ध का सबसे अहम नतीज़ा यह है कि स्वीडन और फिनलैंड द्वारा अपनी तटस्थता और निष्पक्षता का त्याग किया जा रहा है, जिससे उत्तरी यूरोप में नाटो के विस्तार की संभावनाएं बलबती हो गई हैं.

सबसे पहले, यूरोपियन यूनियन ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर रूस से ऊर्जा आयात पर प्रतिबंध लगाया. इतना ही नहीं, ईयू ने अपने पांचवें और छठे दौर के प्रतिबंधों में सभी प्रकार के रूसी कोयले, समुद्री क्रूड ऑयल और पेट्रोलियम उत्पादों पर प्रतिबंध लगा दिया. इसके साथ ही यूरोपियन यूनियन, जी 7 देशों के साथ मिलकर रूस में पैदा होने वाले और वहां से निर्यात होने वाले समुद्री पेट्रोलियम उत्पादों पर प्राइस कैप लागू करने पर भी सहमत हुआ.

यूरोपियन यूनियन ने जो दूसरा क़दम उठाया, उसमें ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए रूस के विकल्प तलाशना था. इसके अंतर्गत ईयू ने अमेरिका, नॉर्वे, अज़रबैजान, अल्जीरिया, जापान, क़तर आदि जैसे अन्य देशों से ऊर्जा की वैकल्पिक आपूर्ति हासिल करके मॉस्को से अलग हटकर अपने संसाधनों में विविधता लाने की दिशा में कार्य किया है. इसके अलावा, अलग-अलग देशों द्वारा अपने स्तर पर ऊर्जा संसाधनों से संपन्न देशों के साथ ऊर्जा समझौते जैसे उपाय भी किए गए. इसका एक प्रमुख उदाहरण LNG निर्यात के लिए जर्मनी और क़तर के बीच 15 साल के समझौते पर हस्ताक्षर करना है. यह दोनों देश अगले दशक में नए LNG टर्मिनल विकसित करने की प्रक्रिया में भी जुटे हुए हैं. यूरोपीय संघ ने मार्च 2022 में यह भी ऐलान किया था कि वह एक साल के भीतर रूस से गैस आयात में दो-तिहाई की कटौती करेगा. अब तक, ईयू के सदस्य देशों ने नवंबर 2022 तक रूसी गैस पर अपनी निर्भरता को सफलतापूर्वक 20 प्रतिशत से कम कर दिया है.

चित्र: यूरोपियन यूनियन की गैस आपूर्ति

 How The Ukraine Crisis Changed Europe118709स्रोत: यूरोपियन काउंसिल

तीसरे क़दम के अंतर्गत यूरोपियन यूनियन ने अपने ग्रीन डील और फिट फॉर 55 एजेंडा को जारी रखते हुए वर्ष 2022 में अपनी महत्त्वाकांक्षी RePowerEU योजना को आगे बढ़ाया और इसके तहत रूसी जीवाश्म ईंधन पर अपनी निर्भरता को कम करने के लिए एक ब्लूप्रिंट तैयार किया. इस योजना का उद्देश्य स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में ईयू के झुकाव को गति प्रदान करना और बिजली उत्पादन, भवनों, परिवहन और उद्योग में अपनी नवीकरणीय ऊर्जा क्षमताओं में बढ़ोतरी करना है. इस योजना में इसके प्रमुख पर्यावरण पैकेज यानी ईयू ग्रीन डील में संशोधन शामिल हैं, जो तीन प्रमुख क्षेत्रों - ऊर्जा बचत, आपूर्ति का विविधीकरण और नवीकरणीय ऊर्जा की तरफ़ तेज़ संक्रमण को कवर करता है.

विस्थापन को लेकर रवैया

यूरोपियन यूनियन के सदस्य देशों के बीच माइग्रेशन यानी विस्थापन एक ऐसा मुद्दा है, जिसको लेकर सबसे अधिक विवाद रहा है. यूरोप ने व्यापक स्तर पर अवैध विस्थापन का सामना किया है, जो कई बार संकट के स्तर तक बढ़ गया, जैसे कि वर्ष 2015-16 का विस्थापन संकट. जिस प्रकार से ईयू के सदस्य देशों के भीतर इस मुद्दे का सबसे अधिक राजनीतिकरण हुआ है, इससे स्पष्ट है कि यूरोपीय संघ या तो डबलिन रेगुलेशन्स में सुधार करने में असमर्थ रहा है या फिर विस्थापन पर एक व्यापक नीति तैयार करने में नाकाम रहा है.

हालांकि, यूक्रेन संकट शुरू होने के बाद, जैसे ही यूक्रेनी नागरिक यूरोपियन यूनियन के सदस्य देशों में विस्थापित होने लगे, तो ईयू ने पहली बार अपने टेंपरेरी प्रोटेक्शन डायरेक्टिव को प्रारंभ किया. यूरोपीय संघ द्वारा इस डायरेक्टिव को वर्ष 2001 में पश्चिमी बाल्कन में, विशेष रूप से कोसोवो, बोस्निया और हर्ज़ेगोविना में विवाद और संघर्ष के कारण बड़े पैमाने पर हुए विस्थापन का सामना करने के तौर पर अपनाया गया था. हालांकि, यह अलग बात है कि इस डायरेक्टिव का कभी उपयोग नहीं किया गया था. इसके अंतर्गत ईयू के सदस्य देशों ने यूक्रेनी शरणार्थियों को ना केवल तत्काल सुरक्षा प्रदान की, बल्कि उन्हें रेजीडेंस परमिट, सामाजिक कल्याण, स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा और श्रम बाज़ार की ज़ल्द से ज़ल्द सुविधा उपलब्ध कराने के लिए आश्रय प्रणाली को बाईपास कर दिया है. इस डायरेक्टिव जो जिस तत्परता और सक्रियता के साथ अमल में लाया गया है, उसे 'अभूतपूर्व' और 'ऐतिहासिक' बताया गया है. ज़ाहिर है कि इस डायरेक्टिव की वजह से अब तक 4 मिलियन यूक्रेनी नागरिकों को अस्थायी सुरक्षा तंत्र का लाभ मिल चुका है. ये सभी यूक्रेनी नागरिक यूरोपीय संघ के सदस्य देशों में बस चुके हैं, इनमें से जर्मनी और पोलैंड ऐसे देश हैं, जहां प्रत्येक में 9 लाख से अधिक यूक्रेनी नागरिक रह रहे हैं.

सबसे मूलभूत बदलाव यह हुआ है कि यूरोप की रूसी एनर्जी पर निर्भरता कम हो गई है. वर्ष 2020-2021 में यूरोपीयन यूनियन ने रूस से 29 प्रतिशत क्रूड ऑयल, 43 प्रतिशत प्राकृतिक गैस और 54 प्रतिशत ठोस जीवाश्म ईंधन का आयात किया था और इस पर कुल 71 बिलियन यूरो खर्च किए थे.

इस डायरेक्टिव को अमल में लाने के बाद से ईयू के सदस्य देशों के बीच विस्थापन को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रिया और मत भिन्नता दिखाई दी है. जैसा कि वर्ष 2015 के संकट के दौरान देखा गया था कि कई सदस्य देशों ने विस्थापन के बोझ को साझा करने के विचार का विरोध किया था, जिससे अग्रिम पंक्ति वाले राष्ट्र बहुत अधिक घबरा गए थे. हालांकि, इस सबने शरण मांगने वाले गैर-यूरोपीय तीसरे देश के नागरिकों को लेकर भेदभाव से जुड़े सवालों को भी उठाया था.

यूरोपियन यूनियन के भीतर एकजुटता

यूरोपीय संघ के उच्च प्रतिनिधि जोसेप बोरेल ने हाल ही में एक साक्षात्कार में कहा, "यह हमेशा आसान नहीं रहा है...कुछ ने शिकायत की, दूसरों ने असहमति जताई, लेकिन आख़िर में हमने उस एकता को बनाए रखा, जिसकी हमें ज़रूरत थी." उन्होंने यूरोपीयन यूनियन के सदस्य देशों के बीच एकता बनाए रखने के निरंतर प्रयासों पर प्रकाश डाला और बताया कि किस प्रकार से ये देश सामने खड़े संकट का एकजुटता के साथ मुक़ाबला करते हैं. अभी तक देखा जाए, तो यूरोपीय संघ ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर रूस पर नौ दौर के प्रतिबंध लगाए हैं. इनमें से कई प्रतिबंध तो ऐसे हैं, जो पहली बार लागू किए गए हैं. जैसे कि रूसी क्रूड ऑयल और कोयले पर प्रतिबंध, अंतर्राष्ट्रीय पेमेंट सिस्टम SWIFT से रूसी बैंकों का निष्कासन, रूसी कच्चे तेल पर जी7 प्राइस कैप सीमा को लागू करना, प्रौद्योगिकियों के निर्यात पर लगे नियंत्रण का विस्तार करना और विमानन, तकनीकी एवं समुद्री सेक्टरों समेत दूसरे अन्य क्षेत्रों में निर्यात पर प्रतिबंध लगाना. जहां तक यूक्रेन को मिली मदद की बात है, तो फरवरी 2023 तक यूरोपियन यूनियन और उसके सदस्य देशों ने उसे कुल 67 बिलियन यूरो की आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई है. इसमें 37.8 बिलियन यूरो की आर्थिक मदद, 12 बिलियन यूरो की सैन्य सहायता और 17 बिलियन यूरो की शरणार्थी सहायता शामिल है.

यूक्रेन को यूरोपियन यूनियन की सहायता

 How The Ukraine Crisis Changed Europe118709

स्रोत: https://www.consilium.europa.eu/en/infographics/eu-assistance-ukraine/

इसके अलावा, कुछ असाधारण क़दमों के बारे में भी चर्चा की जा रही है, जैसे कि यूक्रेन के पुनर्निमाण के लिए रूस के फ्रोज़ेन एसेट्स का संभावित निवेश. विश्व बैंक, यूरोपीय संघ और यूक्रेन के सितंबर 2022 के एक साझा आकलन में यह अनुमान लगाया गया था कि यूक्रेन की रिकवरी और पुनर्निर्माण में 349 बिलियन यूरो तक का ख़र्च आएगा. ज़ाहिर है कि अभी रूस-यूक्रेन युद्ध ज़ारी है और ऐसे में इस आंकड़े के बदलने की उम्मीद है. पोलैंड और बाल्टिक देशों जैसे ईयू के सदस्य राष्ट्र ज़ोर दे रहे हैं कि यूक्रेन के पुनर्निर्माण में मदद के लिए 'रूस के 300 बिलियन फ्रोज़ेन सेंट्रल बैंक रिजर्व' का उपयोग किया जाए. ऐसे में जबकि यूरोपीय संघ इस मुद्दे को लेकर अपने विचार-विमर्श को आगे बढ़ा रहा है, लेकिन बिना किसी क़ानूनी फ्रेमवर्क के और पूर्व में कभी इस तरह का क़दम नहीं उठाए जाने की वजह से, यह प्रस्ताव काफ़ी तक संदेहास्पद है और मुश्किलें खड़ी करने वाला है.

बदलता संतुलन?

यूक्रेन में चल रहे युद्ध ने रूस और यूक्रेन को लेकर यूरोपीय संघ की नीति पर पश्चिमी देशों और पूर्वी यूरोप के बीच नैरेटिव में मूलभूत अंतर को सामने लाकर रख दिया है. यूक्रेन संकट को लेकर यूरोपियन यूनियन की प्रतिक्रिया पर यूनियन के अग्रिम पंक्ति के राष्ट्रों जैसे कि पोलैंड और बाल्टिक देशों एवं फ्रांस व जर्मनी जैसे पश्चिमी यूरोपीय राष्ट्रों के बीच मतभेद बढ़ता जा रहा है. रूस-यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद से ही पूर्वी यूरोपीय देश कीव के समर्थन में सैन्य मदद प्रदान करने, प्रतिबंध लगाने और शरणार्थियों के पुनर्वास आदि में सबसे ज़्यादा सक्रिय रहे हैं. जबकि फ्रांस और जर्मनी ने रूस को लेकर अपनी मिलीजुली प्रतिक्रिया ज़ाहिर की है. यानि कि एक ओर फ्रांस और जर्मनी मॉस्को के साथ संबंध बरक़रार रखने और दूसरी ओर ईयू के सदस्य देशों के बीच एकजुटता बनाए रखने के बीच बंटे हुए हैं या फिर भ्रमित से दिखाई देते हैं. रूस को लेकर यूरोपियन यूनियन की नीति और प्रतिक्रिया का खाका बनाने में पूर्वी यूरोपीय राष्ट्र सबसे आगे दिखाई देते हैं. यूक्रेन के समर्थन के साथ ही यह राष्ट्र अपने स्वयं के रक्षा ढांचे को मज़बूत करने की दिशा में भी गंभीरता से जुटे हुए हैं. इतना ही नहीं पूर्वी यूरोप के इन राष्ट्रों ने पूरे रीजन में नाटो की प्रतिरोध क्षमता की मज़बूती की भी पुरज़ोर वक़ालत की है.

अभी तक देखा जाए, तो यूरोपीय संघ ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर रूस पर नौ दौर के प्रतिबंध लगाए हैं. इनमें से कई प्रतिबंध तो ऐसे हैं, जो पहली बार लागू किए गए हैं. जैसे कि रूसी क्रूड ऑयल और कोयले पर प्रतिबंध, अंतर्राष्ट्रीय पेमेंट सिस्टम SWIFT

भविष्य में जब रूस-यूक्रेन युद्ध समाप्त हो जाएगा, तो यह निश्चित है कि पश्चिमी यूरोप के देशों की सुरक्षा संरचना को लेकर किसी भी तरह के चिंतन-मनन में रूस किसी न किसी रूप में ज़रूर शामिल होगा, जबकि पूर्वी यूरोप के देशों की कोशिश यह होगी कि उनके सुरक्षा संबंधी मामलों में रूस की जरा सी भी दख़लंदाज़ी नहीं हो. यह भी तय है कि यूरोपियन यूनियन के भीतर पैदा हो चुकी इस पारंपरिक दरार के ज़ल्द भरने की कोई संभावना नज़र नहीं आती है. ऐसे में यह ज़ाहिर है कि इन देशों के बीच के यह मतभेद इस बात को परिभाषित करना ज़ारी रखेंगे कि यूक्रेन और रूस के प्रति नीति को किस प्रकार से आगे बढ़ाया जाए.

निष्कर्ष 

फादर ऑफ़ यूरोप के नाम से विख्यात जीन मोनेट ने लिखा था कि यूरोप का निर्माण संकटों के ज़रिए होगा और कुल मिलाकर यह उन संकटों के समाधान का ही नतीज़ा होगा, इसका मतलब यह है कि ऐसे संकट यूरोपियन यूनियन के लिए ना तो कोई नई बात हैं और ना ही यह यूरोपीयन यूनियन की एकजुटता को चुनौती दे रहे हैं. लेकिन यह ज़रूर है कि यूक्रेन संकट ने यूरोपीय संघ को एकजुट करने से भी जो बड़ा काम कर दिखाया है, वह यह है कि इस संकट ने एक ओर तटस्थ और निष्पक्ष देशों को अपनी स्थिति पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित किया है, वहीं दूसरी ओर इसने नाटो की रक्षा और प्रतिरोध क्षमता को मज़बूत करने का काम किया है. इतना ही नहीं यूक्रेन संकट ने जहां यूरोपियन यूनियन के सदस्य देशों को अपने स्वयं के संबंधित रक्षा ढांचे को मज़बूत करने के लिए बाध्य किया है, वहीं दूसरी तरफ़ यूरोपीय संघ के ढांचे को मज़बूत करने के लिए भी मज़बूर किया. मौज़ूदा परिस्थितियों की बात की जाए, तो यूरोपीय संघ ने यूरोपियन पीस फैसेलिटी और टेंपरेरी प्रोटेक्शन डायरेक्टिव को सक्रिय करने के साथ ही रूस पर गंभीर प्रतिबंध लगाने जैसे कुछ अभूतपूर्व क़दम उठाए हैं. नए खिलाड़ियों द्वारा यूरोपियन नैरेटिव और पॉलिसी का निर्धारण करने के साथ ही यूरोपीय संघ के भीतर एक प्रकार की रणनीतिक जागरूकता और सक्रियता दिखाई दे रही है. यूरोपीय संघ की ओर से कमज़ोर प्रतिक्रिया की वजह से भले ही पहले के अनुमान फलीभूत नहीं हो पाए हों, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस बार यूक्रेन संकट को लेकर अपनी प्रतिक्रिया में यूरोपीय संघ ने अनुकरणीय एकता और दृढ़संकल्प को प्रदर्शित किया है.

भविष्य में जब रूस-यूक्रेन युद्ध समाप्त हो जाएगा, तो यह निश्चित है कि पश्चिमी यूरोप के देशों की सुरक्षा संरचना को लेकर किसी भी तरह के चिंतन-मनन में रूस किसी न किसी रूप में ज़रूर शामिल होगा, जबकि पूर्वी यूरोप के देशों की कोशिश यह होगी कि उनके सुरक्षा संबंधी मामलों में रूस की जरा सी भी दख़लंदाज़ी नहीं हो.

संक्षेप में यह कहना उचित होगा कि यूक्रेन संकट की वजह से एक मज़बूत और एकजुट यूरोपियन यूनियन एवं नाटो का उदय हुआ है. हालांकि, संकट के दौरान बनी इस एकता के बावज़ूद, आर्थिक सुधार, सुरक्षा संरचना के निर्माण और यूक्रेन के पुनर्निर्माण जैसे अहम मुद्दों पर व्यापक नीतिगत दृष्टिकोण अभी तक आकार नहीं ले पाए हैं. इसके अतिरिक्त, रूस द्वारा न्यू स्टार्ट न्यूक्लियर आर्म्स ट्रीटी से बाहर निकलने के ऐलान के साथ ही अब परिस्थियों का आकलन किए बिना अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए परमाणु हथियारों के अधिक से अधिक संभावित उपयोग का ख़तरा भी बढ़ गया है.

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