Published on Feb 23, 2022 Updated 0 Hours ago

जब बात नियम क़ायदों की आती है, तो तकनीक के ये बड़े बड़े महारथी अभिव्यक्ति की आज़ादी का हवाला देकर बच निकलते हैं, जबकि ख़ुद अपने देश में ये इन्हीं नियमों का पालन करते हैं. मगर, जिन देशों में कारोबार करते हैं, वहां पर ग़लत सूचनाओं से भरपूर मुनाफ़ा कमाते हैं.

बड़ी तकनीकी कंपनियां: लोकतंत्र के नक़ली योद्धा

7 फ़रवरी 2020 को अमेरिका के गृह सुरक्षा विभाग (DHS) ने आतंकवाद पर अपनी ताज़ा राष्ट्रीय एडवाइज़री जारी की. अमेरिकी ज़मीन को आतंकवाद से ख़तरों को लेकर एक नियमित मूल्यांकन के अलावा इस एडवाइज़री में दो ख़ास बातों का ज़िक्र किया गया था. पहला तो इसमें ये कहा गया था कि, ‘चुनाव में बड़े। स्तर पर धांधली और कोविड-19 महामारी को लेकर ऑनलाइन दुनिया में बहुत अधिक भरमाने वाली और ग़लत जानकारियां फैलायी जा रही हैं.’ इसके अलावा, इस एडवाइज़री में ये भी कहा गया था कि ऑनलाइन दुनिया में फैलायी जा रही ये झूठी बातें, अमेरिका को आतंकवादी ख़तरे के बढ़े हुए माहौल के पीछे की बड़ी वजह है. इस एडवाइज़री में जिस दूसरी ख़ास बात का ज़िक्र किया गया था कि डिपार्टमेंट ऑफ़ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के भागीदारों और दूसरे देशों की सरकारों और संस्थाओं के साथ मिलकर ऐसी ग़लत, भड़काऊ और झूठी जानकारियों (MDM) की पहचान करके उनसे ख़तरों का मूल्यांकन कर रहा है. इसमें सोशल मीडिया और दूसरे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर झूठे या भरमाने वाली बातें और साज़िश के वो क़िस्से शामिल हैं, जो हिंसा को बढ़ावा देते हैं या फिर हिंसक घटनाओं को प्रेरणा दे सकते हैं.

कोविड-19 या अमेरिका में चुनाव में धांधली को लेकर कोई भी व्यक्ति अगर ग़लत, फ़र्ज़ी या झूठी जानकारी (MDM) सोशल मीडिया पर पोस्ट करता है तो उसे घरेलू स्तर पर ख़तरे वाला व्यक्ति माना जाएगा और फिर उसकी निगरानी की जा सकेगी.

अगर हम इन दोनों ही बातों को जोड़कर देखें तो पता ये चलता है कि कोविड-19 या अमेरिका में चुनाव में धांधली को लेकर कोई भी व्यक्ति अगर ग़लत, फ़र्ज़ी या झूठी जानकारी (MDM) सोशल मीडिया पर पोस्ट करता है तो उसे घरेलू स्तर पर ख़तरे वाला व्यक्ति माना जाएगा और फिर उसकी निगरानी की जा सकेगी. चूंकि अमेरिका में आम तौर पर कोरोना का टीका लगवाने को लेकर हिचक है और ऑनलाइन दुनिया में दुष्प्रचार से इसे बढ़ावा ही मिला है. ऐसे में अमेरिका के गृह विभाग के लिए ऐसे क़दम उठाने ज़रूरी लगते हैं. हालांकि, यहां पर जो बात ख़ास तौर पर समझनी ज़रूरी है कि इस काम में अमेरिकी सरकार को बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म या बिग टेक से भरपूर सहयोग मिल रहा है. ये कंपनियां, अमेरिकी सरकार को अपनी वेबसाइट और मंच पर निगरानी और कंटेंट में फेरबदल की इजाज़त दे रही हैं.

हां, ये बात सही है कि अपने नागरिकों की निगरानी की अमेरिकी हुकूमत की कोशिश में बड़ी तकनीकी कंपनियों का शामिल होना और उसके नियमों का पालन करना कोई नई बात नहीं है.

जैसा कि इस मामले का पर्दाफ़ाश करने वाले एडवर्ड स्नोडेन ने 2013 में बताया था कि बड़ी तकनीकी कंपनियों जैसे कि माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, यू-ट्यूब, फ़ेसबुक और एप्पल ने अपनी मर्ज़ी से प्रिज़्म नाम के डिजिटल निगरानी के उस कार्यक्रम में शिरकत की थी, जिसे अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (NSA) चला रही थी. निगरानी के मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी को संचार का कंटेंट और उससे जुड़े मेटाडेटा जमा करने में पूरी मदद की थी.

भारत के प्रति भेदभाव भरा रवैया?

अमेरिकी सरकार से पूरा सहयोग करने के बड़ी तकनीकी कंपनियों के इस रवैये की तुलना अगर हम दुष्प्रचार और ग़लत जानकारी फैलाने के ऐसे ही मामलों में इन कंपनियों के भारत के सुरक्षा तंत्र के प्रति रवैये की तुलना करें तो फ़र्क़ साफ़ दिखता है.

पिछले साल, गणतंत्र दिवस के मौक़े पर जब किसानों का आंदोलन लाल क़िले के पास पहुंचकर हिंसक हो गया था, तो भारत सरकार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को निर्देश दिया था कि वो अपने मंच से भारत विरोधी कंटेंट और हिंसा को बढ़ावा देने वाले कुछ खातों को हटा लें. लेकिन, ट्विटर जैसे मंचों ने इस मामले में ज़िद अख़्तियार करते हुए सख़्त रवैया अपनाया था. हालांकि, ट्विटर ने तब अस्थायी रूप से सैकड़ों खातों को निलंबित कर दिया था. लेकिन कंपनी ने ऐसे कंटेंट पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने से ये कहते हुए इनकार कर दिया था कि उसका ये रुख़, ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी के सिद्धांत की रक्षा की उसकी नीति के अनुरूप’ ही था.

गणतंत्र दिवस के मौक़े पर जब किसानों का आंदोलन लाल क़िले के पास पहुंचकर हिंसक हो गया था, तो भारत सरकार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को निर्देश दिया था कि वो अपने मंच से भारत विरोधी कंटेंट और हिंसा को बढ़ावा देने वाले कुछ खातों को हटा लें. लेकिन, ट्विटर जैसे मंचों ने इस मामले में ज़िद अख़्तियार करते हुए सख़्त रवैया अपनाया था. 

बड़ी तकनीकी कंपनियों ने तब भी ऐसा ही रुख़ अपनाया था, जब भारत सरकार ने 25 फ़रवरी 2021 को सूचना प्रौद्योगिकी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस ऐंड डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) के नियम 2021 को जारी किया था. सरकार ने इन नियमों के तहत बहुत सी बड़ी तकनीकी कंपनियों को ‘महत्वपूर्ण सोशल मीडिया मध्यस्थ’ घोषित किया था. इन नियमों के तहत सोशल मीडिया कंपनियों के लिए अतिरिक्त निगरानी करने, जिसमें नियमों का पालन करने की मासिक रिपोर्ट जमा करने, जानकारी की ‘सबसे पहले शुरुआत करने वाले’ की पहचान करना और क़ानून व्यवस्था के लिए ज़िम्मेदार एजेंसियों के साथ तालमेल के लिए चौबीसों घंटे तैयार रहने वाले नोडल अधिकारी की नियुक्ति करना ज़रूरी बना दिया गया था. इन नियमों के जारी होने के बाद ट्विटर ने इनका पालन करने में आनाकानी की और तर्क दिया कि नए नियम बोलने की आज़ादी को कमज़ोर करते हैं. वहीं, फ़ेसबुक के मालिकाना हक़ वाले व्हाट्सप मैसेजिंस सेवा ने तो भारत सरकार के ख़िलाफ़ ये दावा करते हुए मुक़दमा कर दिया था कि इन नियमों उसके यूज़र्स की निजता का उल्लंघन होता है.

ये बड़ी तकनीकी कंपनियों का पाखंड है. क्योंकि ये कंपनियां अपनी मर्ज़ी से ये चुनाव करती हैं कि उन्हें किस देश के नियमों का पालन करना है और कहां के नियमों का विरोध करना है. इस चुनिंदा रवैये के चलते तकनीकी कंपनियां अपने मंचों पर फैलायी जा रही नफ़रत भरी बयानबाज़ी और और ग़लत सूचना से मुनाफ़ा कमाते हैं. मगर जब बात किसी देश के नियमों का पालन करने की आती है, तो वो अभिव्यक्ति की आज़ादी और बोलने वाले की निजता के प्रावधानों की बड़ी बड़ी बातों का हवाला देते हुए उसके पीछे छुप जाती हैं. ये बड़ी तकनीकी कंपनियों की पूंजीवादी और उपनिवेशवादी मानसिकता को दिखाता है. ये कंपनियां पश्चिमी देशों के नियम क़ायदों का पालन करते हैं, क्योंकि इन देशों में कंपनियों के ऐसे इरादों से निपटने के सख़्त क़ानून हैं और नियमों का पालन करने का ज़बरदस्त दबाव भी है. लेकिन, जब बात विकासशील देशों के नियमों का पालन करने की आती है, तो बड़ी तकनीकी कंपनियां रियायतें हासिल करना चाहती हैं.

ये बड़ी तकनीकी कंपनियों का पाखंड है. क्योंकि ये कंपनियां अपनी मर्ज़ी से ये चुनाव करती हैं कि उन्हें किस देश के नियमों का पालन करना है और कहां के नियमों का विरोध करना है. इस चुनिंदा रवैये के चलते तकनीकी कंपनियां अपने मंचों पर फैलायी जा रही नफ़रत भरी बयानबाज़ी और और ग़लत सूचना से मुनाफ़ा कमाते हैं.

बड़ी तकनीकी कंपनियों के बर्ताव में जवाबदेही लाना

हो सकता है कि बड़ी तकनीकी कंपनियां ये सोचती हों कि अपने चुनिंदा और भेदभाव भरे बर्ताव के लिए उनकी कोई जवाबदेही तय नहीं होगी. लेकिन, अब समय आ गया है जब भारत इस मामले में नई राह दिखाए और इन कंपनियों को जवाबदेह बनाए, जिसे डॉक्टर समीर सरन ने ‘उत्तरदायी तकनीक’ का नाम दिया है. पश्चिमी देशों के पास बड़ी तकनीकी कंपनियों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से निपटने के लिए एंटी-ट्रस्ट क़ानून हैं. ज़रूरी नहीं है कि भारत भी इसी विकल्प को अपनाए. इसके बजाय, भारत अपने यहां के प्रतिद्वंदी व्यापारिक नियमों को और मज़बूत बनाए. एक सख़्त कंटेंट कोड बनाए. डेटा को स्थानीय स्तर पर जमा करने के निर्देश को सख़्ती से लागू करे और सोशल मीडिया के मंचों के एक इकोसिस्टम को बढ़ावा दे. ऐसा करके, भारत अपने नागरिकों के डेटा और उनकी निजता की रक्षा कर सकता है. इसके साथ साथ वो अपने नागरिकों को नुक़सानदेह कंटेंट से बचाते हुए इनोवेशन को बढ़ावा देने वाले निष्पक्ष बाज़ार का निर्माण भी कर सकता है. भारत ऐसा तरीक़ा अपनाकर, एक समावेशी वैश्विक डिजिटल व्यवस्था के लिए अपनी प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करेगा और विकासशील देशों कोए भी अपनी क़िस्मत का मालिक बनने का रास्ता दिखाएगा.

भारत अपने यहां के प्रतिद्वंदी व्यापारिक नियमों को और मज़बूत बनाए. एक सख़्त कंटेंट कोड बनाए. डेटा को स्थानीय स्तर पर जमा करने के निर्देश को सख़्ती से लागू करे और सोशल मीडिया के मंचों के एक इकोसिस्टम को बढ़ावा दे. ऐसा करके, भारत अपने नागरिकों के डेटा और उनकी निजता की रक्षा कर सकता है.

अगर लोकतंत्र को बचाकर उसे ऊर्जावान बनाए रखना है, तो इसके इर्द गिर्द के तकनीकी माहौल की हमें लगातार रक्षा करनी होगी और उसके लिए नियम बनाने होंगे. हो सकता है कि इस बात को कुछ लोग ‘डिजिटल राष्ट्रवाद’ का दर्जा भी दे दें, लेकिन भारत की संप्रभुता की रक्षा के लिए ये क़दम उठाना ज़रूरी है. क्योंकि भारत ने राजनीतिक मोर्चेबंदी, सामाजिक विभाजन और हिंसा का लंबा तजुर्बा झेला है.

The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.